भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी-

कहरा ४.

ओढन मोर राम नाम, मैं रामहिका बनजारा हो ॥ रामं नामका करहुँ बनिजिया, हरि मोर हटवारा हो ॥ सहस नामका करो पसारा, दिन दिन होत सवाई हो ॥ जाके देव वेद पछ राखा, ताके होत हटवाई हो ॥ कानि तराजू सेर तिन पउवा, तुकिन ढोल बजाई हो ॥ सेर पसेरी पूरा कैले, पासंग कतहुँ न जाई हो ॥ कहहिं कवीर सुनो हो संतो, जोर चला जहंढाई हो ॥ ४ ॥

कहरा ५.

राम नाम भजु राम नाम भजु, चेति देखु मनमांहीं हो ॥ लच्छ करोरि जोरि धन गाडे, चलत डोलावत बांही हो दादा बाबा और प्रपाजा, जिनके यह भुईं भाँडे हो ॥ औंघर भये हियहुकी फूटी, तिन्ह काहे सब छाँडे हो ॥ ई संसार असारको घंथा, अन्तकाल कोइ नाही हो ॥ उपजत बिनसत बार न लागे, ज्यों बादरकी छाई हो ॥ नात गोट कुल कुटुंब सब, इन्हकर कौन बडाई हो ॥ कहहिं कवीर एक राम भजे बिनु, बूड़ी सब चतुराई हो ॥ ५ ॥

कहरा ६.

राम नाम बिनु राम नाम बिनु, मिथ्या जन्म गंवाई हो ॥ सेमर सेइ सुवा ज्यों जहँडे, ऊन परे पछिताई हो ॥ जैसे मदपी गांठी अर्थ दे, घरहुकी अकिल गमाई हो ॥ स्वादे उदर भरे धौं कैसे, औसै प्यास न जाई हो ॥ दबँहीन जैसे पुरुषारथ, मनही मांहि तवाई हो ॥ गांठि रतन मरम नहिं जाने, पारख लीन्हा छोरी हो ॥ कहहिं कवीर यह औसर बीते, रतन न मिले बहोरी हो ॥ ६ ॥