भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५१९)

स्वामी हो ॥ अर्थ विचारत पंडित मारे, बांधेउ सकल लगामी हो ॥ सिंगीत्रुडपि वन भीतर मारे, शिर ब्रह्माका, फोरी हो ॥ नाथ मछंदर चले पीठिदे, सिंचलहुमैं, बोरी हो ॥ साकटक घर कर्ता धरता, हरिभक्ताते चेरी हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, ज्यों आवे त्यों फेरी हो ॥ १२ ॥

इति कहरा बीजकका सम्पूर्ण ।

अथ चाचरि प्रारंभः

चाचरि पहिला १ ॥

खेलति माया मोहनी, जेर कियो संसार । कटि केहरि गज गामिनी, संशय कियो सिंगार ॥१॥ रचे रंगकी चूनरी, सुन्दरि पहिरे आय । शोभा अद्भुत रूपकी, महिमा बरनि न जाय ॥२॥ चन्द्र बदनी मृगलोचनी, बिडुक दियो उघालि । यती सती सब मोहिया, गज गति वाकी चालि ॥ ३ ॥ नारदके सुख मोडिके, लीन्हों बदन छिपाय । गरब गहेली गरबते, उलटि चली सुसकाय ॥४॥ शिव अरु ब्रह्मा दौरिके, दोनों पकड़े धाय । फगुआ लीन छिनायके, बहुरि दियो छिटकाय ॥ ५ ॥ अनहद धुनि बाजा बजे, सरवन सुनत भो चाव । खेलनिहारी खेलि है, जैसी वाकी दाव ॥ ६ ॥ ज्ञानढाल आगे दियो, टारे टरत न पांव । खेलनिहारी खेलि है, बहुरि न ऐसो दाव ॥ ७ ॥ सुर नर मुनि भू देवता, गोरख दत्ता व्यास । सनक सनन्दन हारिया, औरक केतिक आस ॥८॥ छिलकत थोथे प्रेम सो, धरि पिचकारी गात । करि लीनो बस आपने, फिरि फिरि चितवत जात ॥ ९ ॥ ज्ञान गाडिले रोपिया, तिरगुन लिये है हाथ । शिवसन ब्रह्मा लीनिया, और लिये सब साथ ॥ १० ॥ एक ओर सुर नर मुनि खड़े, एक अकेली आप । दृष्टि परे छोड़ै नहीं, करि लिय

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