कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 553, कुल 968 में से
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अथ ज्ञानदीपककी रंमैनी प्रारम्भ ।
रमैनी १३-का कहिये कछु कही न जाई । तुम पंडित लाओ ठहराई ॥ बाभनकी बेटी जोगीको वेटा । दोनो मिल संजोग संजोटा ॥ अचरज एक भया जिय भारी । कन्या होय पिताकी नारी ॥ माई घर बहिनी जाई । सात पतोह को सौत कहाई ॥ सुन जोगी तैं क्या कर जोगा । घर घर सबके यह संयोगा ॥ कन्याको कंथ कंथको पूता । पिताका कंथ होय सुन दूता ॥ इनको जान पिता नहिं सेवे । पाषाण परतिमा पूजा देवे । बाल-भोग करि पागे लाई । आपे घंट बजाये खाई ॥ अति प्रसन्न जोग वोहि लाया । मगन होय तब आपुहिं खाया ॥ ना कछु लेइ न देवे देवा । कारण कौन करे तू सेवा ॥ देव न बोले आपहिं बोले । देव न डोले आपहिं डोले ॥ जैसा गुरु सिखावन दीन्हा । तैसा सिष हिरदय धरिलीन्हा ॥
समै-यहि संयोग सुवा सब कोई, कीन्ह न कोइ विचार ।
कहे कवीर चारो युग करता, सबमें फिरा पुकार ॥
रमैनी १४-केते मगन होय मनमें भूले । केते पंडित पढ़ गरबहिं भूले ॥ केते करते सेवा पूजा । तुही निरंजन और न दूजा ॥ केते तजत अन्न औ नारी ॥ केते रहते दूधा धारी ॥ केते कनफटा कहावत योगी । केते संयोगते होत बियोगी ॥ केते तीरथ बरत सुन पावा । केते पीर औ नबी मनावा ॥ केते जटा राख सिर धारी । केते भये संयोग बिचारी ॥ केते बांग निमाज गुजारा । केते भये नटवा व्रत धारा ॥ केते होम जग्य करवावे । केते नित
१---इस रमैनीको एकही प्रति सत्यलोकवासी सदगुरु श्री महंत शंभुदास साहबसे स १९६२ में मिली थी जिस परसे यह कापी उतारी गयी थी, काल भगवानकी कृपासे वह मूल भी जाता रहा और इस कापीके भी कुछ पन्ने सड़ गये इसलिए तैरहवीं रमैनीसे आरंभ होता है । विशेष वृत्तान्त प्रस्तावना और परिशिष्टमें देखना चाहिये ।