कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(५२४)
कवीरपंथी-
हिंडोला तीसरा ३ ॥
लोभ मोहके खम्भ दोऊ, मन रच्यो है हिंडोर । झूलहीं जीव जहान जहँ लगि, कतहुँ नहीं थित ठौर ॥१॥ चतुरा झूले चतु- राइया, झूले राजा सेव । चन्द्र सूर्य दोऊ झूलहीं, नाहि न पायो भेव ॥ २ ॥ चौरासी लच्छ जीव झूले; रवि सुत धरिया धाय । कोटिन कल्प जुग बीतियां, अजहुँ न मानै हाय ॥ ३ ॥ धरनि अकास दोउ झूले, झूले पवनहु नीर । धरी देह हरि आपुहु झूलहीं; लखहिं, हंस कवीर ॥ ४ ॥
इति हिंडोला बीजक ॥
सत्यनाम ।
गुरु महिमा ।
सा०-सतकवीरके चरण रज, धर्मदास शिरनाय ॥
बार बार विनवन लगे, सतगुरु होहु सहाय ॥
रमैनी १-धर्मदास बिनवै कर जोरी । हे साहब इक विन्ती मोरी ॥ बारम्बार आप अस भाषो । गुरु गुरु कहि बहुत अभि- लाषो ॥ १ ॥ मुझ किंकर पर दया सुकीजे । दास जानि यही वर दीजे ॥ निसिदिन रहौं चरन लौलीना । पल इक चित्त न होवे भीना ॥ २ ॥ महिमा गुरु कहो समझाई । सुनत जीव भगती दिठ पाई ॥ विना ज्ञान नर होय अजाना । संग्रह त्याग न विनु पहिचाना ॥ ३ ॥ जब जाने सरधा दिठ होई । विन जाने सरधा नहिं कोई ॥ विन सरधा अनुराग न जामें । विनु अनु- राग भगति नहिं तामें ॥ ४ ॥ विना भगति जिव छुटै न फेरा । विना भगति जिव होय अनेरा ॥ याते सतगुरु देहु बतायी । गुरु महिमा कहिये अरथायी ॥ ५ ॥
सा०-धर्मदासके वचन सुन, हरषे श्री गुरुदेव ।
सुनु धर्मनि अब कहत हौं, गुरु महिमाको भेव ॥
शब्दावली
(५२५)
रमैनी २-गुरुने अधिक और कोउ नहीं। धरमदास परखहु हिय माहीं ॥ गुरु दयाल अस हैं सुखदाई। देहिं सुकतिको पंथ लखाई ॥ १ ॥ गुरुते अधिक कोइ नहिं दूजा। भरम तजि कर सतगुरु पूजा ॥ तीरथ धाम देवल अरु देवा। सीस अरपि जो लावैं सेवा ॥ २ ॥ तौ नहिं वचन कहे हितकारी। भूले भरमे यह संसारी ॥ भवसागर है अगम अपारा। तामें बूझि गयो संसारा ॥ ३ ॥ पार लगनको सब कोइ धावे। विना गुरु कोइ पार न पावे ॥ यह जग जीव थाह नहिं पावे। विना गुरु सब गोता खावे ॥ ४ ॥ जग जीवोंसे कहु गोहराई। सत गुरु खेवट पार लगाई ॥ यह जग बूझि जाय मंझधारा। सतगुरु भक्ति भये भव पारा ॥ ५ ॥
सा०-सतगुरु भक्ति न जानई, कहैं कवीर बखान। यह जग भूले बापुरे, गहे न सतगुरु ज्ञान ॥
रमैनी ३-जग कर आयु अल्प है भाई। अन्त सभै कोइ नाहि सहाई ॥ बहुत पियारि नारि जग माहीं। मातु पिताहु जेहि सर नाही ॥ १ ॥ जेहि कारण नर सीस जु देहीं। अंत समय सो नाहिं सनेही ॥ निज स्वारथ कहैं रोदन करई। तुरतहि नैहरको चित धरई ॥ २ ॥ सुत परिजन धन सुपन सनेहीं। भीर परे कोइ काम न देहीं ॥ निज तनु सम और न आना। सो तन संग न चलत निदाना ॥ ३ ॥ ऐसो को जग दीखे भाई। अंत समयमें लेइ छुड़ाई ॥ अहे एक सो कहौं बखानी। जेहि अनुराग होय सो मानी ॥ ४ ॥ केवल गुरु छुडावन हारा। निश्चय जानो कहा हमारा ॥ कालहि जीत हंस लैजाहीं। अविचल देस पुरुष जहं आहीं ॥ ५ ॥
(५२६)
कवीरपंथी—
सा०—बिना गुरु उतरे नहीं, भवसागरके पार । कहैं कवीर सब जीवसे, गहिलो गुरु अपार ॥
रमैनी ४—सरगुन निरगुन माहिं पिछानो । निगुराको नहिं ठौर ठिकानो ॥ विन गुरु कोई पार न पावे । लोक परलोक महं परगट दिखावे ॥ १ ॥ सुकदेव भये गरभ जोगेसर । उन समान नहिं थाप्यो दोसर ॥ तपके तेज गये हरिधामा । गुरु विनु नाहिं लहे विसरामा ॥ २ ॥ रोक पारषद जान न पाये । कह सुकदेव करहु कस भाये ॥ कह पारषद सुनो सुनि राऊ । विनु हरि आज्ञा जान न पाऊ ॥ ३ ॥ करहु विनती हरिपै जाई । ठाठ द्वार सुकदेव रहाई ॥ जबै पारषद हरिपै गयऊ । जस सुनि कहा तस पुनि कहेऊ ॥ ४ ॥ सुनत विष्णु तब बाहर आये । देखतहीं शुक अति हरषाये ॥ विस्तु कहे रिषि कहवां आये । गुरु विहीन तप तेज झुलाये ॥ ५ ॥
सा०—गुरु बिना जो तप करे, गुरु विन देवे दान । गुरु विनु माला फेरते, सबही निसफल जान ॥
रमैनी ५—गुरु विहीन नर मोहि न भावे । सो कस हरिधाम सिधावे ॥ कह सुकदेव सुनो हरि राऊ । कहि सुपन्थ मोहि राह बताऊ ॥ १ ॥ जाहु पलटि करहु गुरु स्याना । तब पैहो इहवाँ अस्थाना ॥ सुनि सुनि सुकदेव वेगि सिधाये । गुरु विहीन तहँ रहन न पाये ॥ २ ॥ दृढन गुरु चले सुनि राई । व्यास सुनी तब कह्यो बुझाई ॥ मिथला आहि जनक पुर धामा । विदेह जनक तहँ रहत ललामा ॥ ३ ॥ उन सम ज्ञानि न दूसर कोऊ । जाकर शरण गहो तुम सोऊ ॥ चले सुनत सुक सुनि तहवाँ । राजा जनक रहत है जहवाँ ॥ ४ ॥ सिष भावले पहुंचे जबहीं । मिलत जनक हरष भय तबहीं ॥ जनक विदेह कीन्ह गुरु जानी । हरषि मिले तब सारंग पानी ॥ ५ ॥
शब्दावली
(५२७)
सा०-गर्भ जोगेसर गुरु बिना, लागे हरिकी सेव । कह कवीर वैकुंठसे, फेर दियो सुकदेव ॥ जनक विदेही गुरु किया, लागा हरिकी सेव । कह कवीर वैकुंठमें, उलट मिला सुकदेव ॥
रमैनी ६-ब्रह्मा सुत नारद बड ज्ञानी । जिनकर कथा जगत सब जानी ॥ हरि करते चौरासी परिया । गुरु किरपाते तुरत उबरिया ॥१॥ और देव गिषि मुनिवर जेते । जिन गुरु कीन्ह उत्तर सो तेते ॥ बिना गुरु भवसागर डूबे । उब डुब होय पार नहीं ऊबे ॥ २ ॥ जो गुरु मिले तौ पंथ बतावे । सार असार परख दिखलावे ॥ गुरु सोई जो सत्य बतावे । और गुरु कोइ काम न आवे ॥३॥ सत्त पुरुषका कहे संदेशा । जनम जनमका भिटै अंदेशा ॥ पाप पुत्रकी आसा नाही । बैठे अछय वृक्षकी छाँही ॥४॥ भ्रिगी मत होवे जिहि पास । सोई गुरु सत्त सुनौ धर्मदासा ॥ गुरुते अधिक और कोइ नाही । धर्मदास परखहु हिय माहीं ॥५॥
सा०-ऐसे गुरुके मिलनसे, आवा गमन नसाय ।
विन गुरु ज्ञाने दुन्द हो, काल फाँसमें जाय ॥
रमैनी ७-जीवन मुक्ति चाहु जो भाई । सतगुरु शब्द गहे सो आई ॥ जमसे यही छुडावन हारे । निश्चय मानो कहा हमारे ॥१॥ बहुरि न जोनी संकट आवे । जो जिव नाम शरण गति पावे ॥ तजि संसार लोक कई जाई । नाम पान गुरु होय सहाई ॥२॥ गुरुके बचन हिया सुध होई । दीपक ज्ञान परगटे तहँ सोई ॥ धर्मनि यह गुरु पद परतापा । गुरु पद गहे भरम तजि आपा ॥३॥ सिन्धु बुन्द समावे जाई । कहे कवीर मिटी दुचिताई ॥ सरन गहे सब दुख नसाई । विन गुरु शिष्य निरासे जाई ॥४॥ गुरु सम दानी और न भाई । आवत सरन सकलो निधि पाई ॥
(५२८)
कबीरपंथी-
सतगुरु कहैं गुरु व्रतधारी । अगुन सगुन बिच गुरु अधारी ॥५॥ सा०-यह भव अगम अथाह है, काल जाल वह धार ।
पार होनको द्वार इक, गुरु गिरा कडिहार ॥
रमैनी ८-गुरु विना नहि होय अचारा । गुरु विना नहि होय भवपारा ॥ शिष्य सीप गुरु स्वाती जानो । गुरु पारस शिष लोह समानो ॥१॥ गुरु मल्यागिर शिष्य भुजंगा । गुरु परसि शीतल होय अंगा ॥ गुरु समुद्र है शिष्य तरगा । गुरु दीपक है शिष्य पतंगा ॥२॥ शिष चकोर गुरुको शसि जानो । रवि गुरु कमल शिष्य विकसानो ॥ यहि स्नेह सिष निश्चय लहई । गुरु पद परसि दरस हिये गहई ॥३॥ गुरु गुरुमें भेद विचारा । गुरु गुरु कहे सकल संसारा ॥ गुरु सोईं जिन शब्द लखाया । आवा- गमन रहित पद पाया ॥४॥ गुरु सजीवन शब्द लखावे । जाके बल हंसा घर जावे ॥ वा गुरुसो कछु अन्तर नाही । गुरु अरु शिष्य मता इक आही ॥ ५ ॥
सा०-गुरु गुरुमें भेद है, गुरु गुरुमें भाव ।
गुरु सदा सो वन्दिये, सबद बतावे दाव ॥
रमैनी ९-सतगुरुकी बलिहारी जावे । अजर दशा जो आन बतावे ॥ अमि अजरावलि अजरा धामा । सत्य नाम सत्य पुरुष निजनामा ॥१॥ गुरु किरपा करि सो पद पावे । जीवन मुक्त अटल घर जावे ॥ निसिदिन सुरत गुरु सो लावे । साधु सन्तके मनहि समावे ॥२॥ जिनपर दया गुरुकी होई । तिनका फांस करम सब खोई ॥ करनी करके सुरत लगावे । सतगुरु लोक ताहि पहुँचावे ॥३॥ सेवा करि मन रखै न आसा । ताका सत- गुरु काटै फाँसा ॥ गुरु चरणन जो राखे ध्याना । अमर लोक सो करत पयाना ॥४॥ जोगी जोग साधना करई । विना गुरु
शब्दावली
(५२९)
सो भव नहीं तरई ॥ जो शिष्य गुरु आज्ञा धारी । गुरुकी कृपा होय भवपारी ॥ ५ ॥
सा०-गुरु मुख गुरु चितवत रहै, जैसे मनी भुवंग ।
कहै कवीर विसरे नहीं, यह गुरु मुखको अंग ॥
रमैनी १०-गुरु भगता जो जिव आही । साधु गुरु नहीं अन्तर ताही ॥ साँचा शिष्य ताहिको माने । साधु गुरु नहीं अन्तर आने ॥ १ ॥ जो स्वार्थ पागे संसारी । नहीं गुरु सिकख न साधु अचारी ॥ तिनको काल फन्द तुम जानो । दूत अंश काल कर मानो ॥ २ ॥ साधु गुरुको रूप बनायी । बहुते फन्द जीव पर लायी ॥ जिनते होय जीवकर हानी । यह तो अहै काल सहदानी ॥ ३ ॥ सोह गुरु जो प्रेम गति जाने । सत्य शब्दको राह पिछाने ॥ परम पुरुषकी भगति दिढावे । सुरति निरति कर तहैं पहुँचावे ॥ ४ ॥ तासो प्रीति करै मनलाई । छाड़ै डुरमति औ चतुराई ॥ तबहीं निह संशय घर पावे । भव तरिके जग बहुरि न आवे ॥ ५ ॥
सा०-करम भरम जंजाल तजि, गुरु पद कीजे नेह ।
गुरु मुख शब्द प्रतीति करि, निज तन जाने खेह ॥
रमैनी ११-गुरु चरननमें रह लपटाई । तजि भरम औ कपट चतुराई ॥ गुरु आज्ञा जो निरखत रहई । ताकर खूंट काल नहीं गहई ॥ १ ॥ गुरु परतीत दिढकै चित राषै । मोहि समान गुरु कहैं भाषै ॥ गुरु सेवामें सब फल आवै । गुरु विमुख नर पार न पावै ॥ २ ॥ जैसे चन्द्र कुमोदिनि रीती । गहे शिष्य अस गुरु परतीती ॥ गुरुमुख निरखत शिष्य हिय हरषे । शब्द अभी जिमि बादल वरषे ॥ ३ ॥ नृतक होयके खोजहि सन्ता । शब्द विचार गहे मगु अन्ता ॥ धर्मदास जिमि कीटहि भेवा । यहि विधि शिष्य गहै गुरुदेवा ॥ ४ ॥ मिलै कीट भुंगके पास । भ्रिगी गही गुरुगम
(५३०)
कबीरपंथी-
परगासा ॥ भिंगी शब्द कीट जो माने । आपा मेटि गुरु सुरत समाने ॥ ५ ॥
सा०-भिंगी मति गहि कीट जस, भिंगी ही होइ जाय ।
गुरु शब्द गहि शिष्य तस, गुरुही माहिं समाय ॥
रमैनी १२-जबहीं कीट सौप तन देवे । भिंगी गहि आपन करि लेवे ॥ शब्द घात करि महि तिहिं डारे । आपन मंत्र निज तहां विचारे ॥ १ ॥ भिंगी शब्द कीट जो गहई । आपा मेटि भिंगी होय रहई ॥ जाति वरण सब पलटे आई । भिंगी रूप तबै परगटाई ॥ २ ॥ कीट पलटि भिंगी जब होई । ताको कीट कहै नहिं कोई ॥ भिंगी शब्द कीट नहिं गहई । तो पुनि कीट असारे रहई ॥ ३ ॥ धरमदास यह कीटक भेवा । यहि मति शिष्य गहे गुरु देवा ॥ गुरुके वचन सांच कर माने । आपा ओट न बाद बखाने ॥ ४ ॥ तन मन धन अरपे सब ओई । आपा लेश रहै नहिं कोई ॥ मिटै भरम सब दुविधा नासे । गुरु अरु शिष्य एक घर भासे ॥ ५ ॥
छन्द-भिंगी मत दिठके गहे, करौं निज समय ओहिहो । दुतिया भाव न चित व्यापै, सो लहै जिव मोहिहो ॥ गुरु सबद निसचय सत्य माने, भिंग मत तब पावई । तजि सकल आसा सबद वासा, काग हंस कहावई ॥
सोरठा-तजै कागकी चाल, सत्य सबद गहि हंस हो ।
मुकता चुगे रसाल, पुरुष पच्छ गुरु गम गमन ॥
रमैनी १३-गुरु कृपा ते साधु कहावे । गुरुकृपा साधक है आवे ॥ गुरु कृपाते ज्ञान विचारा । गुरुकृपाते भक्ति अनुसारा ॥ १ ॥ गुरु कृपाते सुकर्म कमावे । गुरु कृपा सुकृत कई धावे ॥ गुरु कृपाते पुण्य बटोरे । गुरु न मिले तो पाप बहोरे ॥ २ ॥ गुरु
शब्दावली
(५३१)
मिले वैराग दिदावे । गुरु मिले तो भगति घर पावे ॥ गुरुकी कृपा सकल अंजोरा । गुरु कृपा जिव परे न भोरा ॥ ३ ॥ गुरु मिले तो शब्द लखावे । बिन गुरुके भव भटका खावे । का गिरही वैरागी भाई । गुरु कृपा सकलो तरिजाई ॥४॥ सार नाम सतगुरु सो पावे । नाम डोर गहि लोक सिधावे ॥ धरमराय ताको सिर नाई । जो हंसा सतगुरु पहुँ जाई ॥ ५ ॥
सा०-सतगुरु महिमा अनंत है, अनन्त करै उपकार ।
ई भवसिंधु अगाधते, तुरते उतारे पार ॥ रमैनी १४-सतगुरु चरननकी बलिहारी । करै सुखी सब कष्ट निवारी ॥ चच्छु हीन जिमि पावे नैना । होवै ज्ञान सुनत गुरु वैना ॥ १ ॥ सार शब्द सु विदेह सुरूपा । निअच्छर वहिरूप अनुपा ॥ कहन सुननको शब्द चौधारा । सार शब्द सो जीव उबारा ॥२॥ सो निज शब्द गुरुसो पावे । पाइ शब्द सतलोक सिधावे ॥ धर्मदास तुम हंस अंकुरी । मोहि मिले कीन्ह दुख दूरी ॥३॥ जस तुम कीन्ह मो सन नेहा । तजि धन धाम नारि सुत गेहा ॥ आगे शिष जो यहि विधि करिहैं । गुरु चरनन मन निश्चल धरिहैं ॥४॥ गुरुके चरन प्रीति तन धारे । तन मन धन सतगुरु पर वारे ॥ सो जिव मोहि अधिक प्रिय होई । तो कई रोक सकै नहिं कोई ॥ ५ ॥
सा०-सरवस वारे चरनमें, शरण रहै लपटाय ।
सो जिव पावे मोहिको, रहै काल सुरझाय ॥
रमैनी १५-सिष होय सरवस नहिं वारे । हिये कपट सुख प्रीति उचारे ॥ सो जिव कैसे लोक सिधाई । बिन गुरु मिले मोहि नहिं पाई ॥१॥ गुरुसे करै कपट चतुराई । सो हंसा भव भरमें आई ॥ जो जन गुरुकी निन्दा करई । सूकर स्वान गरभमें परई ॥ २ ॥
(५३२)
कवीरपंथी—
चौरासी भरमें सो जाई । नारद साख कहौ समझाई ॥ नारद ब्रह्मा सुत बड ज्ञानी । अहैं प्रसिद्ध जगत सब जानी ॥ ३ ॥ सो गुरुको छोट बखाना । ताके मन अभिमान समाना ॥ ताते हरि चौरासी दीना । सकलो पुण्य छीन सो लीन्हहा ॥ ४ ॥ छूटन राह कहा करि ओही । विनु गुरु शरण मुक्ति नहिं सोही ॥ ओही गुरु सो करे बचावा । दूसर मारग नाहिं दिखावा ॥ ५ ॥ सा०—वेद किताब शास्त्र अरु, पोथी कहत पुरान ।
गुरु विन भवसागर महा, छूटे नाहिं निदान ॥
रमैनी १६—गुरुकी शरणा लीजै भाई । जाते जीव नरक नहिं जाई ॥ गुरु मुख हो परम पद पावे । चौरासीमें बहुरि न आवे ॥ गुरु पद सेवे विरला कोई । जापर कृपा साहिबकी होई ॥ गुरु विन मुक्त न पावे भाई । नरक उर्द्ध मुख बासा पाई ॥ गुरुकी कृपा कटे यम फाँसी । विलंब न होय मिले अविनासी ॥ गुरु विनु काहु न पाया ज्ञाना । ज्यों थोथा भुस छडे किसाना ॥ गुरु महिमा शुक्रदेव जु पाई । चढि विमान वैकुंठे जाई ॥ गुरु विनु पढै जो वेद पुराना । ताको नाहिं मिले भगवाना ॥ गुरु सेवा जो करे सुभागा । माया मोह सकल भ्रम भागा ॥ गुरुकी नाव चढे जो प्राणी । खेह उतारे सतगुरु ज्ञानी ॥ तीरथ वरत अरु सब पूजा । गुरु विन दाता और न दूजा ॥ नौ नाथ चौरासी सिद्धा । गुरुके चरण सेवे गोविंदा ॥ गुरु विन प्रेत जनम सब पावे । वरष सहस्र गरभ सो रहावे ॥ गुरु विनु दान पुण्य जो करई । मिथ्या होय कबहुँ नहिं फरई ॥ गुरु विनु भरम न छूटे भाई । कोटि उपाय करे चतुराई ॥ गुरु विन होम यज्ञ जो साधे । औरो मन दश पातक लाधे ॥ सतगुरु मिले तौ अगम बतावे । जमकी आँच ताहि नहिं आवे ॥ गुरुके मिले कटे दुख पापा । जनम
शब्दावली
(५३३)
जनमको मिटे संतापा ॥ गुरुके चरण सदा चित दीजे । जीवन जन्म सुफल कर लीजे ॥ गुरुके चरण सदा चित जानो । क्यों भूले तुम चतुर स्यानो ॥ गुरु भगता मम आतम सोई । वाके हिरदे रहो समोई ॥ गुरु सुख ज्ञान ले चेतो भाई । मानुष जन्म बहुरि नहि पाई ॥ सुख संपति आपन नहि प्राणी । समझि देखु तुम निश्चय जानी ॥ चौविस गुरु हरि आपहि करिया । गुरु सेवा हरि आपहि धरिया ॥ गुरुकी निंदा सुने जो काना । ताको निश्चय नरक निदाना ॥ दशवाँ अंश गुरुको दीजे । जीवन जनम सुफल कर लीजे ॥ गुरु सुख प्राणी कोइ न दीजे । ह्रिदय नाम सदा रस पीजे ॥ गुरु सीढी चढ़ि ऊपर जाई । सुखसागरमें रहे समाई ॥ अपने सुख निंदा जो करई । शूकर स्वान जनम सो धरई ॥ निगुरा करे मुक्ति कर आसा । कैसे पावे मुक्ति निवासा ॥ औरो सुकित देइ जो पावे । सतगुरु बिन मुक्ती नहि आवे ॥ गौरी शंकर और गनेशा । सबही लीन्हा गुरु उपदेशा ॥ शिव विरंचि गुरु सेवा कीन्हा । नारद दीक्षा ध्रुवको दीन्हा ॥ सतगुरु मिले परम सुखदायी । जनम जनमका दुख नसायी ॥ जब गुरु किया अटल अविनासी । सुर नर मुनि सब सेवक रासी ॥ भवजल नदिया अगम अपारा । गुरु विनु कैसे उतरे पारा ॥ गुरु विनु आतम कैसे जाने । सुखसागर कैसे पहिचाने ॥ भक्ति पदार्थ कैसे पावे । गुरु विनु कौन जो राह बतावे ॥ गुरु सुख नाम देव रेदासा । गुरु महिमा उनहूँ परकासा ॥ तैतिस कोट देव त्रिपुरारी । गुरु विनु भूले सकल अचारी ॥ गुरु विनु भरमें लख चौरासी । जनम अनेक नरकके वासी ॥ गुरु विनु पसू जनम सो पावे ॥ फिर २ गरभ बासमें आवै ॥ गुरु विमुख सोई दुख पावे । जनम जनम सोई डहकावे ॥ गुरु सेवै जो चतुर स्याना । गुरु पटतर कोइ और
(५३४)
कबीरपंथी—
न आना ॥ गुरुकी सेवा मुक्ति निज पावे। बहुरि न हंसा भवजल आवे ॥ भवजल छूटत यही उपाई। गुरुकी सेवा करो सब धाई ॥
सा०-मतगुरु दीनदयाल है, देवे भक्ति मुकाम। मनसा वाचा कर्मना, सुमिरो मतगुरु नाम ॥ सत्य सबदके पटतरे, देवेको कछु नाहिं। कहले गुरु संतोषिये, हवस रही मनमाहिं ॥ अति ऊँडा गहरा घना, बुद्धिवन्त मतिधीर। सो धोखा विरचे नहीं, सतगुरु मिलहि कवीर ॥
रमैनी १७-गुरु देवनकी महिमा वरनो। जयगुरुदेव तुम्हारी सरनो ॥ गावत जे गुन पार न पावे। ब्रह्मा शंकर सेष गुन गावे ॥ प्रथमहीं गुरु ऐसा कीन्हा। तारक मंत्र रामको दीन्हा ॥ माथा तिलक दिया सरूपा। जाको बन्देराजा भूपा ॥ ज्ञान गुरु उपदेश बताया। दया धरमकी राह चिन्हाया ॥ जीव दया घटहीमें होई। जीव दया ब्रह्म है सोई ॥ गुरु आधीन सु चेला बोले। खरा शब्द उर अन्तर खोले। खारा मीठा बचने खमैं। गुरुके चरणों चेला रमैं ॥ भीतर हिरदे गुरुसों हिले। ताके पीछे रामहिं मिले ॥ गुरु रीझे सो कीजे कामा। ताके पाछे रामहिं रामा। सिस सरसती गुरु जमुना अंगा। राम मिले सब सरिता गंगा ॥ चेला गुरुमें गुरुमें राम। भगति महात्म नियारा नाम ॥ गुरु आज्ञा निरबाहे नेम। तब पावे सरवग्गी प्रेम ॥ सरवग्गी राम सकल घट सारा। है सबहीमें सबसो न्यारा ॥ ऐसी जाने मनमें रहे। खोजे बूझै तासो कहै ॥ गुरुकी महिमा संछेप भनी। गुरुकी महिमा अनंत घनी ॥ औतार धरे हरि गुरु करे। गुरु किये तब नारद तरे ॥ साख पुरातम ऐसी सुनी। बात हमारी गुरुसों बनी ॥ कीडी जैसा मैं हौ दासा। पडा रहा गुरु चरणों पास ॥ गुरु चरणों राखो विश्वासा। गुरुहि पुरावे मनकी आसा ॥
शब्दावली
(५३५)
सा०-गुरु गोविन्द अरु सिष मिलि, कीन्हा भक्ति विवेक । तिर- बेनी धारा बही, आगे गंगा एक ॥ गुरुकी महिमा अनंत है, मोसो कही न जाय । तन मन गुरुको सौंपिकै, चरणों रहो समाय ॥
रमैनी १८-गुरु सतपद भवु अमृत बानी । गुरु बिनु सुक्ति नहीं रे प्राणी ॥ गुरु आदि गुरु अन्त ज्ञाता । गुरु हैं सुकति पदा- रथ दाता । गुरु गंगा कासी अस्थाना । चार वेद गुरु गमसे जाना ॥ अरसठ तीरथ भरमि भरमि आवे । सो फल गुरुके चरणों पावे ॥ गुरुको तजै भजै जो आना । ता पसुआको फोकट ज्ञाना ॥ गुरु पारस परसे जो कोई । लोहाते जिव कंचन होई ॥ सुक गुरु किये जनक विदेही । सो भै गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु ग्रहलाद पढाये । भगति हेतु जिन दरसन पाये ॥ काकभुसुंड संभु गुरु कीन्हा । अगम निगम सबही कहि दीन्हा ॥ ब्रह्मा गुरु अगिनको कियेऊ । होम जग्य जिन विद्या दियेऊ ॥ वशिष्ठ सुनि गुरु किये रघुनाथा । पाये दरसन भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा सरना । पाये भगति तब तारन तरना ॥ नारद उप- देश धिमरसे पाये । चौरासीसे तुरत बचाये ॥ गुरु कह सोई है सांचा । बिनु परचे सेवक है कांचा ॥ गुरु समरथ सबके पारा । गहे शरण उतरे भवपारा ॥ कहैं कवीर गुरु आप अकेला । दशो औतार गुरुका चेला ॥
सा०-राम कृष्णसों को बडा, तिनहु तो गुरु कीन्ह । तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन ॥ हरिसेवा युगचार है, गुरु सेवा फल एक । तासु पटन्तर ना तुले, संतन किया विवेक ॥
गुरुउपदेश महिमा ।
दोहा-गुरु संत वन्दन करूं, ऐहै सुखको पूर । गुरु महिमा बरनन करूं, शिर धरि पद रज धूर ॥
(५३६)
कवीरपंथी-
संत सबै शिर ऊपरे, निसप्रेही निज नाम । सबके मस्तक मुक्ति गुरु, पुरवे मनके काम ॥
रमैनी १९-परब्रह्मको आदि मनाऊँ । जिनकी किया गुरु चर- नन पाऊँ ॥ गुरु सोई सब सिरजन हारा । गुरुकी किया होय भवपारा । गुरु बिन होम जग्य नहीं कीजे । गुरुकी आज्ञा माहि रहीजे ॥ गुरु संतनके चरण मनायो । ताते बुद्धि उत्तम मैं पायो ॥
सबी इष्टनमें सतगुरु सारा । सो सुमिरावे पुरुष हमारा ॥ सरन होय शिष आवैं काई । सहज पदार्थ पावैं सोई ॥ गुरु सुरतरु सुरधेनु समाना । आवैं चरन मुक्ति परवाना ॥ मन वांछित फल पावैं सोई । प्रीति सहित जो सुमिरे कोई ॥ तन मन धन अरपि गुरु सेवै । होय गलतान उपदेशहिं लेवैं ॥ गुरु विनु पदार्थ और न जानै । आज्ञा मेटि और नहीं मानै ॥ सतगुरुकी गति हिरदे धारे । और सकल बकवाद निवारै ॥ गुरुके सन्मुख वचन न कहै । सो सिष रहनि गहनि सुख लहै ॥ गुरुसे वैर करै शिष जोई । भजन नाश अरु बहुत विगोई ॥ पीठि सहित नरकमें परिहै । गुरु आज्ञा सिष लोप न करिहै ॥ चेलो अथवा उपासक होई । गुरु सन्मुख ले झूठ संजोई ॥ निश्चय नरक परै सिष सोई । वेद पुराण भनत सब कोई । सन्मुख गुरुकी आज्ञा धारे । अरु पाछे तै सकल निवारै ॥ सो शिष घोर नरकमें परिहै । रुधिर राध पीवैं नहीं तरिहै ॥ मुखपर वचन करै परमाना । घर पर जाय करै विज्ञाना ॥ जहैं जावैं तहैं निंदा करई । सो सिष क्रोध अगिन ते जरई ॥ ऐसे सिषको ठोहर नाही । गुरु मुख लोपत है मनमाहीं ॥ वेद पुराण कहै सब साखी ॥ साखी सबद सबै यों भाखी ॥ मानुष जन्म पायकर खोवैं । सतगुरु विमुखा जुगजुग रोवैं ॥ ताते सतगुरु सरना लीजै । कपट भाव सब दूर करीजै ॥ जोग
शब्दावली
(५३७)
जग्य तप दान करावै । गुरु विमुख फल कबहुँ न पावै ॥ गुरुही जप तप तीरथ कहिये । गुरुते साच अरु मिथ्या लहिये । सत- गुरु बिना मुक्ति नहिं कोई । ऊंच नीच भावै जो होई ॥ आतम ब्रह्म गुरु है मेरा । ताके सरने आयो चेरा ॥ चार जुगन जे संतहि भयऊ । ब्रह्मरूप होय पारहि गयऊ ॥ सो जानहु गुरु संग प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन उपाऊ ॥
सा०-गुरु आज्ञा जिन जिन लही, सारो सकल विधि काज ।
नरक रूप जग दूर धर, श्री गुरु महाराज ॥
शिव्यकी अधीनता ।
रमैनी २०-दोउ कर जोरि गुरुके आगे । करि बहु विन्ती चरनन लागे ॥ अति शीतल बाले सब बैना । मेटै सकल कप- टके भैना ॥ हे गुरु तुम ही दीनदयाला । मै हूँ दीन करो प्रति- पाला ॥ बंदीछोर मै अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥ दै उपदेश गुरु मंत्र सुनाओ । जनम मरन भवदुःख छुडाओ ॥ यों अधीन होय सिष जबहीं । सिष पर कृपा करि गुरु तबहीं ॥ गुरुसे शिष जब दीच्छा मांगै । मन क्रम वचन धरै धन आगे ॥ ऐसी प्रीति देखि गुरु जबहीं । गुप्त मंत्र कहै गुरु तबहीं ॥ भगति मुक्तिको पंथ बतावै । बुरो होनको पंथ छुडावै ॥ ऐसे शिष उपदेशहिं पाई । होय दिव्य दृष्टि पुरुषपै जाई ॥
गुरुसेवा माहात्म्य ।
गंगा यमुना बन्दीस समेतै । जगन्नाथादि धाम हैं जेतै ॥ सेवे फल प्राप्त होय न जेतो । गुरु सेवामें पावै फल तेतो ॥ गुरु महा- तमको वार न पारा । वरने सिव सनकादिक अवतारा ॥ गुरु महिमा मोपै वरनि न जाई । महिमा अनंत मम मति लघुताई ॥
गुरु भावना ।
गुरुको पुरुष ब्रह्मकर जाने । और भाव कबहुँ नहिं आने ॥
(५३८)
कवीरपंथी-
काम क्रोध रहित गुरु मेरा । पाप पुण्यका करत निवेरा ॥ काम क्रोध लोभ गुरु जाना । तो शिष जानहु तीन समाना ॥ यही दृष्टिसे गुरुको सेवै । तब तन मन धन गुरुको देवै ॥ तनकरि टहल करै गुरु सेवा । सौ शिष लहै सुकतिको भेवा ॥ बचन उचारे पुढुप सम बानी । द्रव्य लगावै गुरुहित जानी ॥ ऊँच नीच सबही सुनि लीजै । कवीर बचन प्रमान करीजै ॥ मोहिँ और कछू नहिँ चाहिये । गुरु भावना गुरु हिय लहिये ॥ दोहा-सात द्रौप नौ खण्डमें, औ इकीस ब्रह्मंड । सतगुरु विना न बाचिहौ, काल बडो परचंड ॥
रमैनी २१-यही भाव भक्तिका लक्षण कहिये । गुरुके भाव बिन भवजल बहिये ॥ जिन बातनसे गुरु दुख पावे । तिन बातनको दूर बहावे ॥ वेद पुराण सबै मिलि गावै । नेमी धर्मी चौरासिन जावै ॥ अष्ट अंगसो दंड परनामा । संध्या प्रात करै निषकामा ॥ गुरुको शिष ऐसे नहिँ मानै । तीन ताप जर चारो खानै ॥ जोगी जती तप आसरमा । बिनु गुरु कोउ न जानै मरमा ॥
गुरुचरणोदक माहात्म्य ।
कोटिक तीरथ सब कर आवै । गुरु चरणाफल तुरतहि पावै ॥ चरनामृत कदाचित पावै । चौरासी गत लोक सिधावै ॥ कोटिक जप तप करै करावै । वेद पुराण सबै मिलि गावै ॥ गुरुपद रज मस्तक पर देवै । सो फल तत्कालहि लेवै ॥
दोहा-गुरु चरणोदक अनन्त फल, हमते कही न जाय । मनकी पुरवै कामना, लेवे चित्त लगाय ॥ सतगुरु समान को हितू, अन्तर करो विचार । कागा सो हंसा करै, दरसावै ततसार ॥ गुरु महिमा ग्रंथ यह, कहै कवीर समझाय । पाप ताप सबही हुरै, अमर लोक लै जाय ॥
इति गुरु महिमाकी रमैनी ।
शब्दावली
(५३९)
अथ ज्ञानदीपककी रंमैनी प्रारम्भ ।
रमैनी १३-का कहिये कछु कही न जाई । तुम पंडित लाओ ठहराई ॥ बाभनकी बेटी जोगीको वेटा । दोनो मिल संजोग संजोटा ॥ अचरज एक भया जिय भारी । कन्या होय पिताकी नारी ॥ माई घर बहिनी जाई । सात पतोह को सौत कहाई ॥ सुन जोगी तैं क्या कर जोगा । घर घर सबके यह संयोगा ॥ कन्याको कंथ कंथको पूता । पिताका कंथ होय सुन दूता ॥ इनको जान पिता नहिं सेवे । पाषाण परतिमा पूजा देवे । बाल-भोग करि पागे लाई । आपे घंट बजाये खाई ॥ अति प्रसन्न जोग वोहि लाया । मगन होय तब आपुहिं खाया ॥ ना कछु लेइ न देवे देवा । कारण कौन करे तू सेवा ॥ देव न बोले आपहिं बोले । देव न डोले आपहिं डोले ॥ जैसा गुरु सिखावन दीन्हा । तैसा सिष हिरदय धरिलीन्हा ॥
समै-यहि संयोग सुवा सब कोई, कीन्ह न कोइ विचार ।
कहे कवीर चारो युग करता, सबमें फिरा पुकार ॥
रमैनी १४-केते मगन होय मनमें भूले । केते पंडित पढ़ गरबहिं भूले ॥ केते करते सेवा पूजा । तुही निरंजन और न दूजा ॥ केते तजत अन्न औ नारी ॥ केते रहते दूधा धारी ॥ केते कनफटा कहावत योगी । केते संयोगते होत बियोगी ॥ केते तीरथ बरत सुन पावा । केते पीर औ नबी मनावा ॥ केते जटा राख सिर धारी । केते भये संयोग बिचारी ॥ केते बांग निमाज गुजारा । केते भये नटवा व्रत धारा ॥ केते होम जग्य करवावे । केते नित
१---इस रमैनीको एकही प्रति सत्यलोकवासी सदगुरु श्री महंत शंभुदास साहबसे स १९६२ में मिली थी जिस परसे यह कापी उतारी गयी थी, काल भगवानकी कृपासे वह मूल भी जाता रहा और इस कापीके भी कुछ पन्ने सड़ गये इसलिए तैरहवीं रमैनीसे आरंभ होता है । विशेष वृत्तान्त प्रस्तावना और परिशिष्टमें देखना चाहिये ।
(५४०)
कवीरपंथी—
उठि देव मनावे॥ केते मन भगतीमें दीने । केते सदा रसभोगमें लीने ॥ सबहि फंसे तीन लोककी बारी । विधाता रची भूली सृष्टी सारी ॥
समै०—आस करे सुन्य नगरकी, जहां करता कोय ।
कहैं कवीर बूझो जिव अपने, जाते भरम न होय ॥
रमैनी १५—बोले कवीरा अमृत बानी । बरसे कामर भीजे पानी ॥ चले बटोही हाटे बाटा । सोवनहारके सिरपर खाटा ॥ तुरसाको नित चीरे बांसा । छेरी बेचे चिकवाके मासा ॥ राजा परजा रैयत राई । बिन जंत्री नित बाजा बजाई ॥ तर गागर ऊपर पनिहारी । लडकाके गोद खेले महतारी ॥ ब्राह्मणकी बिटिया व्याहे बानी । सिंहके घर गऊ भइ रानी ॥ बरसे धरती सूरज नहाई । समुद्रका पाना अकासे जाई । चेलाके गुरू लागे पाई । पहिले पुत्र पाछे भइ माई ॥ अचरज एक देखो किन कोई । माता भई पुत्र जोई ॥
स०—सब जग भूला एक न भूला, भूला सब संसार ।
कहैं कवीर बूझो तुम ज्ञानी, करके अपन विचार ॥
तिर देवा गये जात न जाने, गये साधक अवधूत ।
कहैं कवीर पहिचानो ज्ञानी, पांचो आतम भूत ॥
रमैनी १६—आवो पंडित करो विचारा । सुत माता संयोग व्योहारा ॥ त्रिया चरित्र आदि चलि आया । माता निर्गुन पिता बताया ॥ इच्छा सुरूप भई इक नारी । गायत्री नाम धरा संसारी ॥ ब्रह्मा पढे न और बतावे । भेद अभेद बरन कुल लावे ॥ तरपन संध्या करे चित लाई । सुच्छम लिंग जोत ठहराई ॥ आप न जाने पूजे देवा । उसको अंधा लखे न भेवा ॥ पाहन करि पूजे नित देवा । चेतन होयके करे जड सेवा ॥ आप अपन
शब्दावली
(५४१)
नहीं चीन्हे कोई । आपहि करता आपहि होई ॥ जहां नाहि कुछ तहांकी आसा । सुन्य नगर जहँ कहे ब्रह्म बासा ॥
समै-यह दुबधा मिलि दुचित भये, कैसे न चीन्हे मूल ।
कहँ कवीर तिरगुन गुणा भूले, यही सबनकी भूल ॥
रमैनी १७-एक अचंभा देखो आई । गउ अकाश धरती खोर जमाई ॥ तुम्बा डूबा सिल उतरानी । बरेड़ी चढे ओरिया- का पानी ॥ जे गुरु कहे करे सिष सोई । गुरुका बचन तजे न कोई ॥ जोत निरंजन कहे निरंकारा । गुरु मंत्र यह सबन पुकारा ॥ परंपरा ऐसी चलि आई । अबहीं औरू कैस चलाई ॥ जोगी जंगम जती संन्यासी । सुर नर मुनि सब भये उदासी ॥ करता सबका सिरजन हारा । बिना विचार न उतरे पारा ॥ यह करता को रूप तुम्हारा । करता चीन्हो बूझ विचारा ॥
समै-सब जग दूढे हाथ न आवे, ना है पुरुष बिदेह ।
कहँ कवीर करता तुम चीन्हों, छोड़ो झूठ सनेह ॥
रमैनी १८-जब जिवमें आवे परतीता । तब यह मन होय अतीता ॥ भई परतीत मिटा दुख दुंदा । धोखा मिटा भया अनंदा ॥ मगन हुआ रहा ठहराई । हंस परमहंसकी संस मिटाई ॥ धोखा मिटा भया सुख चैना । किसका नाम जपे दिन रेना ॥ सुरत डोरते चेत न अंधा । निसि बासर करे नित धंधा ॥ सेवक स्वामी और विचारा । आसा लाय तजा घर बारा ॥ करे विस- वास नित पूजे देवा । धोखा भया रैन दिन सेवा ॥ धोखा लगि जब तीरथ धावा । दौड़ि गया तहँ देव न पावा ॥ भया निरास नहीं कछु पाया । ज्यों छीरते धिव विनसाया ॥
समै-चेतो किन तुम चेतो, परमहंस संयोग ।
कहँ कवीर करता नहीं एते, पाँचोंमें सुख भोग ॥
(५४२)
कवीरपंथी-
रमैनी १९-हरि ब्रह्मा भूले त्रिपुरारी। इन भूलत भूली संसारी॥ सनक सनंदन भूले वोऊ। नारद शारद भूले सोऊ॥ गोरख भूले भूले हनुमाना। सुनि वशिष्ठ तिनहुं नहिं जाना॥ परहलाद पारासर भूले तेऊ। गौतम लोमस भूले एऊ॥ इन्द्र कुबेर भूले बहु भांती। जमदग्निअग्नि छ भरमाती॥ भूलेपीर नबी औलिया। भूले गौस कुतुब मौलिया॥ भूले यह सब नेजा धारी। इनके संग भूले संसारी॥
समै-देव पैगम्बर रिषि मिलि, इनही माना भूल ।
निराकारमें यह सब अटके, यही सबनकी भूल ॥
रमैनी २०-कासे कहूं मैं यह दुख रोई जासों कहों सो वैरी होई॥ कहा न माने मोर सुत नारी। कहत कहत मोर रसना हारी॥ गन गंधर्व सुनि माने न देवा। सबते कहा अपन हम भेवा॥ देवी देव बसे सब आई। भूत प्रेत बसे बहुताई॥ गन गंधर्व सुनि तपी संन्यासी। जिया जोनि लाख चौरासी॥ सौ सुत और जो जन्म माया। घर घर तिनका भया बसाया॥
समै-हमारा यह सब कीन कराया, हमहीं बस परगौंव ।
कहे कवीर सबको जगह, हमको नाही ठाँव ॥
हमरे काज हम सब कीना, बसा पुरुष इक आय ।
रूप न रेखा अंग विहूना, घट घट रहा समाय ॥
रमैनी २१-मैं तोहि पूछो पंडित ज्ञानी। पिरथी अकास रहे नहिं पानी॥ सुक्षम स्थूल रहे नहिं कोई। बिराट सहित परले सब होई॥ तबहि बिराट काहि अधारा। तब वेद जाप जर होवे छारा॥ होय अलोप जब रवि औ चन्दा। तब कापर रहे बाल मुकुन्दा॥ यह अचरज मोहिं निसि दिन भाई। दुरमत मेट मोहिं देहु बताई॥
शब्दावली
(५४३)
समै-अमित वस्तु सब मेटे, जो मेटे सो प्रमान । मिटतन कीन्ह सनेहरा, आपइ मिटे निदान ॥ पैँडे सब जग भूलिया, कहैं लग कहौं समुझाय । कहैं कवीर अब क्या कीजे, जगते कहा बसाय ॥
रमैनी २२-प्रथम मन्त्र विरंचि एक कीन्हा । यह आयसु मातु मोहिं दीन्हा ॥ निराकार निरगुन सो देवा ॥ ताका काहू लखा न भेवा ॥ पग नाहीं पै सब कहिं जाई । कर नहिं पै सबहिं कराई ॥ हिय नाहीं पै सब कछु बोला । गुण नाहीं पै गुणो अमोला ॥ सरवन नाहिं पै सबे सुनावे । बिन रसना वह सब गुन गावे ॥ बिन नैनन देखे संसारा । बिन नासा ले बास अपारा ॥ जीव नहीं पै जियत गुसाई । घटघट पूर रहा हुनियाई ॥
समै-ब्रह्मा यह समझे नहीं, विना बीज कछु नाहिं ।
कहैं कवीर जो उन कहो, सो राखो मन माहिं ॥
रमैनी २३-वेद किताब न झूठा होई । जो न विचारे झूठा सोई ॥ नरकी नारी जो मर जाई । के तो जन्मे की नरक समाई ॥ पिंडा तरपन जब तुम कीन्हा । कहो पंडित उन कैसे लीना ॥ कुंभक भरभर जल ढरकावे । जिवत न मिले मरे का पावे ॥ जलसे जल ले जलमें दीन्हा । पित्रन जल पिंडा कब लीन्हा ॥ वनखंड मांझ परा सब कोई । मनकी भटक तजे न सोई ॥ आप-नके छुंवन करे विचारा । करता न लखा परा भर्म जारा ॥ पर-मपरा जैसी चलि आई । तामें समझ रहा बिलमाई ॥
समै-वेद हमारा भेद है, हम हीं वेदों माहिं । जिस विधि न्यारे हम रहें, सो कोइ जाने नाहिं ॥ हारिल लकड़ी ना तजे, नर नाहीं छोडे टेक । कहैं कवीर गुरु शब्द ते, पकड़ रहा वह एक ॥ धरतः बेल लगायके, फल दूँढत आकास । कहैं कवीर