कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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चला, जहां न ससि औ भान । कहें कवीर पाछे चला, गुरुमे यहू समान ॥
रमैनी ४३-रंकार माया जब चीन्हा । यही मंत्र ब्रह्माको दीन्हा ॥ ब्रह्माते शिव विष्णु भाई । यही मंत्र सनकादिक गाई ॥ यही मंत्र नारदमुनि पावा । यही मंत्र सुर नर मुनि ध्यावा ॥ यह मंत्र जपा गौतम व्यासा । यही मंत्रका शिव डुरवासा ॥ यही मंत्रका त्रिभुवन चेला । याही मंत्रके बृच्छ नवेला ॥ यही मंत्र कथा वेद पुराना ॥ यही मंत्र सबके मन माना ॥
समै-माता गुरु पुत्र भये चेला, सुतको मंत्र दीन । कहें कवीर माताको वचन, सबहिन चित धर लीन ॥ तिसका मंत्र सब जपे, जिसके हाथ न पांव । कहें कवीर सो सुत माको, दिया निरंजन नांव ॥ जपते २ जी गया, काहू मिलिया नाहिं । कह कवीर तउ नाही समझे, सब लागे वहि माहिं ॥
रमैनी ४४-जमी असमान तहां नहिं सोई । हता न पुरुष हता न कोई ॥ पांचो तत्त्व हते नहिं भाई । यह विश्वरूप कहां ते आई ॥ कहांते आई आदिभवानी । कैसे रची चंडिका रानी ॥ कौनसे जगह राम अस्थाना । श्री सहित कह रहे भगवाना ॥ कौन सरूप कौनसे देशा । पंडित मुझको देहु संदेशा ॥ लौट पंडिता कहें कहानी । भक्त भागवत रहो तहाँ आनी ॥
समै-बिस्व रूप सब साथ था, बिस्वरूप यह सोय । जैसे साज पीड़की, आगे पाछे न होय ॥ बहे बहाये जात थे, लोक वेदके साथ । बीचे सतगुरु मिल गये, दीपक दीन्हा हाथ ॥ तुझ-हीसे सब कुछ भया, सब कुछ तुझही माहिं । कहें कवीर सुन पंडिता, तेहि ते अंते नाहिं ॥