भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 532

(५१८)

कवीरपंथी—

कहरा १०.

हौं सबहिनमें हौना हो, मोहि बिलग बिलग बिलगाई हो ॥ ओढन मोरा एक पिछौरा, लोग बोलै एकताई हो ॥ एक निरं- तर अन्तर नाही, ज्यों ससि घटजल झाई हो ॥ एक समान कोई समुन्नत नाही, जाते जरा मरण भ्रम जाई हो ॥ रैन दिवस ये तहवाँ नाही, नारि पुरुष समताई हो ॥ हौं मैं बालक बूढो नाहीं, न मोरे चिलकाई हो ॥ त्रिविध रहौं संभनिमा बरतौं, नाम मोर रसुराई हो ॥ पठये न जाऊँ आने नहिं आवौं, सहज रहौं बुनियाई हो ॥ जोलहा तान बान नहिं जाने, फाटि बिने दश ठाई हो ॥ गुरु परताप जिन्हें जस भाख्यो, जन बिरलै सों पाई हो ॥ अनंत कोटि मन हीरा बेधा, फिटको मोल न पाई हो ॥ सुर नर मुनि जाके खोज परे हैं, कछु कछु कविरन पाई हो ॥ १० ॥

कहरा ११.

ननदीगेतैं विषम सोहागिनि, तैं निदले संसारा गे ॥ आवत देखी एक संग सूती, तैं औ खसम हमारा गे ॥ मोरे बापके दुइ मेहररूवा, मैं अरु मोर जेठानी गे ॥ जब हम रहलि रसिकके जगमें, तबहि बात जग जानी गे ॥ माइ मोरि सुवलि पिताके संगे, सरा रचि सुवल संघाती गे ॥ आपुहि सुवलि और ले सुवली, लोग कुटुब संग साथी गे ॥ जौं लौं स्वास रहे घट भीतर, तौं लौं कुशल परिहै गे ॥ कहहिं कवीर जब थास निकरि गौं, मंदिर अनल जरिहै गे ॥ ११ ॥

कहरा १२.

ई माया रघुनाथकी बौरी, खेलन चली अहेरा हो ॥ चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ न्यारा हो ॥ मौनी बीर दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो ॥ जंगलमेके जंगम मारे, माया किनहुं न भोगी हो ॥ वेद पढंते वेदुवा मारे, पूजा करंते