कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
खिलावे ॥ सब घर लिया चोर बताई। घृतका दीपक धरा बनाई॥ झाँझ मंजीरा ढोल बजाया। खेला नावत भरम बताया॥ पता मिलाये सब पतियाने। टोना टांबर बहुत सुखमाने ॥
समै-मूठ हिलावे नावत, भरम भीहा बैठाय। कहें कवीर इन नावत, राखा सब जग भरमाय ॥ चुरैल भूत ना कोई, गन गंधर्व कोई नाहिं। मनसा डाइन संका भूत, संसार परा भ्रम माहिं॥
रमैनी ३६-जंत्र मंत्र तंत्र है सारा। त्रिभुवन अटका यही बिचारा ॥ नाटक चेटक ते लौ लाया। टोना टांबर बहुत कुछ भाया ॥ जनम विताना याही धंधा। करता आप न चीन्हे अंधा ॥ जहां बचन झूठ सुन पावे। लाभ जानके मूल गंवावे ॥ जंत्र मंत्र सो जग पतियाना। जंत्र मंत्रका मर्म न जाना ॥
समै-बीज ते आये चार गुण, बीचे गये सिराय।
उपज बिनस जाने नहीं, सब जग रहा भुलाय ॥
रमैनी ३७-कथते कथते जनम सब जाई। बिन बूझे कछु हाथ न आई ॥ रतिके कहे त्रिया सुख पाई। विषनी संग विस्वा जारो भाई ॥ सुखके कहे सुख जो होई। नैन कहे सूझे दृष्टि सोई ॥ भोजन कहे भूख जो जाई। तो धनके कहे धन घर आई ॥ अगिन कहे जरे जो पाऊं। बस्ती कहे उजर बस गाऊं ॥ पाथर पूजे मुक्त जो पावे। बिन नर नारी सो सुत जावे ॥ पाप कटे जो तीर्थ नहाये। लील दाग कटे न साबुन लाये ॥ जलके कहे जो त्रिषा बुझावे। तो जग राम कहे तर जावे ॥ बीज वृक्षका भेद जो पाई। तब यह काया अमर रहाई ॥
समै-राम कहत २ जग बीता, कहूं न मिलिया राम। कहें कवीर जिन रामहि जाना, तिनके भये सब काम ॥ यह दुनिया भई बावरी, अद्विस्ट सो बांधा नेह। कहें कवीर द्विस्टमान छोड़के, सेवे पुरुष विदेह ॥