कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
उठि देव मनावे॥ केते मन भगतीमें दीने । केते सदा रसभोगमें लीने ॥ सबहि फंसे तीन लोककी बारी । विधाता रची भूली सृष्टी सारी ॥
समै०—आस करे सुन्य नगरकी, जहां करता कोय ।
कहैं कवीर बूझो जिव अपने, जाते भरम न होय ॥
रमैनी १५—बोले कवीरा अमृत बानी । बरसे कामर भीजे पानी ॥ चले बटोही हाटे बाटा । सोवनहारके सिरपर खाटा ॥ तुरसाको नित चीरे बांसा । छेरी बेचे चिकवाके मासा ॥ राजा परजा रैयत राई । बिन जंत्री नित बाजा बजाई ॥ तर गागर ऊपर पनिहारी । लडकाके गोद खेले महतारी ॥ ब्राह्मणकी बिटिया व्याहे बानी । सिंहके घर गऊ भइ रानी ॥ बरसे धरती सूरज नहाई । समुद्रका पाना अकासे जाई । चेलाके गुरू लागे पाई । पहिले पुत्र पाछे भइ माई ॥ अचरज एक देखो किन कोई । माता भई पुत्र जोई ॥
स०—सब जग भूला एक न भूला, भूला सब संसार ।
कहैं कवीर बूझो तुम ज्ञानी, करके अपन विचार ॥
तिर देवा गये जात न जाने, गये साधक अवधूत ।
कहैं कवीर पहिचानो ज्ञानी, पांचो आतम भूत ॥
रमैनी १६—आवो पंडित करो विचारा । सुत माता संयोग व्योहारा ॥ त्रिया चरित्र आदि चलि आया । माता निर्गुन पिता बताया ॥ इच्छा सुरूप भई इक नारी । गायत्री नाम धरा संसारी ॥ ब्रह्मा पढे न और बतावे । भेद अभेद बरन कुल लावे ॥ तरपन संध्या करे चित लाई । सुच्छम लिंग जोत ठहराई ॥ आप न जाने पूजे देवा । उसको अंधा लखे न भेवा ॥ पाहन करि पूजे नित देवा । चेतन होयके करे जड सेवा ॥ आप अपन