कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 563, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(५४९)
रमैनी ३८-पाथरकी क्या कीजे सेवा ! बोले न चाले कहे न भेवा ॥ विन देखेकी झूठी आसा । जल होते क्यों मरे पियासा ॥ जब तक ना देखे अपने नैना । तब तक न पतीजे गुरुके वैना ॥ शिष्य पियासा गुरुपै जाई । चेलाकी नहीं त्रिषा बुझाई ॥ कछु-वन वस्तु अमोल बिकाई । राजा रंक विसाहे जाई ॥ वस्तु लीन कछु हाथ न आया । लाभ जान फिर मूल गंवाया ॥ सब गुण पूजे निरगुण सेवा । पै नहीं पूजे आत्म देवा ॥
समै-जहँ नहीं तहँ सब कछु, वह की बांधी आस । कहें कवीर ये क्यों न त्रिपत, दोऊकी एके ध्यास ॥
रमैनी ३९-आपहि बृच्छ आपही चेला । आपहि गुरु आपही चेला ॥ आपहि जीवे आपही मारे । आपहि बहे आपही सारे ॥ आपहि जती आप संयोगी । आप संन्यासी आप वियोगी ॥ आपहिं गिरही आप बैरागी । आपहिं गुनी आप गुन त्यागी ॥ आप अज्ञान आप है ज्ञानी । आपहिं आप दूसर कर मानी ॥ आप पुजेरी आपहिं देवा । आप अभेद आप होय भेवा ॥
समै-आप सबनमें होय रहा, आपन भया निनार ।
कहें कवीर एक बूझ बिन, भटका सब संसार ॥
रमैनी ४०-मनकी बातें अगम अपारा । मन भटकाया सब संसारा ॥ यह मन चोर चुगुल अपकारी । यह मन जीते यह मन हारी ॥ यह मन नाचे यह मन गावे । यह मन ताल मृदंग, बजावे ॥ यह मन देवी यह मन देवा । यह मन अपनी आप कर सेवा ॥ यह मन पुर्ष यह मन जोई । रूप न रेख न यह मन सोई ॥ यह मन जागे यह मन सोवे । यह मन हसै सो यह मन रोवे ॥ यह मन विरहिन ब्रह्म वियोगी । मनै जती और मनै संजोगी ॥ यह मन देव निरगुन आकारा । यह मन सुगम अगम अपारा ॥