कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
काम क्रोध रहित गुरु मेरा । पाप पुण्यका करत निवेरा ॥ काम क्रोध लोभ गुरु जाना । तो शिष जानहु तीन समाना ॥ यही दृष्टिसे गुरुको सेवै । तब तन मन धन गुरुको देवै ॥ तनकरि टहल करै गुरु सेवा । सौ शिष लहै सुकतिको भेवा ॥ बचन उचारे पुढुप सम बानी । द्रव्य लगावै गुरुहित जानी ॥ ऊँच नीच सबही सुनि लीजै । कवीर बचन प्रमान करीजै ॥ मोहिँ और कछू नहिँ चाहिये । गुरु भावना गुरु हिय लहिये ॥ दोहा-सात द्रौप नौ खण्डमें, औ इकीस ब्रह्मंड । सतगुरु विना न बाचिहौ, काल बडो परचंड ॥
रमैनी २१-यही भाव भक्तिका लक्षण कहिये । गुरुके भाव बिन भवजल बहिये ॥ जिन बातनसे गुरु दुख पावे । तिन बातनको दूर बहावे ॥ वेद पुराण सबै मिलि गावै । नेमी धर्मी चौरासिन जावै ॥ अष्ट अंगसो दंड परनामा । संध्या प्रात करै निषकामा ॥ गुरुको शिष ऐसे नहिँ मानै । तीन ताप जर चारो खानै ॥ जोगी जती तप आसरमा । बिनु गुरु कोउ न जानै मरमा ॥
गुरुचरणोदक माहात्म्य ।
कोटिक तीरथ सब कर आवै । गुरु चरणाफल तुरतहि पावै ॥ चरनामृत कदाचित पावै । चौरासी गत लोक सिधावै ॥ कोटिक जप तप करै करावै । वेद पुराण सबै मिलि गावै ॥ गुरुपद रज मस्तक पर देवै । सो फल तत्कालहि लेवै ॥
दोहा-गुरु चरणोदक अनन्त फल, हमते कही न जाय । मनकी पुरवै कामना, लेवे चित्त लगाय ॥ सतगुरु समान को हितू, अन्तर करो विचार । कागा सो हंसा करै, दरसावै ततसार ॥ गुरु महिमा ग्रंथ यह, कहै कवीर समझाय । पाप ताप सबही हुरै, अमर लोक लै जाय ॥
इति गुरु महिमाकी रमैनी ।