भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५३७)

जग्य तप दान करावै । गुरु विमुख फल कबहुँ न पावै ॥ गुरुही जप तप तीरथ कहिये । गुरुते साच अरु मिथ्या लहिये । सत- गुरु बिना मुक्ति नहिं कोई । ऊंच नीच भावै जो होई ॥ आतम ब्रह्म गुरु है मेरा । ताके सरने आयो चेरा ॥ चार जुगन जे संतहि भयऊ । ब्रह्मरूप होय पारहि गयऊ ॥ सो जानहु गुरु संग प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन उपाऊ ॥

सा०-गुरु आज्ञा जिन जिन लही, सारो सकल विधि काज ।

नरक रूप जग दूर धर, श्री गुरु महाराज ॥

शिव्यकी अधीनता ।

रमैनी २०-दोउ कर जोरि गुरुके आगे । करि बहु विन्ती चरनन लागे ॥ अति शीतल बाले सब बैना । मेटै सकल कप- टके भैना ॥ हे गुरु तुम ही दीनदयाला । मै हूँ दीन करो प्रति- पाला ॥ बंदीछोर मै अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥ दै उपदेश गुरु मंत्र सुनाओ । जनम मरन भवदुःख छुडाओ ॥ यों अधीन होय सिष जबहीं । सिष पर कृपा करि गुरु तबहीं ॥ गुरुसे शिष जब दीच्छा मांगै । मन क्रम वचन धरै धन आगे ॥ ऐसी प्रीति देखि गुरु जबहीं । गुप्त मंत्र कहै गुरु तबहीं ॥ भगति मुक्तिको पंथ बतावै । बुरो होनको पंथ छुडावै ॥ ऐसे शिष उपदेशहिं पाई । होय दिव्य दृष्टि पुरुषपै जाई ॥

गुरुसेवा माहात्म्य ।

गंगा यमुना बन्दीस समेतै । जगन्नाथादि धाम हैं जेतै ॥ सेवे फल प्राप्त होय न जेतो । गुरु सेवामें पावै फल तेतो ॥ गुरु महा- तमको वार न पारा । वरने सिव सनकादिक अवतारा ॥ गुरु महिमा मोपै वरनि न जाई । महिमा अनंत मम मति लघुताई ॥

गुरु भावना ।

गुरुको पुरुष ब्रह्मकर जाने । और भाव कबहुँ नहिं आने ॥