भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

संत सबै शिर ऊपरे, निसप्रेही निज नाम । सबके मस्तक मुक्ति गुरु, पुरवे मनके काम ॥

रमैनी १९-परब्रह्मको आदि मनाऊँ । जिनकी किया गुरु चर- नन पाऊँ ॥ गुरु सोई सब सिरजन हारा । गुरुकी किया होय भवपारा । गुरु बिन होम जग्य नहीं कीजे । गुरुकी आज्ञा माहि रहीजे ॥ गुरु संतनके चरण मनायो । ताते बुद्धि उत्तम मैं पायो ॥

सबी इष्टनमें सतगुरु सारा । सो सुमिरावे पुरुष हमारा ॥ सरन होय शिष आवैं काई । सहज पदार्थ पावैं सोई ॥ गुरु सुरतरु सुरधेनु समाना । आवैं चरन मुक्ति परवाना ॥ मन वांछित फल पावैं सोई । प्रीति सहित जो सुमिरे कोई ॥ तन मन धन अरपि गुरु सेवै । होय गलतान उपदेशहिं लेवैं ॥ गुरु विनु पदार्थ और न जानै । आज्ञा मेटि और नहीं मानै ॥ सतगुरुकी गति हिरदे धारे । और सकल बकवाद निवारै ॥ गुरुके सन्मुख वचन न कहै । सो सिष रहनि गहनि सुख लहै ॥ गुरुसे वैर करै शिष जोई । भजन नाश अरु बहुत विगोई ॥ पीठि सहित नरकमें परिहै । गुरु आज्ञा सिष लोप न करिहै ॥ चेलो अथवा उपासक होई । गुरु सन्मुख ले झूठ संजोई ॥ निश्चय नरक परै सिष सोई । वेद पुराण भनत सब कोई । सन्मुख गुरुकी आज्ञा धारे । अरु पाछे तै सकल निवारै ॥ सो शिष घोर नरकमें परिहै । रुधिर राध पीवैं नहीं तरिहै ॥ मुखपर वचन करै परमाना । घर पर जाय करै विज्ञाना ॥ जहैं जावैं तहैं निंदा करई । सो सिष क्रोध अगिन ते जरई ॥ ऐसे सिषको ठोहर नाही । गुरु मुख लोपत है मनमाहीं ॥ वेद पुराण कहै सब साखी ॥ साखी सबद सबै यों भाखी ॥ मानुष जन्म पायकर खोवैं । सतगुरु विमुखा जुगजुग रोवैं ॥ ताते सतगुरु सरना लीजै । कपट भाव सब दूर करीजै ॥ जोग