कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
सिरके लियो विसवास हो रमैया राम ॥२॥ ई तो है वेद साक्ष हो रमैया राम । गुरु दीन्हो मोहिं थापि हो रमैया राम ॥ ३ ॥ गोबर कोट उठायहु हो रमैया राम । परि हरि जैहो खेत हो रमैया राम ॥ ४ ॥ बुद्धिवल तहाँ न पड़ुंचै हो रमैया राम । खोज कहांति होय हो रमैया राम ॥५॥ सुनिमन धीरज भैल हो रमैया राम । मन बढि रहल लजाय हो रमैया राम ॥६॥ फिरि पाछे जनि हेरो हो रमैया राम । काल बूत सब आय हो रमैया राम ॥ ७ ॥ कह कवीर सुनु संत हो रमैया राम । मति दिगहि फैलाहु हो रमैया राम ॥ ८ ॥
अथ विरहुली प्रारम्भः ।
आदि अन्त नहिं होत विरहुली । नहिं जड़ पल्लव पेड़ विर- हुली ॥ १ ॥ निसि बासर नहिं होत विरहुली । पानी पवन न होत विरहुली ॥ २ ॥ ब्रह्माहि सनकादि विरहुली । कथि गये जोग अपार विरहुली ॥ ३ ॥ मास अषाढहि शीत विरहुली । बोइन सातौ बीज विरहुली ॥४॥ नित गाड़ै नित सिंचै विरहुली । नित नव पल्लव पेड़ विरहुली ॥ ५ ॥ छिछिल विरहुली छिछिल विरहुली । छिछिल रहल तिहुँलोक विरहुली ॥ ६ ॥ फुल एक भल फुलल विरहुली । फूलि रहल संसार विरहुली ॥ ७ ॥ ते फुल बन्दै भगत विरहुली । बांधिके राउर जाय विरहुली ॥८॥ सो फुल लोढहि संत विरहुली । डसि गौ बैतल सांप विरहुली ॥ ९ ॥ विषहर मंत्र न मान विरहुली । गाडुर बोले और विर- हुली ॥ १० ॥ विषकी कयारी बोयो विरहुली । अब लोरत का पछिताय विरहुली ॥ ११ ॥ जनम जनम अवतरेउ विरहुली । फल यक कनइल डार विरहुली ॥ १२ ॥ कह कवीर सचु पाय विरहुली । जो फल चाखहु मोर विरहुली ॥ १३ ॥