भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५२३)

अथ हिंडोला प्रारंभः ।

हिंडोला पहिला १ ॥

भर्म हिंडोला झूले सब जग आय ॥ टेक ॥

जहँ पाप पुण्यके खम्भ दोऊ, मेरू माया नाय । तहँ कर्म पटुकी बैठिकै, को को न झूले आय ॥ १ ॥ लोभ मरूआ विषय भवरा, काम कीला ठानि । शुभ अशुभ बनाय डांडी, गह्यो दूनौ पानि ॥ २ ॥ झूले सो गन गन्धर्व सुनि नर, झूले सुरगन इन्द्र । झूलत सो नारद सारदा, झूलत व्यास फनीन्द्र ॥ ३ ॥ झूलत विरंचि महेस-सुनिहो झूलत सूरज इन्द्र । आप निर्गुन सगुन होयके, झूलिया गोविन्द ॥ ४ ॥ छौ चार चौदह सात इकइस, तीन लोक बनाय चौखानि बानी खोजि देखौ, थिर न कोइ रहाय ॥ ५ ॥ खण्डो ब्रह्मखण्ड खोजि षट् दर्शन, ये छूटे नाहिं । साधु संग बिचारि देखौ, जीव निसतरि जाहिं ॥ ६ ॥ ससि सूर निस दिन संधि, औ तहँ तत्त्व पांचौ नाहिं । काल अकालौ परलय नहीं, तहँ संत बिरले जाहिं ॥ ७ ॥ तहँके विछुरे बहु कल्प बीते, परे भूमि भुलाय । साधु संगति खोजि देखौ, बहुरि उलटि समाय ॥ ८ ॥ तेहि झूलवेको भय नहीं, जो होय संत सुजान । कहहिं कवीर सत सुकृत मिलै तो, फिरि न झूले आन ॥ ९ ॥

हिंडोला दूसरा २ ॥

बहु विधि चित्र बनाइके, हरि रच्यो है क्रीडा रास । जाहि न इच्छा झूलवेको, अस बुद्धि केहि पास ॥ १ ॥ झूलत २ बहु कल्प बीते, मन न छोड़ै आस । रच्यो रहस हिंडोलना, निसि चारिउ जुग चौमास ॥ २ ॥ कबहुक ऊंचे नीचे कबहुंक, सरग भूलौ जाय । अति भरमित भरम हिंडोलना, नेकु नहीं ठहराय ॥ ३ ॥ डरपत हो यहि झूलवेको, राखु जादव राय । कहै कवीर गोपाल विनती, शरन हो तुम पाय ॥ ४ ॥

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