कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
यहि मनका है नाना रंगा । यह मनके बहु उठे तरंगा ॥ यह मन सब जग चुन चुन खाया । यह मन सब जगतको भरमाया ॥
समै-राजा रैयत होइ रहा, रैयत लीन्हहा पाज । रैयत चाहा सोइ लिया, ताते भया अकाज ॥ मूसा चढा बिलार पर, चढी सिंह पर गाय । कहैं कवीर कहत न आवे, सुतकी नारी माय ॥ जब जाना तव भरम भया, बिन जाने भया नास । कहैं कवीर पुकारके, मनके झूठी आस ॥
रमैनी ४१-हंसी न जावे आवे न रोई । धोखे मरे पुरुष औ जोई ॥ आदि भवानी ह्री हमारी । हमैं छोड़ भई सुतकी नारी ॥ हमरा यह सब कीन कराया । अनख मान उन मनहिं दुराया ॥ निरगुण रचा पुरुष एक माया । हमको तज उनको बतलाया ॥ अब हम कासों करे पुकारा । हारल बिनवे आपन हारा ॥
समै-महा गुननकी आगरी, महा अपरबल नारि । कहैं कवीर यह बड़ा अचंभा, व्याहत भई कुमारी ॥ निरगुन आपन उन रचा, लौट भई वह नार । कहैं कवीर अनखायके, रचा पुरुष निरकार ॥ निरगुण निराकार करता ठहराया, तिनहुं दिया उपदेश । कहैं कवीर त्रिगुन चले, जहाँ न चंद दिनेस ॥
रमैनी ४२-कोई तीरथ वरत ठहरावा । कोई जप तप कर भरमावा ॥ कोई उरझे वेद पुराना । पूजा रची कोउ अरुझाना ॥ कोई नाद बिदमें लागा । सुत्र विसन्न कोइ चला अभागा ॥ कोई बैठा आसन मारी । पंचअगिन कोई तन जारी ॥ कोई मूंड मुढ़ाय भर्माना । कंठी छाप तिलक मन माना ॥ नाना भांति पृथ्वी लागी । बिन कर्ता मन भरम न भागी ॥
समै-गुरवा संग सब कोइ भटके, करता परा न चीन्ह । कहैं कवीर मनके भ्रम भूले, गुरु सिकख जिव दान ॥ आगे आगे गुरु