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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(५३५)

सा०-गुरु गोविन्द अरु सिष मिलि, कीन्हा भक्ति विवेक । तिर- बेनी धारा बही, आगे गंगा एक ॥ गुरुकी महिमा अनंत है, मोसो कही न जाय । तन मन गुरुको सौंपिकै, चरणों रहो समाय ॥

रमैनी १८-गुरु सतपद भवु अमृत बानी । गुरु बिनु सुक्ति नहीं रे प्राणी ॥ गुरु आदि गुरु अन्त ज्ञाता । गुरु हैं सुकति पदा- रथ दाता । गुरु गंगा कासी अस्थाना । चार वेद गुरु गमसे जाना ॥ अरसठ तीरथ भरमि भरमि आवे । सो फल गुरुके चरणों पावे ॥ गुरुको तजै भजै जो आना । ता पसुआको फोकट ज्ञाना ॥ गुरु पारस परसे जो कोई । लोहाते जिव कंचन होई ॥ सुक गुरु किये जनक विदेही । सो भै गुरुके परम सनेही ॥ नारद गुरु ग्रहलाद पढाये । भगति हेतु जिन दरसन पाये ॥ काकभुसुंड संभु गुरु कीन्हा । अगम निगम सबही कहि दीन्हा ॥ ब्रह्मा गुरु अगिनको कियेऊ । होम जग्य जिन विद्या दियेऊ ॥ वशिष्ठ सुनि गुरु किये रघुनाथा । पाये दरसन भये सनाथा ॥ कृष्ण गये दुर्वासा सरना । पाये भगति तब तारन तरना ॥ नारद उप- देश धिमरसे पाये । चौरासीसे तुरत बचाये ॥ गुरु कह सोई है सांचा । बिनु परचे सेवक है कांचा ॥ गुरु समरथ सबके पारा । गहे शरण उतरे भवपारा ॥ कहैं कवीर गुरु आप अकेला । दशो औतार गुरुका चेला ॥

सा०-राम कृष्णसों को बडा, तिनहु तो गुरु कीन्ह । तीन लोक के वे धनी, गुरु आगे आधीन ॥ हरिसेवा युगचार है, गुरु सेवा फल एक । तासु पटन्तर ना तुले, संतन किया विवेक ॥

गुरुउपदेश महिमा ।

दोहा-गुरु संत वन्दन करूं, ऐहै सुखको पूर । गुरु महिमा बरनन करूं, शिर धरि पद रज धूर ॥

(५३६)

कवीरपंथी-

संत सबै शिर ऊपरे, निसप्रेही निज नाम । सबके मस्तक मुक्ति गुरु, पुरवे मनके काम ॥

रमैनी १९-परब्रह्मको आदि मनाऊँ । जिनकी किया गुरु चर- नन पाऊँ ॥ गुरु सोई सब सिरजन हारा । गुरुकी किया होय भवपारा । गुरु बिन होम जग्य नहीं कीजे । गुरुकी आज्ञा माहि रहीजे ॥ गुरु संतनके चरण मनायो । ताते बुद्धि उत्तम मैं पायो ॥

सबी इष्टनमें सतगुरु सारा । सो सुमिरावे पुरुष हमारा ॥ सरन होय शिष आवैं काई । सहज पदार्थ पावैं सोई ॥ गुरु सुरतरु सुरधेनु समाना । आवैं चरन मुक्ति परवाना ॥ मन वांछित फल पावैं सोई । प्रीति सहित जो सुमिरे कोई ॥ तन मन धन अरपि गुरु सेवै । होय गलतान उपदेशहिं लेवैं ॥ गुरु विनु पदार्थ और न जानै । आज्ञा मेटि और नहीं मानै ॥ सतगुरुकी गति हिरदे धारे । और सकल बकवाद निवारै ॥ गुरुके सन्मुख वचन न कहै । सो सिष रहनि गहनि सुख लहै ॥ गुरुसे वैर करै शिष जोई । भजन नाश अरु बहुत विगोई ॥ पीठि सहित नरकमें परिहै । गुरु आज्ञा सिष लोप न करिहै ॥ चेलो अथवा उपासक होई । गुरु सन्मुख ले झूठ संजोई ॥ निश्चय नरक परै सिष सोई । वेद पुराण भनत सब कोई । सन्मुख गुरुकी आज्ञा धारे । अरु पाछे तै सकल निवारै ॥ सो शिष घोर नरकमें परिहै । रुधिर राध पीवैं नहीं तरिहै ॥ मुखपर वचन करै परमाना । घर पर जाय करै विज्ञाना ॥ जहैं जावैं तहैं निंदा करई । सो सिष क्रोध अगिन ते जरई ॥ ऐसे सिषको ठोहर नाही । गुरु मुख लोपत है मनमाहीं ॥ वेद पुराण कहै सब साखी ॥ साखी सबद सबै यों भाखी ॥ मानुष जन्म पायकर खोवैं । सतगुरु विमुखा जुगजुग रोवैं ॥ ताते सतगुरु सरना लीजै । कपट भाव सब दूर करीजै ॥ जोग

शब्दावली

(५३७)

जग्य तप दान करावै । गुरु विमुख फल कबहुँ न पावै ॥ गुरुही जप तप तीरथ कहिये । गुरुते साच अरु मिथ्या लहिये । सत- गुरु बिना मुक्ति नहिं कोई । ऊंच नीच भावै जो होई ॥ आतम ब्रह्म गुरु है मेरा । ताके सरने आयो चेरा ॥ चार जुगन जे संतहि भयऊ । ब्रह्मरूप होय पारहि गयऊ ॥ सो जानहु गुरु संग प्रभाऊ । लोकहु वेद न आन उपाऊ ॥

सा०-गुरु आज्ञा जिन जिन लही, सारो सकल विधि काज ।

नरक रूप जग दूर धर, श्री गुरु महाराज ॥

शिव्यकी अधीनता ।

रमैनी २०-दोउ कर जोरि गुरुके आगे । करि बहु विन्ती चरनन लागे ॥ अति शीतल बाले सब बैना । मेटै सकल कप- टके भैना ॥ हे गुरु तुम ही दीनदयाला । मै हूँ दीन करो प्रति- पाला ॥ बंदीछोर मै अतिहि अनाथा । भवजल बूडत पकड़ो हाथा ॥ दै उपदेश गुरु मंत्र सुनाओ । जनम मरन भवदुःख छुडाओ ॥ यों अधीन होय सिष जबहीं । सिष पर कृपा करि गुरु तबहीं ॥ गुरुसे शिष जब दीच्छा मांगै । मन क्रम वचन धरै धन आगे ॥ ऐसी प्रीति देखि गुरु जबहीं । गुप्त मंत्र कहै गुरु तबहीं ॥ भगति मुक्तिको पंथ बतावै । बुरो होनको पंथ छुडावै ॥ ऐसे शिष उपदेशहिं पाई । होय दिव्य दृष्टि पुरुषपै जाई ॥

गुरुसेवा माहात्म्य ।

गंगा यमुना बन्दीस समेतै । जगन्नाथादि धाम हैं जेतै ॥ सेवे फल प्राप्त होय न जेतो । गुरु सेवामें पावै फल तेतो ॥ गुरु महा- तमको वार न पारा । वरने सिव सनकादिक अवतारा ॥ गुरु महिमा मोपै वरनि न जाई । महिमा अनंत मम मति लघुताई ॥

गुरु भावना ।

गुरुको पुरुष ब्रह्मकर जाने । और भाव कबहुँ नहिं आने ॥

(५३८)

कवीरपंथी-

काम क्रोध रहित गुरु मेरा । पाप पुण्यका करत निवेरा ॥ काम क्रोध लोभ गुरु जाना । तो शिष जानहु तीन समाना ॥ यही दृष्टिसे गुरुको सेवै । तब तन मन धन गुरुको देवै ॥ तनकरि टहल करै गुरु सेवा । सौ शिष लहै सुकतिको भेवा ॥ बचन उचारे पुढुप सम बानी । द्रव्य लगावै गुरुहित जानी ॥ ऊँच नीच सबही सुनि लीजै । कवीर बचन प्रमान करीजै ॥ मोहिँ और कछू नहिँ चाहिये । गुरु भावना गुरु हिय लहिये ॥ दोहा-सात द्रौप नौ खण्डमें, औ इकीस ब्रह्मंड । सतगुरु विना न बाचिहौ, काल बडो परचंड ॥

रमैनी २१-यही भाव भक्तिका लक्षण कहिये । गुरुके भाव बिन भवजल बहिये ॥ जिन बातनसे गुरु दुख पावे । तिन बातनको दूर बहावे ॥ वेद पुराण सबै मिलि गावै । नेमी धर्मी चौरासिन जावै ॥ अष्ट अंगसो दंड परनामा । संध्या प्रात करै निषकामा ॥ गुरुको शिष ऐसे नहिँ मानै । तीन ताप जर चारो खानै ॥ जोगी जती तप आसरमा । बिनु गुरु कोउ न जानै मरमा ॥

गुरुचरणोदक माहात्म्य ।

कोटिक तीरथ सब कर आवै । गुरु चरणाफल तुरतहि पावै ॥ चरनामृत कदाचित पावै । चौरासी गत लोक सिधावै ॥ कोटिक जप तप करै करावै । वेद पुराण सबै मिलि गावै ॥ गुरुपद रज मस्तक पर देवै । सो फल तत्कालहि लेवै ॥

दोहा-गुरु चरणोदक अनन्त फल, हमते कही न जाय । मनकी पुरवै कामना, लेवे चित्त लगाय ॥ सतगुरु समान को हितू, अन्तर करो विचार । कागा सो हंसा करै, दरसावै ततसार ॥ गुरु महिमा ग्रंथ यह, कहै कवीर समझाय । पाप ताप सबही हुरै, अमर लोक लै जाय ॥

इति गुरु महिमाकी रमैनी ।

शब्दावली

(५३९)

अथ ज्ञानदीपककी रंमैनी प्रारम्भ ।

रमैनी १३-का कहिये कछु कही न जाई । तुम पंडित लाओ ठहराई ॥ बाभनकी बेटी जोगीको वेटा । दोनो मिल संजोग संजोटा ॥ अचरज एक भया जिय भारी । कन्या होय पिताकी नारी ॥ माई घर बहिनी जाई । सात पतोह को सौत कहाई ॥ सुन जोगी तैं क्या कर जोगा । घर घर सबके यह संयोगा ॥ कन्याको कंथ कंथको पूता । पिताका कंथ होय सुन दूता ॥ इनको जान पिता नहिं सेवे । पाषाण परतिमा पूजा देवे । बाल-भोग करि पागे लाई । आपे घंट बजाये खाई ॥ अति प्रसन्न जोग वोहि लाया । मगन होय तब आपुहिं खाया ॥ ना कछु लेइ न देवे देवा । कारण कौन करे तू सेवा ॥ देव न बोले आपहिं बोले । देव न डोले आपहिं डोले ॥ जैसा गुरु सिखावन दीन्हा । तैसा सिष हिरदय धरिलीन्हा ॥

समै-यहि संयोग सुवा सब कोई, कीन्ह न कोइ विचार ।

कहे कवीर चारो युग करता, सबमें फिरा पुकार ॥

रमैनी १४-केते मगन होय मनमें भूले । केते पंडित पढ़ गरबहिं भूले ॥ केते करते सेवा पूजा । तुही निरंजन और न दूजा ॥ केते तजत अन्न औ नारी ॥ केते रहते दूधा धारी ॥ केते कनफटा कहावत योगी । केते संयोगते होत बियोगी ॥ केते तीरथ बरत सुन पावा । केते पीर औ नबी मनावा ॥ केते जटा राख सिर धारी । केते भये संयोग बिचारी ॥ केते बांग निमाज गुजारा । केते भये नटवा व्रत धारा ॥ केते होम जग्य करवावे । केते नित

१---इस रमैनीको एकही प्रति सत्यलोकवासी सदगुरु श्री महंत शंभुदास साहबसे स १९६२ में मिली थी जिस परसे यह कापी उतारी गयी थी, काल भगवानकी कृपासे वह मूल भी जाता रहा और इस कापीके भी कुछ पन्ने सड़ गये इसलिए तैरहवीं रमैनीसे आरंभ होता है । विशेष वृत्तान्त प्रस्तावना और परिशिष्टमें देखना चाहिये ।

(५४०)

कवीरपंथी—

उठि देव मनावे॥ केते मन भगतीमें दीने । केते सदा रसभोगमें लीने ॥ सबहि फंसे तीन लोककी बारी । विधाता रची भूली सृष्टी सारी ॥

समै०—आस करे सुन्य नगरकी, जहां करता कोय ।

कहैं कवीर बूझो जिव अपने, जाते भरम न होय ॥

रमैनी १५—बोले कवीरा अमृत बानी । बरसे कामर भीजे पानी ॥ चले बटोही हाटे बाटा । सोवनहारके सिरपर खाटा ॥ तुरसाको नित चीरे बांसा । छेरी बेचे चिकवाके मासा ॥ राजा परजा रैयत राई । बिन जंत्री नित बाजा बजाई ॥ तर गागर ऊपर पनिहारी । लडकाके गोद खेले महतारी ॥ ब्राह्मणकी बिटिया व्याहे बानी । सिंहके घर गऊ भइ रानी ॥ बरसे धरती सूरज नहाई । समुद्रका पाना अकासे जाई । चेलाके गुरू लागे पाई । पहिले पुत्र पाछे भइ माई ॥ अचरज एक देखो किन कोई । माता भई पुत्र जोई ॥

स०—सब जग भूला एक न भूला, भूला सब संसार ।

कहैं कवीर बूझो तुम ज्ञानी, करके अपन विचार ॥

तिर देवा गये जात न जाने, गये साधक अवधूत ।

कहैं कवीर पहिचानो ज्ञानी, पांचो आतम भूत ॥

रमैनी १६—आवो पंडित करो विचारा । सुत माता संयोग व्योहारा ॥ त्रिया चरित्र आदि चलि आया । माता निर्गुन पिता बताया ॥ इच्छा सुरूप भई इक नारी । गायत्री नाम धरा संसारी ॥ ब्रह्मा पढे न और बतावे । भेद अभेद बरन कुल लावे ॥ तरपन संध्या करे चित लाई । सुच्छम लिंग जोत ठहराई ॥ आप न जाने पूजे देवा । उसको अंधा लखे न भेवा ॥ पाहन करि पूजे नित देवा । चेतन होयके करे जड सेवा ॥ आप अपन

शब्दावली

(५४१)

नहीं चीन्हे कोई । आपहि करता आपहि होई ॥ जहां नाहि कुछ तहांकी आसा । सुन्य नगर जहँ कहे ब्रह्म बासा ॥

समै-यह दुबधा मिलि दुचित भये, कैसे न चीन्हे मूल ।

कहँ कवीर तिरगुन गुणा भूले, यही सबनकी भूल ॥

रमैनी १७-एक अचंभा देखो आई । गउ अकाश धरती खोर जमाई ॥ तुम्बा डूबा सिल उतरानी । बरेड़ी चढे ओरिया- का पानी ॥ जे गुरु कहे करे सिष सोई । गुरुका बचन तजे न कोई ॥ जोत निरंजन कहे निरंकारा । गुरु मंत्र यह सबन पुकारा ॥ परंपरा ऐसी चलि आई । अबहीं औरू कैस चलाई ॥ जोगी जंगम जती संन्यासी । सुर नर मुनि सब भये उदासी ॥ करता सबका सिरजन हारा । बिना विचार न उतरे पारा ॥ यह करता को रूप तुम्हारा । करता चीन्हो बूझ विचारा ॥

समै-सब जग दूढे हाथ न आवे, ना है पुरुष बिदेह ।

कहँ कवीर करता तुम चीन्हों, छोड़ो झूठ सनेह ॥

रमैनी १८-जब जिवमें आवे परतीता । तब यह मन होय अतीता ॥ भई परतीत मिटा दुख दुंदा । धोखा मिटा भया अनंदा ॥ मगन हुआ रहा ठहराई । हंस परमहंसकी संस मिटाई ॥ धोखा मिटा भया सुख चैना । किसका नाम जपे दिन रेना ॥ सुरत डोरते चेत न अंधा । निसि बासर करे नित धंधा ॥ सेवक स्वामी और विचारा । आसा लाय तजा घर बारा ॥ करे विस- वास नित पूजे देवा । धोखा भया रैन दिन सेवा ॥ धोखा लगि जब तीरथ धावा । दौड़ि गया तहँ देव न पावा ॥ भया निरास नहीं कछु पाया । ज्यों छीरते धिव विनसाया ॥

समै-चेतो किन तुम चेतो, परमहंस संयोग ।

कहँ कवीर करता नहीं एते, पाँचोंमें सुख भोग ॥

(५४२)

कवीरपंथी-

रमैनी १९-हरि ब्रह्मा भूले त्रिपुरारी। इन भूलत भूली संसारी॥ सनक सनंदन भूले वोऊ। नारद शारद भूले सोऊ॥ गोरख भूले भूले हनुमाना। सुनि वशिष्ठ तिनहुं नहिं जाना॥ परहलाद पारासर भूले तेऊ। गौतम लोमस भूले एऊ॥ इन्द्र कुबेर भूले बहु भांती। जमदग्निअग्नि छ भरमाती॥ भूलेपीर नबी औलिया। भूले गौस कुतुब मौलिया॥ भूले यह सब नेजा धारी। इनके संग भूले संसारी॥

समै-देव पैगम्बर रिषि मिलि, इनही माना भूल ।

निराकारमें यह सब अटके, यही सबनकी भूल ॥

रमैनी २०-कासे कहूं मैं यह दुख रोई जासों कहों सो वैरी होई॥ कहा न माने मोर सुत नारी। कहत कहत मोर रसना हारी॥ गन गंधर्व सुनि माने न देवा। सबते कहा अपन हम भेवा॥ देवी देव बसे सब आई। भूत प्रेत बसे बहुताई॥ गन गंधर्व सुनि तपी संन्यासी। जिया जोनि लाख चौरासी॥ सौ सुत और जो जन्म माया। घर घर तिनका भया बसाया॥

समै-हमारा यह सब कीन कराया, हमहीं बस परगौंव ।

कहे कवीर सबको जगह, हमको नाही ठाँव ॥

हमरे काज हम सब कीना, बसा पुरुष इक आय ।

रूप न रेखा अंग विहूना, घट घट रहा समाय ॥

रमैनी २१-मैं तोहि पूछो पंडित ज्ञानी। पिरथी अकास रहे नहिं पानी॥ सुक्षम स्थूल रहे नहिं कोई। बिराट सहित परले सब होई॥ तबहि बिराट काहि अधारा। तब वेद जाप जर होवे छारा॥ होय अलोप जब रवि औ चन्दा। तब कापर रहे बाल मुकुन्दा॥ यह अचरज मोहिं निसि दिन भाई। दुरमत मेट मोहिं देहु बताई॥

शब्दावली

(५४३)

समै-अमित वस्तु सब मेटे, जो मेटे सो प्रमान । मिटतन कीन्ह सनेहरा, आपइ मिटे निदान ॥ पैँडे सब जग भूलिया, कहैं लग कहौं समुझाय । कहैं कवीर अब क्या कीजे, जगते कहा बसाय ॥

रमैनी २२-प्रथम मन्त्र विरंचि एक कीन्हा । यह आयसु मातु मोहिं दीन्हा ॥ निराकार निरगुन सो देवा ॥ ताका काहू लखा न भेवा ॥ पग नाहीं पै सब कहिं जाई । कर नहिं पै सबहिं कराई ॥ हिय नाहीं पै सब कछु बोला । गुण नाहीं पै गुणो अमोला ॥ सरवन नाहिं पै सबे सुनावे । बिन रसना वह सब गुन गावे ॥ बिन नैनन देखे संसारा । बिन नासा ले बास अपारा ॥ जीव नहीं पै जियत गुसाई । घटघट पूर रहा हुनियाई ॥

समै-ब्रह्मा यह समझे नहीं, विना बीज कछु नाहिं ।

कहैं कवीर जो उन कहो, सो राखो मन माहिं ॥

रमैनी २३-वेद किताब न झूठा होई । जो न विचारे झूठा सोई ॥ नरकी नारी जो मर जाई । के तो जन्मे की नरक समाई ॥ पिंडा तरपन जब तुम कीन्हा । कहो पंडित उन कैसे लीना ॥ कुंभक भरभर जल ढरकावे । जिवत न मिले मरे का पावे ॥ जलसे जल ले जलमें दीन्हा । पित्रन जल पिंडा कब लीन्हा ॥ वनखंड मांझ परा सब कोई । मनकी भटक तजे न सोई ॥ आप-नके छुंवन करे विचारा । करता न लखा परा भर्म जारा ॥ पर-मपरा जैसी चलि आई । तामें समझ रहा बिलमाई ॥

समै-वेद हमारा भेद है, हम हीं वेदों माहिं । जिस विधि न्यारे हम रहें, सो कोइ जाने नाहिं ॥ हारिल लकड़ी ना तजे, नर नाहीं छोडे टेक । कहैं कवीर गुरु शब्द ते, पकड़ रहा वह एक ॥ धरतः बेल लगायके, फल दूँढत आकास । कहैं कवीर

(५४४)

कवीरपंथी—

घर छोड़के, उजरन लिया निवास ॥ रवि चंदाकी गम नहीं, राई न ठहराय । मन बुध जहाँ पहुँचे नहीं, तहाँ सकलो जग जाय ॥

रमैनी २४—पृथ्वी अकाश पवन नहीं पानी । तब काहै पर- ब्रह्म कहो मोहि जानी ॥ बीज वृक्ष हता न जहवाँ । देव अदेव न रहते तहवाँ ॥ गन गंधर्व मुनि हते न कोई । चंद्र न सूरज पुरुष न जोई ॥ यह बैराट कहाँते आवा । मूल मंत्र किनहूँ नहीं पावा ॥ करताका कछु लखा न भेवा ॥ मात वचन भूले त्रिदवा ॥

समै-वृच्छ नहीं बीजो नहीं, साखा पत्र न फूल ।

ताते यह बैराट भया, यही सबनकी भूल ॥

रमैनी २५—कथा कवित्त बहुत मन मानी । सबहिन राम खिलौना जानो ॥ सो ज्ञानी जो रामहि जाने । कंठी माला तिलक मनमाने ॥ रामहि जाने तब सुख होई । राम लखे बिन तरा न कोई ॥ रामहिंका यह सकल पसारा । रामहिं करताके सिरजन हारा ॥ रामके भगत करे ब्रह्मज्ञानी । रामकी गति नहीं किनहुँ जानी ॥ रामहि देखे तब सच पाई । राम लखे बिन नर- कहिं जाई ॥ दसरथ सुत सो राम न होई । रामहि जाने विरला कोई ॥

समै—राम राम सब कोइ कहे, रामते बांधा असनेह ।

कहैं कवीर देखा नहीं, पै मरते होय सनेह ॥

रमैनी २६—घर घर होय पुरुषकी सेवा । पुरुष निरंजन कहे न भेवा ॥ ताकी भगति सकल संसारा । नर नारी मिल करें पुकारा ॥ सनकादिक नारद मुख गावें । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ध्यावें ॥ मुनी व्यास पारासर ज्ञानी । प्रह्लाद और विभीषण ध्यानी ॥ द्वादस भगत भगती सो रॉंचे । दे तारी नर नारी नाचे ॥ जुग जुग भगत भये बहुतेरे । सबे परे काल जम घेरे ॥ काहूँ भगत न रामहि पाया । भगती करत यह जन्म गंवाया ॥

शब्दावली ।

(५४५)

समै-भगति २ सब कोई कहे, भगति न आई काज ।

जहँका किया भरोसवा, तहँ ते आई गाज ॥

रमैनी २७-यह अचरज मोहिं निस दिन भारी । वाही देस जात नर नारी ॥ वही देवकी खबर न पाई । काहू वहाँ ते कहि न पठाई ॥ हम सुख रहत तुमहूँ चलि आवो । कि हम दुख तहाँ महुँ बोलावो ॥

समै-समझो भाई ज्ञानी नर, काहु न कहो संदेस ।

जे गये सो नाहिं न बहुरे, सो वह कैसा देश ॥

रमैनी २८-बूझो पंडित बात हमारी । आधा नारी पुरुष विचारी ॥ कौन नारि को पुरुष कहावे । किसको निसिदिन सब कोई धावे ॥ संयोग लाग निरगुन विन पानी । करता ते फिर क्यों अनखानी ॥ पुरुष संयोग पुरुषको छाया ॥ तब माता पुत्रनको खाया ॥

समै-चारों जुग समझाइया, न समझे सुत नारि । कहें कवीर अब कासो कहिये, अपनी चूकी हार ॥ माताते डाँइन भई, लिया जगत सब खाय । कहें कवीर हम क्या करें, जगत नाहिं पतियाय ॥ ससा सिंहको खाइया, हरना चीता खाय । कहें कवीर चींटी गज मारी, बिल्ली सूसा धाय ॥

रमैनी २९-बीज वृच्छकी सार न जानी । कहो पंडित कैसे ब्रह्मज्ञानी ॥ बीज वृच्छका होय विनासा । तब पावे ठाकुरमें बासा ॥ मैं तोहि पूछो कहो ब्रह्मज्ञानी । कैसे जोतमें जोत समानी ॥ जिवको भेद लखे नहिं कोई । उपनिषद नास कह सब कोई ॥ करता सबका सिरजन हारा । पंडित नाहीं वेद विचारा ॥

समै-बीज वृच्छ दोनों कायामें, कबहुँ नास न होय । कहे

कबीरपंथी शब्दावली १८

(५४६)

कवीरपंथी—

कवीर या वृच्छको, विरला बूझे कोय ॥ बीज वृच्छ एक साथ है, आगे पाछे नाहिं । बीज वृच्छमें वृच्छ बीजमें जानत कोई नाहिं ॥ विना बीज वृच्छ है नाहीं, यह जानत सब कोय । वृच्छ विना बीजो नहीं, यामें संक न होय ॥

रमैनी ३०—यह धोखा है सबको काला । धरती अकाश धोख पताला ॥ धोखाही हंसे धोखाही रोवे । धोखा जगे और धोखा सोवे ॥ धोखा जंत्र मंत्र औ टोना । धोखा रूपा धोखा सोना ॥ षट् दृशनमें धोखा छाया । धोखेका सब किया कराया ॥ धोखा पुरुष औ धोखा नारी ॥ वेद सुप्तिति सब कहत पुकारी ॥ सनकादिक धोखा मन लाया । चारों जुग धोखाको धाया ॥ विरला जाने धोखा कोई । प्रगट गुपुत धोखो है सोई ॥

समै—धोखे धोखे सब जग बीता, धोखे गया सिराय । थित ना पकडे आपनी, यह दुख कहाँ सिराय ॥

रमैनी ३१—मन खेले मनहीं मन केला । मनहीं बीज वो मन ही बेला ॥ पांच पचीस यह मनके साथ । मनहिं तीन गुण लीन्है हाथा ॥ मनहिं काल औ मनहीं दूता । मनही राच्छस मनही भूता ॥ मनही पूजे मनही देवा । यह मनकी सब करते सेवा ॥ मनही आदि औ मनही अंता । मनही लीला रचा अनंता ॥ मनही जीते मनही हारा ॥ मन सुमरे औ करे विचारा ॥

समै—नटके साथ जस बेसवा, जियरा मनके हाथ । केतक नाच नचावई, राखे अपने हाथ ॥ मनके हारे हार है, मनके जीते जीत । कहें कवीर तहँ मन नहीं, जहाँ हमारी रीत ॥

रमैनी ३२—बुंदकी खबर न काहू पाई । एक बुंदमें सरब समाई ॥ बुंद बुन्द सकल घट माना । बुंदके मित्र तिरगुन जाना ॥ बुंदे राखे सोई ज्ञानी । बुंदे करत जो बुंदे जानी ॥ पिरथी बुंदे देवे

शब्दावली

(५४७)

जोई। बुंदहि ते यह सर्वस होई ॥ इच्छा औ मन जहां न होई। तहां बुंद यह स्थिर सोई ॥ याकी खबर न काहू जानी। यही बुंद सब साज समानी ॥

समै-केते बुंद अलपे गये, केते सुलप वोहार। केते बुंद तन धरि गये, तिन्ह रोवे संसार ॥ सकल साज एक बुंदमें, जानत नाहीं कोय। कहें कवीर जिन जिव भूले परम परे भर्म सोय ॥

रमैनी ३३-महा अपरबल है यह माया। जिसका यह सब किया कराया ॥ मच्छ रूप मथा समुद्र अपारा। संखासुर मारा वेद उधारा ॥ कच्छ माया धरती ले आई। वराह धार दशन धरे भाई ॥ खंभ फार नरसिंह बिकरारा। हरनाकुस नख उदर बिदारा ॥ बावन रूप बन बलिको जीता ॥ परसराम पृथ्वी बस कीता ॥ रामचंद्र होय रावण मारा। कृष्ण रूप धरि कंस पछारा ॥ निहकलंक कालिद्रा मारा। और असुर बहुते संचारा ॥

समै-माया ते मन उपजा, मनते दस औतार। ब्रह्मा विस्त्र धोखे गये, भरम परा संसार ॥ करताके नहिं काम यह, यह सब माया कीन्ह। कहें कवीर बूझो माया को, नाव धरो जन कान्ह ॥

रमैनी ३ -सुन पंडित यक बात हमारी। तेरा सुत तुमहीको मारी ॥ काठ मथके अगिन उपाई। लौट अगिन वह काठे खाई ॥ दोउका नास भये एक ठाऊँ। उडगड़ भसम लीनका नाऊँ ॥ जो मिरगा संग मिरगा बंधाई। त्यों अपना सुत आपुहिं खाई ॥ ताते करम काठ उरझेरा। पंडित कहा न मानत मेरा ॥ काठ ते चुन उपजे भाई। लौट काठ वह चुन चुन खाई ॥

समै-बिही खेतहिं खात है, मात सुतन को खात।

कहें कवीर सुत नाती खाये, यह दुख नाहिं विहात ॥

रमैनी ३५-माके ससुरके उपाव बतावे। टोना टांबर बहुत

(५४८)

कवीरपंथी—

खिलावे ॥ सब घर लिया चोर बताई। घृतका दीपक धरा बनाई॥ झाँझ मंजीरा ढोल बजाया। खेला नावत भरम बताया॥ पता मिलाये सब पतियाने। टोना टांबर बहुत सुखमाने ॥

समै-मूठ हिलावे नावत, भरम भीहा बैठाय। कहें कवीर इन नावत, राखा सब जग भरमाय ॥ चुरैल भूत ना कोई, गन गंधर्व कोई नाहिं। मनसा डाइन संका भूत, संसार परा भ्रम माहिं॥

रमैनी ३६-जंत्र मंत्र तंत्र है सारा। त्रिभुवन अटका यही बिचारा ॥ नाटक चेटक ते लौ लाया। टोना टांबर बहुत कुछ भाया ॥ जनम विताना याही धंधा। करता आप न चीन्हे अंधा ॥ जहां बचन झूठ सुन पावे। लाभ जानके मूल गंवावे ॥ जंत्र मंत्र सो जग पतियाना। जंत्र मंत्रका मर्म न जाना ॥

समै-बीज ते आये चार गुण, बीचे गये सिराय।

उपज बिनस जाने नहीं, सब जग रहा भुलाय ॥

रमैनी ३७-कथते कथते जनम सब जाई। बिन बूझे कछु हाथ न आई ॥ रतिके कहे त्रिया सुख पाई। विषनी संग विस्वा जारो भाई ॥ सुखके कहे सुख जो होई। नैन कहे सूझे दृष्टि सोई ॥ भोजन कहे भूख जो जाई। तो धनके कहे धन घर आई ॥ अगिन कहे जरे जो पाऊं। बस्ती कहे उजर बस गाऊं ॥ पाथर पूजे मुक्त जो पावे। बिन नर नारी सो सुत जावे ॥ पाप कटे जो तीर्थ नहाये। लील दाग कटे न साबुन लाये ॥ जलके कहे जो त्रिषा बुझावे। तो जग राम कहे तर जावे ॥ बीज वृक्षका भेद जो पाई। तब यह काया अमर रहाई ॥

समै-राम कहत २ जग बीता, कहूं न मिलिया राम। कहें कवीर जिन रामहि जाना, तिनके भये सब काम ॥ यह दुनिया भई बावरी, अद्विस्ट सो बांधा नेह। कहें कवीर द्विस्टमान छोड़के, सेवे पुरुष विदेह ॥

शब्दावली

(५४९)

रमैनी ३८-पाथरकी क्या कीजे सेवा ! बोले न चाले कहे न भेवा ॥ विन देखेकी झूठी आसा । जल होते क्यों मरे पियासा ॥ जब तक ना देखे अपने नैना । तब तक न पतीजे गुरुके वैना ॥ शिष्य पियासा गुरुपै जाई । चेलाकी नहीं त्रिषा बुझाई ॥ कछु-वन वस्तु अमोल बिकाई । राजा रंक विसाहे जाई ॥ वस्तु लीन कछु हाथ न आया । लाभ जान फिर मूल गंवाया ॥ सब गुण पूजे निरगुण सेवा । पै नहीं पूजे आत्म देवा ॥

समै-जहँ नहीं तहँ सब कछु, वह की बांधी आस । कहें कवीर ये क्यों न त्रिपत, दोऊकी एके ध्यास ॥

रमैनी ३९-आपहि बृच्छ आपही चेला । आपहि गुरु आपही चेला ॥ आपहि जीवे आपही मारे । आपहि बहे आपही सारे ॥ आपहि जती आप संयोगी । आप संन्यासी आप वियोगी ॥ आपहिं गिरही आप बैरागी । आपहिं गुनी आप गुन त्यागी ॥ आप अज्ञान आप है ज्ञानी । आपहिं आप दूसर कर मानी ॥ आप पुजेरी आपहिं देवा । आप अभेद आप होय भेवा ॥

समै-आप सबनमें होय रहा, आपन भया निनार ।

कहें कवीर एक बूझ बिन, भटका सब संसार ॥

रमैनी ४०-मनकी बातें अगम अपारा । मन भटकाया सब संसारा ॥ यह मन चोर चुगुल अपकारी । यह मन जीते यह मन हारी ॥ यह मन नाचे यह मन गावे । यह मन ताल मृदंग, बजावे ॥ यह मन देवी यह मन देवा । यह मन अपनी आप कर सेवा ॥ यह मन पुर्ष यह मन जोई । रूप न रेख न यह मन सोई ॥ यह मन जागे यह मन सोवे । यह मन हसै सो यह मन रोवे ॥ यह मन विरहिन ब्रह्म वियोगी । मनै जती और मनै संजोगी ॥ यह मन देव निरगुन आकारा । यह मन सुगम अगम अपारा ॥

(५५०)

कबीरपंथी—

यहि मनका है नाना रंगा । यह मनके बहु उठे तरंगा ॥ यह मन सब जग चुन चुन खाया । यह मन सब जगतको भरमाया ॥

समै-राजा रैयत होइ रहा, रैयत लीन्हहा पाज । रैयत चाहा सोइ लिया, ताते भया अकाज ॥ मूसा चढा बिलार पर, चढी सिंह पर गाय । कहैं कवीर कहत न आवे, सुतकी नारी माय ॥ जब जाना तव भरम भया, बिन जाने भया नास । कहैं कवीर पुकारके, मनके झूठी आस ॥

रमैनी ४१-हंसी न जावे आवे न रोई । धोखे मरे पुरुष औ जोई ॥ आदि भवानी ह्री हमारी । हमैं छोड़ भई सुतकी नारी ॥ हमरा यह सब कीन कराया । अनख मान उन मनहिं दुराया ॥ निरगुण रचा पुरुष एक माया । हमको तज उनको बतलाया ॥ अब हम कासों करे पुकारा । हारल बिनवे आपन हारा ॥

समै-महा गुननकी आगरी, महा अपरबल नारि । कहैं कवीर यह बड़ा अचंभा, व्याहत भई कुमारी ॥ निरगुन आपन उन रचा, लौट भई वह नार । कहैं कवीर अनखायके, रचा पुरुष निरकार ॥ निरगुण निराकार करता ठहराया, तिनहुं दिया उपदेश । कहैं कवीर त्रिगुन चले, जहाँ न चंद दिनेस ॥

रमैनी ४२-कोई तीरथ वरत ठहरावा । कोई जप तप कर भरमावा ॥ कोई उरझे वेद पुराना । पूजा रची कोउ अरुझाना ॥ कोई नाद बिदमें लागा । सुत्र विसन्न कोइ चला अभागा ॥ कोई बैठा आसन मारी । पंचअगिन कोई तन जारी ॥ कोई मूंड मुढ़ाय भर्माना । कंठी छाप तिलक मन माना ॥ नाना भांति पृथ्वी लागी । बिन कर्ता मन भरम न भागी ॥

समै-गुरवा संग सब कोइ भटके, करता परा न चीन्ह । कहैं कवीर मनके भ्रम भूले, गुरु सिकख जिव दान ॥ आगे आगे गुरु

शब्दावली

(५५१)

चला, जहां न ससि औ भान । कहें कवीर पाछे चला, गुरुमे यहू समान ॥

रमैनी ४३-रंकार माया जब चीन्हा । यही मंत्र ब्रह्माको दीन्हा ॥ ब्रह्माते शिव विष्णु भाई । यही मंत्र सनकादिक गाई ॥ यही मंत्र नारदमुनि पावा । यही मंत्र सुर नर मुनि ध्यावा ॥ यह मंत्र जपा गौतम व्यासा । यही मंत्रका शिव डुरवासा ॥ यही मंत्रका त्रिभुवन चेला । याही मंत्रके बृच्छ नवेला ॥ यही मंत्र कथा वेद पुराना ॥ यही मंत्र सबके मन माना ॥

समै-माता गुरु पुत्र भये चेला, सुतको मंत्र दीन । कहें कवीर माताको वचन, सबहिन चित धर लीन ॥ तिसका मंत्र सब जपे, जिसके हाथ न पांव । कहें कवीर सो सुत माको, दिया निरंजन नांव ॥ जपते २ जी गया, काहू मिलिया नाहिं । कह कवीर तउ नाही समझे, सब लागे वहि माहिं ॥

रमैनी ४४-जमी असमान तहां नहिं सोई । हता न पुरुष हता न कोई ॥ पांचो तत्त्व हते नहिं भाई । यह विश्वरूप कहां ते आई ॥ कहांते आई आदिभवानी । कैसे रची चंडिका रानी ॥ कौनसे जगह राम अस्थाना । श्री सहित कह रहे भगवाना ॥ कौन सरूप कौनसे देशा । पंडित मुझको देहु संदेशा ॥ लौट पंडिता कहें कहानी । भक्त भागवत रहो तहाँ आनी ॥

समै-बिस्व रूप सब साथ था, बिस्वरूप यह सोय । जैसे साज पीड़की, आगे पाछे न होय ॥ बहे बहाये जात थे, लोक वेदके साथ । बीचे सतगुरु मिल गये, दीपक दीन्हा हाथ ॥ तुझ-हीसे सब कुछ भया, सब कुछ तुझही माहिं । कहें कवीर सुन पंडिता, तेहि ते अंते नाहिं ॥

(५५२)

कवीरपंथी-

रमैनी ४५-बूझो पंडित बात हमारी। वेद पुरान शास्त्र विचारी ॥ बिजनासे पौन कहाँते आई। बिजना टूटे कहाँ समाई ॥ काठते अगिन काठको खाई। लौट अगिन वह कहाँ समाई ॥ काशीमें धुन उठहिँ अपारा। काशी टूटे कहाँ विचारा ॥ होते बिरवा लीन उखारी। फल औ फूल गये केहि बारी ॥

समै-करता सब घट पूरना, जगमें रहा समाय। कहे कवीर एक जुगति बिन, सब कुछ गया नसाय ॥

रमैनी ४६-भौ को सागर यह संसारा। सब जिवपर माया की लारा ॥ देव रिषी सुर गये सयाने। त्रिगुन गये जात नहीं जाने ॥ गंधर्व पुरुष औ जोई। असुर मुनी सुर रहा न कोई ॥ पीर पैगम्बर औलिया भाई। गौस कुतुब औ राजा राई ॥ यह भवसागर भव अस्थाना। अंत एक दिन सबको जाना ॥ निर- गुन पुरुष रहेगा सोई। त्रिभुवन मरे रहे न कोई ॥

समै-आद अंत अमर हम देखा, जीव मुवा नहीं कोय। यह विश्व रूप ब्रह्मज्ञानी, उत्पत्त प्रलय न होय ॥ मत भूलो ब्रह्म- ज्ञानी, लोक वेदके साथ। कहे कवीर यह बूझ हमारी, सो दीपक लीजे हाथ ॥

रमैनी ४७-बैठ सिंहासन आद भवानी। तीनों सीस नवायो आनी ॥ भय आयसु सेवा चित लावा। आद पुरातम भेद बतावा ॥ हम महामाया मातु तुम्हारी। तीनों मानो बात हमारी ॥ लौटि पूछे ब्रह्मा यह बता। काकी नार कहो तुम माता ॥ निरं- कार निरगुन जो देवा। सो मम कंथ कहा यह भेवा ॥

समै-त्रिदेवा सुमरन लगे, पूजा रचा अंथ। तिरिया गई पर पुरुषपै, छोड आपना कंथ ॥ त्रिया कंत न माने, कंता ठाढे द्वार। मुतको कंत कीन्ह बरनारी, महा अपरबल नार ॥

शब्दावली

(५५३)

रपैनी ४८-इच्छा विग्रित जबे जिय आई। बीजमें अंकुर तबे दिखाई ॥ उठा बीज तीन भय बारा। तीन भये संयोग व्योहारा ॥ महामाया महा रीत भारी। कंतापै आई वह नारी ॥ रीत माँग रीत दीन नचाई। त्रिया अनखाय पुत्रपै आई ॥ धिरज न कीन्ह नारि अनखानी। तजा कंत पुत नारी मानी ॥

समै-कर्ता हम कर्ताकी नार, धीरज न कीन उन। निरगुन रचा विचार, धीरजमें सब होत था ॥ अधीरज कीन्ह विनास, कवीर अब कछु न कहना। अबकी गूठी आस, काहू विधि बनैना ॥

रपैनी ४९-ब्रह्मा पूछे सुनो भवानी। अपने आप तुम कहो कहानी ॥ लौट भवानी सुत समुझावे। अपने पार न और बतावे ॥ खंड ब्रह्मण्ड मैं रची अनंता। सूर्य चंद्र उड़गन अनंता ॥ चौरासी सब हमहीं निरमाई। ओंकार जब ताहि सुनाई ॥ आदि अंत मोहि पूजे देवा। करो हमारी तीनों सेवा ॥

समै-निर्गुन निर्गुन दोऊ उड़ाइस, आप रही ठहराय। आपहिं पुरुष नारि ठहरानी, ब्रह्मा कहे समझाय ॥ ब्रह्माके प्रतीत भई, बांधा वेद ग्रन्थ। प्रगट नैनन देखत नहीं, परा वेदके पंथ ॥ मायाते यह वेद भै, वेद मध्य दोय तत्। निर्गुन सर्गुन दो बतलावे, कहे नाहिं जो सत् ॥

रपैनी ५०-परम मद माते नर औ नारी। जुग गये चार न मिटी खुमारी ॥ माते ब्रह्मा विष्णु महेशा। माते नारद शारद शेषा ॥ माते सनकादिक सब देवा। माते रिषि मुनि करते सेवा ॥ माते नाथ सिद्ध गोपाला। माते शिव नारी वृजबाला ॥ माती लच्छमी आदि भवानी। माती सती ब्रह्मा ब्रह्मज्ञानी ॥ तीन लोक परम मद माता। सिध साधक है येही बाता ॥

समै-महामाया भाठी रची, तीन लोक बिस्तार। कहैं कवीर हम

(५५४)

कवीरपंथी-

रहे निनारे, पी माता संसार। ब्रह्मा पियत पिया सब काहू, करता अपन न चीन्ह। कहैं कवीर अब कहत न आवे, विरंच इसारा कीन्ह ॥

रमैनी ५१—सबे आस वहांकी ठानी। वहांकी गति काहु न जानी ॥ निराकार सब करे करावे। ज्यों बाजीगर कपिहि नचावे ॥ वाहिके हाथ जीवन औ मरना। ताते वाही पुरुषते डरना ॥ वह सब ठाँव सबसे न्यारा। उनहिं कीन्ह यह सब बिस्तारा ॥

समै—कब जेहो वहि देशवा, जहां पुरुष निरंकार। कहैं कवीर हमहूं ते कहियो, जब होय चलन तुम्हार ॥ आगे गये तिन किनहु न कहिया, अब तुम लीजो साथ ॥ जो है तुम्हे भरोसवा, गहो हमारा हांथ ॥ त्रिय देवा जान्यो नहीं, कौन रूप केहि देश। अबहूं चेत समझ नर बौरे, झूठा दिया उपदेश ॥

रमैनी ५२—महामति माया आदि भवानी। पांडव घर द्रोणदीरानी ॥ रुधिर पियासी भइ मह माया। अष्टादस छोनी दल खाया ॥ इतने खायसि तउ न अघानी। पांडव गरे हेवारे आनी ॥ छप्पनकोट जुदुबंस सिधारी। तऊ न त्रिपित भई हत्यारी ॥ सुभ निसुभ महिषासुर मारा। हरनाकुश रावन संहारा ॥ सुरनर मुनि सब खोये झारी। कोइ न बाँचा यह संसारी ॥

समै—करताते अनखानी माया, आगम कीन्ह उपाय। कहैं कवीर त्रिया चंचल, राखा पुरुष दुराय ॥ केता हम समझाइया, पै ना समझे कोय। उनका कहा जगत मिल माना, हमरे कहे क्या होय ॥

रमैनी ५३—ब्रह्माके घर भई भवानी। शिवके बैठी आदू भवानी ॥ विष्णुके भई लछमी नारी। गंधर्वके घर अप्सरा वारी ॥ इंद्रके बैठी होय इंद्रानी। राजाके घर भई पटरानी ॥ जोगीके चेली होय