कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
एकै छाप ॥ ११ ॥ जेते थे तेते लियो, घुंघट माँहिं समाय । कज्जल वाके रेख है, अदृग्ग न कोई जाय ॥ १२ ॥ इन्द्र कृष्ण द्वारे खडे, लोचन निज ललचाय । कहै कवीर ते ऊबरे, जाहि न मोह समाय ॥ १३ ॥
चाचरि दूसरी २ ॥
जारो जगको नेहरा, मन बौरा हो । जाँमे सोग संताप समुझ मन बौरा हो ॥ १ ॥ तन धनसों क्या गरब, समुझ मन बौरा- हो ॥ भसम किरमीको साज, मन बौरा हो ॥ २ ॥ विना नेव- का देवघरा, मन बौरा हो ॥ विन कहगिलकै ईट, समुझ मन बौराहो ॥ ३ ॥ काल बूतकी हस्तिनी, मन बौरा हो ॥ चित्र रच्यो जगदीस, समुझ मन बौरा हो ॥ ४ ॥ काम अंध गज बस परै, मन बौरा हो ॥ अंकुस सहिया सीस, समुझ मन बौरा हो ॥५॥ मर्कट मूठी स्वादकी, मन बौरा हो । लीन्हो भुजा पसारि समुझ मन बौरा हो ॥६॥ छूटनकी संशय परी, मन बौरा हो ॥ घर घर खायो डांग, समुझ मन बौरा हो ॥ ७ ॥ ऊंच नीच जानै नहीं, मन बौरा हो ॥ घर घर नाचेउ द्वार, समुझ मन बौरा हो ॥ ८ ॥ ज्यों सुवना नलनी गह्यो, मन बौरा हो । ऐसो भरम विचार, समुझ मन बौरा हो ॥ ९ ॥ पढे गुनेका कीजिय, मन बौरा हो । अन्त बिलैया खाय, समुझ मन बौरा हो ॥१०॥ सूने घरका पाहुना, मन बौरा हो । ज्यों आवै त्यों जाय, समुझ मन बौरा हो ॥ ११ ॥ नहानेको तीरथ घना, मन बौरा हो । पूजनको बहु देव, समुझ मन बौरा हो ॥ १२ ॥ बिनु पानी नल बूडिया, मन बौरा हो । टेकेउ राम जहाज, समुझ मन बौरा हो ॥१३॥ कहहि कवीर जग भरमिया, मन बौरा हो । छोड़ हरिको सेव, समुझ मन बौरा हो ॥ १४ ॥
इति चाचरि समाप्तम् ।