भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५१५)

अछत खेवे नहिं जाने, कैसेक लगवेहु तीरा हो ॥ कहहिं कवीर राम रस माते, जोलहा दास कवीरा हो ॥ १ ॥

कहरा २.

मत सुनु मानिक मत सुनु मानिक, हृदय बंद निवारहु हो । अटपट कुम्हरा करे कुम्हरैया, चमरा गांव न बांचे हो ॥ नित उठि कोरिया पेट भरतु है, छिपिया आंगन नाचे हो ॥ नित उठि नौवा नाव चढतु है, बेरहि बेरा बोरे हो ॥ राउरकी कछु खबरि न जानहु, कैसेकै झगरा निबेरहु हो ॥ एक गांवमें पाँच तरुनि बसे, जेहि मा जेठ जेठानी हो ॥ आपन आपन झगरा प्रकासनि, पियासों प्रीति नसाइनि हो ॥ भैंसिन माहिं रहत नित बकुला, तिकुला ताकि न लीन्हा हो ॥ गाइन माहिं बसेउ नहिं कबहुँ, कैसे पद पहिचनबेउ हो ॥ पंथी पंथ बूझ नहिं लीन्हा, मूढहिं मूढ गंवारा हो ॥ घाट छोड़ि कस औघट रेंगहु, कैसेके लगबेहु तीरा हो ॥ जतइनके धन हेरिन ललचिन, कोदइतके मन दौरा हो ॥ दुइ चकरी जनि दरर पसारहु, तब पैहौ ठीक ठौरा हो ॥ प्रेम बाण एक सतगुरु दीन्हो, गाढों तीर कमाना हो ॥ दास कबीर कीन्ह यह कहरा, महरा माहिं समाना हो ॥ २ ॥

कहरा ३.

रामनामको सेवहु बीरा, दूरि नहिं दुरि आसा हो ॥ और देवका सेवहु बौरै, ई सब झूठी आसा हो ॥ ऊपर ऊजरका भौ बौरै, भीतर अजहुं कारो हो ॥ तनके बूद्ध का भौ बौरै, मनुवा अजहुं बारो हो ॥ मुखते दांत गये का बौरै, भीतर दांत लोहेके हो ॥ फिर फिर चना चबाव विषयके, काम कोध मद लोभैके हो ॥ तनकी सकल वासना घटि गयऊ, मनहिं दिलासा दूना हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, सकल सयानपऊना हो ॥ ३ ॥