भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५३५)

सा०-गुरु गोविन्द अरु सिष मिलि, कीन्हा भक्ति विवेक । तिर- बेनी धारा बही, आगे गंगा एक ॥ गुरुकी महिमा अनंत है, मोसो कही न जाय । तन मन गुरुको सौंपिकै, चरणों रहो समाय ॥

रमैनी १८-गुरु सतपद भवु अमृत बानी । गुरु बिनु सुक्ति नहीं रे प्राणी ॥ गुरु आदि गुरु अन्त ज्ञाता । गुरु हैं सुकति पदा- रथ दाता । गुरु गंगा कासी अस्थाना । चार वेद गुरु गमसे जाना ॥ अरसठ तीरथ भरमि भरमि आवे । सो फल गुरुके चरणों पावे ॥ गुरुको तजै भजै जो आना । ता पसुआको फोकट ज्ञाना ॥ गुरु पारस परसे जो कोई । लोहाते जिव कंचन होई ॥ सुक गुरु किये जनक विदेही । सो भै गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु ग्रहलाद पढाये । भगति हेतु जिन दरसन पाये ॥ काकभुसुंड संभु गुरु कीन्हा । अगम निगम सबही कहि दीन्हा ॥ ब्रह्मा गुरु अगिनको कियेऊ । होम जग्य जिन विद्या दियेऊ ॥ वशिष्ठ सुनि गुरु किये रघुनाथा । पाये दरसन भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा सरना । पाये भगति तब तारन तरना ॥ नारद उप- देश धिमरसे पाये । चौरासीसे तुरत बचाये ॥ गुरु कह सोई है सांचा । बिनु परचे सेवक है कांचा ॥ गुरु समरथ सबके पारा । गहे शरण उतरे भवपारा ॥ कहैं कवीर गुरु आप अकेला । दशो औतार गुरुका चेला ॥

सा०-राम कृष्णसों को बडा, तिनहु तो गुरु कीन्ह । तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन ॥ हरिसेवा युगचार है, गुरु सेवा फल एक । तासु पटन्तर ना तुले, संतन किया विवेक ॥

गुरुउपदेश महिमा ।

दोहा-गुरु संत वन्दन करूं, ऐहै सुखको पूर । गुरु महिमा बरनन करूं, शिर धरि पद रज धूर ॥