कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 561, कुल 968 में से
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जोई। बुंदहि ते यह सर्वस होई ॥ इच्छा औ मन जहां न होई। तहां बुंद यह स्थिर सोई ॥ याकी खबर न काहू जानी। यही बुंद सब साज समानी ॥
समै-केते बुंद अलपे गये, केते सुलप वोहार। केते बुंद तन धरि गये, तिन्ह रोवे संसार ॥ सकल साज एक बुंदमें, जानत नाहीं कोय। कहें कवीर जिन जिव भूले परम परे भर्म सोय ॥
रमैनी ३३-महा अपरबल है यह माया। जिसका यह सब किया कराया ॥ मच्छ रूप मथा समुद्र अपारा। संखासुर मारा वेद उधारा ॥ कच्छ माया धरती ले आई। वराह धार दशन धरे भाई ॥ खंभ फार नरसिंह बिकरारा। हरनाकुस नख उदर बिदारा ॥ बावन रूप बन बलिको जीता ॥ परसराम पृथ्वी बस कीता ॥ रामचंद्र होय रावण मारा। कृष्ण रूप धरि कंस पछारा ॥ निहकलंक कालिद्रा मारा। और असुर बहुते संचारा ॥
समै-माया ते मन उपजा, मनते दस औतार। ब्रह्मा विस्त्र धोखे गये, भरम परा संसार ॥ करताके नहिं काम यह, यह सब माया कीन्ह। कहें कवीर बूझो माया को, नाव धरो जन कान्ह ॥
रमैनी ३ -सुन पंडित यक बात हमारी। तेरा सुत तुमहीको मारी ॥ काठ मथके अगिन उपाई। लौट अगिन वह काठे खाई ॥ दोउका नास भये एक ठाऊँ। उडगड़ भसम लीनका नाऊँ ॥ जो मिरगा संग मिरगा बंधाई। त्यों अपना सुत आपुहिं खाई ॥ ताते करम काठ उरझेरा। पंडित कहा न मानत मेरा ॥ काठ ते चुन उपजे भाई। लौट काठ वह चुन चुन खाई ॥
समै-बिही खेतहिं खात है, मात सुतन को खात।
कहें कवीर सुत नाती खाये, यह दुख नाहिं विहात ॥
रमैनी ३५-माके ससुरके उपाव बतावे। टोना टांबर बहुत