कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(५४०)
कवीरपंथी—
उठि देव मनावे॥ केते मन भगतीमें दीने । केते सदा रसभोगमें लीने ॥ सबहि फंसे तीन लोककी बारी । विधाता रची भूली सृष्टी सारी ॥
समै०—आस करे सुन्य नगरकी, जहां करता कोय ।
कहैं कवीर बूझो जिव अपने, जाते भरम न होय ॥
रमैनी १५—बोले कवीरा अमृत बानी । बरसे कामर भीजे पानी ॥ चले बटोही हाटे बाटा । सोवनहारके सिरपर खाटा ॥ तुरसाको नित चीरे बांसा । छेरी बेचे चिकवाके मासा ॥ राजा परजा रैयत राई । बिन जंत्री नित बाजा बजाई ॥ तर गागर ऊपर पनिहारी । लडकाके गोद खेले महतारी ॥ ब्राह्मणकी बिटिया व्याहे बानी । सिंहके घर गऊ भइ रानी ॥ बरसे धरती सूरज नहाई । समुद्रका पाना अकासे जाई । चेलाके गुरू लागे पाई । पहिले पुत्र पाछे भइ माई ॥ अचरज एक देखो किन कोई । माता भई पुत्र जोई ॥
स०—सब जग भूला एक न भूला, भूला सब संसार ।
कहैं कवीर बूझो तुम ज्ञानी, करके अपन विचार ॥
तिर देवा गये जात न जाने, गये साधक अवधूत ।
कहैं कवीर पहिचानो ज्ञानी, पांचो आतम भूत ॥
रमैनी १६—आवो पंडित करो विचारा । सुत माता संयोग व्योहारा ॥ त्रिया चरित्र आदि चलि आया । माता निर्गुन पिता बताया ॥ इच्छा सुरूप भई इक नारी । गायत्री नाम धरा संसारी ॥ ब्रह्मा पढे न और बतावे । भेद अभेद बरन कुल लावे ॥ तरपन संध्या करे चित लाई । सुच्छम लिंग जोत ठहराई ॥ आप न जाने पूजे देवा । उसको अंधा लखे न भेवा ॥ पाहन करि पूजे नित देवा । चेतन होयके करे जड सेवा ॥ आप अपन
शब्दावली
(५४१)
नहीं चीन्हे कोई । आपहि करता आपहि होई ॥ जहां नाहि कुछ तहांकी आसा । सुन्य नगर जहँ कहे ब्रह्म बासा ॥
समै-यह दुबधा मिलि दुचित भये, कैसे न चीन्हे मूल ।
कहँ कवीर तिरगुन गुणा भूले, यही सबनकी भूल ॥
रमैनी १७-एक अचंभा देखो आई । गउ अकाश धरती खोर जमाई ॥ तुम्बा डूबा सिल उतरानी । बरेड़ी चढे ओरिया- का पानी ॥ जे गुरु कहे करे सिष सोई । गुरुका बचन तजे न कोई ॥ जोत निरंजन कहे निरंकारा । गुरु मंत्र यह सबन पुकारा ॥ परंपरा ऐसी चलि आई । अबहीं औरू कैस चलाई ॥ जोगी जंगम जती संन्यासी । सुर नर मुनि सब भये उदासी ॥ करता सबका सिरजन हारा । बिना विचार न उतरे पारा ॥ यह करता को रूप तुम्हारा । करता चीन्हो बूझ विचारा ॥
समै-सब जग दूढे हाथ न आवे, ना है पुरुष बिदेह ।
कहँ कवीर करता तुम चीन्हों, छोड़ो झूठ सनेह ॥
रमैनी १८-जब जिवमें आवे परतीता । तब यह मन होय अतीता ॥ भई परतीत मिटा दुख दुंदा । धोखा मिटा भया अनंदा ॥ मगन हुआ रहा ठहराई । हंस परमहंसकी संस मिटाई ॥ धोखा मिटा भया सुख चैना । किसका नाम जपे दिन रेना ॥ सुरत डोरते चेत न अंधा । निसि बासर करे नित धंधा ॥ सेवक स्वामी और विचारा । आसा लाय तजा घर बारा ॥ करे विस- वास नित पूजे देवा । धोखा भया रैन दिन सेवा ॥ धोखा लगि जब तीरथ धावा । दौड़ि गया तहँ देव न पावा ॥ भया निरास नहीं कछु पाया । ज्यों छीरते धिव विनसाया ॥
समै-चेतो किन तुम चेतो, परमहंस संयोग ।
कहँ कवीर करता नहीं एते, पाँचोंमें सुख भोग ॥
(५४२)
कवीरपंथी-
रमैनी १९-हरि ब्रह्मा भूले त्रिपुरारी। इन भूलत भूली संसारी॥ सनक सनंदन भूले वोऊ। नारद शारद भूले सोऊ॥ गोरख भूले भूले हनुमाना। सुनि वशिष्ठ तिनहुं नहिं जाना॥ परहलाद पारासर भूले तेऊ। गौतम लोमस भूले एऊ॥ इन्द्र कुबेर भूले बहु भांती। जमदग्निअग्नि छ भरमाती॥ भूलेपीर नबी औलिया। भूले गौस कुतुब मौलिया॥ भूले यह सब नेजा धारी। इनके संग भूले संसारी॥
समै-देव पैगम्बर रिषि मिलि, इनही माना भूल ।
निराकारमें यह सब अटके, यही सबनकी भूल ॥
रमैनी २०-कासे कहूं मैं यह दुख रोई जासों कहों सो वैरी होई॥ कहा न माने मोर सुत नारी। कहत कहत मोर रसना हारी॥ गन गंधर्व सुनि माने न देवा। सबते कहा अपन हम भेवा॥ देवी देव बसे सब आई। भूत प्रेत बसे बहुताई॥ गन गंधर्व सुनि तपी संन्यासी। जिया जोनि लाख चौरासी॥ सौ सुत और जो जन्म माया। घर घर तिनका भया बसाया॥
समै-हमारा यह सब कीन कराया, हमहीं बस परगौंव ।
कहे कवीर सबको जगह, हमको नाही ठाँव ॥
हमरे काज हम सब कीना, बसा पुरुष इक आय ।
रूप न रेखा अंग विहूना, घट घट रहा समाय ॥
रमैनी २१-मैं तोहि पूछो पंडित ज्ञानी। पिरथी अकास रहे नहिं पानी॥ सुक्षम स्थूल रहे नहिं कोई। बिराट सहित परले सब होई॥ तबहि बिराट काहि अधारा। तब वेद जाप जर होवे छारा॥ होय अलोप जब रवि औ चन्दा। तब कापर रहे बाल मुकुन्दा॥ यह अचरज मोहिं निसि दिन भाई। दुरमत मेट मोहिं देहु बताई॥
शब्दावली
(५४३)
समै-अमित वस्तु सब मेटे, जो मेटे सो प्रमान । मिटतन कीन्ह सनेहरा, आपइ मिटे निदान ॥ पैँडे सब जग भूलिया, कहैं लग कहौं समुझाय । कहैं कवीर अब क्या कीजे, जगते कहा बसाय ॥
रमैनी २२-प्रथम मन्त्र विरंचि एक कीन्हा । यह आयसु मातु मोहिं दीन्हा ॥ निराकार निरगुन सो देवा ॥ ताका काहू लखा न भेवा ॥ पग नाहीं पै सब कहिं जाई । कर नहिं पै सबहिं कराई ॥ हिय नाहीं पै सब कछु बोला । गुण नाहीं पै गुणो अमोला ॥ सरवन नाहिं पै सबे सुनावे । बिन रसना वह सब गुन गावे ॥ बिन नैनन देखे संसारा । बिन नासा ले बास अपारा ॥ जीव नहीं पै जियत गुसाई । घटघट पूर रहा हुनियाई ॥
समै-ब्रह्मा यह समझे नहीं, विना बीज कछु नाहिं ।
कहैं कवीर जो उन कहो, सो राखो मन माहिं ॥
रमैनी २३-वेद किताब न झूठा होई । जो न विचारे झूठा सोई ॥ नरकी नारी जो मर जाई । के तो जन्मे की नरक समाई ॥ पिंडा तरपन जब तुम कीन्हा । कहो पंडित उन कैसे लीना ॥ कुंभक भरभर जल ढरकावे । जिवत न मिले मरे का पावे ॥ जलसे जल ले जलमें दीन्हा । पित्रन जल पिंडा कब लीन्हा ॥ वनखंड मांझ परा सब कोई । मनकी भटक तजे न सोई ॥ आप-नके छुंवन करे विचारा । करता न लखा परा भर्म जारा ॥ पर-मपरा जैसी चलि आई । तामें समझ रहा बिलमाई ॥
समै-वेद हमारा भेद है, हम हीं वेदों माहिं । जिस विधि न्यारे हम रहें, सो कोइ जाने नाहिं ॥ हारिल लकड़ी ना तजे, नर नाहीं छोडे टेक । कहैं कवीर गुरु शब्द ते, पकड़ रहा वह एक ॥ धरतः बेल लगायके, फल दूँढत आकास । कहैं कवीर
(५४४)
कवीरपंथी—
घर छोड़के, उजरन लिया निवास ॥ रवि चंदाकी गम नहीं, राई न ठहराय । मन बुध जहाँ पहुँचे नहीं, तहाँ सकलो जग जाय ॥
रमैनी २४—पृथ्वी अकाश पवन नहीं पानी । तब काहै पर- ब्रह्म कहो मोहि जानी ॥ बीज वृक्ष हता न जहवाँ । देव अदेव न रहते तहवाँ ॥ गन गंधर्व मुनि हते न कोई । चंद्र न सूरज पुरुष न जोई ॥ यह बैराट कहाँते आवा । मूल मंत्र किनहूँ नहीं पावा ॥ करताका कछु लखा न भेवा ॥ मात वचन भूले त्रिदवा ॥
समै-वृच्छ नहीं बीजो नहीं, साखा पत्र न फूल ।
ताते यह बैराट भया, यही सबनकी भूल ॥
रमैनी २५—कथा कवित्त बहुत मन मानी । सबहिन राम खिलौना जानो ॥ सो ज्ञानी जो रामहि जाने । कंठी माला तिलक मनमाने ॥ रामहि जाने तब सुख होई । राम लखे बिन तरा न कोई ॥ रामहिंका यह सकल पसारा । रामहिं करताके सिरजन हारा ॥ रामके भगत करे ब्रह्मज्ञानी । रामकी गति नहीं किनहुँ जानी ॥ रामहि देखे तब सच पाई । राम लखे बिन नर- कहिं जाई ॥ दसरथ सुत सो राम न होई । रामहि जाने विरला कोई ॥
समै—राम राम सब कोइ कहे, रामते बांधा असनेह ।
कहैं कवीर देखा नहीं, पै मरते होय सनेह ॥
रमैनी २६—घर घर होय पुरुषकी सेवा । पुरुष निरंजन कहे न भेवा ॥ ताकी भगति सकल संसारा । नर नारी मिल करें पुकारा ॥ सनकादिक नारद मुख गावें । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर ध्यावें ॥ मुनी व्यास पारासर ज्ञानी । प्रह्लाद और विभीषण ध्यानी ॥ द्वादस भगत भगती सो रॉंचे । दे तारी नर नारी नाचे ॥ जुग जुग भगत भये बहुतेरे । सबे परे काल जम घेरे ॥ काहूँ भगत न रामहि पाया । भगती करत यह जन्म गंवाया ॥
शब्दावली ।
(५४५)
समै-भगति २ सब कोई कहे, भगति न आई काज ।
जहँका किया भरोसवा, तहँ ते आई गाज ॥
रमैनी २७-यह अचरज मोहिं निस दिन भारी । वाही देस जात नर नारी ॥ वही देवकी खबर न पाई । काहू वहाँ ते कहि न पठाई ॥ हम सुख रहत तुमहूँ चलि आवो । कि हम दुख तहाँ महुँ बोलावो ॥
समै-समझो भाई ज्ञानी नर, काहु न कहो संदेस ।
जे गये सो नाहिं न बहुरे, सो वह कैसा देश ॥
रमैनी २८-बूझो पंडित बात हमारी । आधा नारी पुरुष विचारी ॥ कौन नारि को पुरुष कहावे । किसको निसिदिन सब कोई धावे ॥ संयोग लाग निरगुन विन पानी । करता ते फिर क्यों अनखानी ॥ पुरुष संयोग पुरुषको छाया ॥ तब माता पुत्रनको खाया ॥
समै-चारों जुग समझाइया, न समझे सुत नारि । कहें कवीर अब कासो कहिये, अपनी चूकी हार ॥ माताते डाँइन भई, लिया जगत सब खाय । कहें कवीर हम क्या करें, जगत नाहिं पतियाय ॥ ससा सिंहको खाइया, हरना चीता खाय । कहें कवीर चींटी गज मारी, बिल्ली सूसा धाय ॥
रमैनी २९-बीज वृच्छकी सार न जानी । कहो पंडित कैसे ब्रह्मज्ञानी ॥ बीज वृच्छका होय विनासा । तब पावे ठाकुरमें बासा ॥ मैं तोहि पूछो कहो ब्रह्मज्ञानी । कैसे जोतमें जोत समानी ॥ जिवको भेद लखे नहिं कोई । उपनिषद नास कह सब कोई ॥ करता सबका सिरजन हारा । पंडित नाहीं वेद विचारा ॥
समै-बीज वृच्छ दोनों कायामें, कबहुँ नास न होय । कहे
कबीरपंथी शब्दावली १८
(५४६)
कवीरपंथी—
कवीर या वृच्छको, विरला बूझे कोय ॥ बीज वृच्छ एक साथ है, आगे पाछे नाहिं । बीज वृच्छमें वृच्छ बीजमें जानत कोई नाहिं ॥ विना बीज वृच्छ है नाहीं, यह जानत सब कोय । वृच्छ विना बीजो नहीं, यामें संक न होय ॥
रमैनी ३०—यह धोखा है सबको काला । धरती अकाश धोख पताला ॥ धोखाही हंसे धोखाही रोवे । धोखा जगे और धोखा सोवे ॥ धोखा जंत्र मंत्र औ टोना । धोखा रूपा धोखा सोना ॥ षट् दृशनमें धोखा छाया । धोखेका सब किया कराया ॥ धोखा पुरुष औ धोखा नारी ॥ वेद सुप्तिति सब कहत पुकारी ॥ सनकादिक धोखा मन लाया । चारों जुग धोखाको धाया ॥ विरला जाने धोखा कोई । प्रगट गुपुत धोखो है सोई ॥
समै—धोखे धोखे सब जग बीता, धोखे गया सिराय । थित ना पकडे आपनी, यह दुख कहाँ सिराय ॥
रमैनी ३१—मन खेले मनहीं मन केला । मनहीं बीज वो मन ही बेला ॥ पांच पचीस यह मनके साथ । मनहिं तीन गुण लीन्है हाथा ॥ मनहिं काल औ मनहीं दूता । मनही राच्छस मनही भूता ॥ मनही पूजे मनही देवा । यह मनकी सब करते सेवा ॥ मनही आदि औ मनही अंता । मनही लीला रचा अनंता ॥ मनही जीते मनही हारा ॥ मन सुमरे औ करे विचारा ॥
समै—नटके साथ जस बेसवा, जियरा मनके हाथ । केतक नाच नचावई, राखे अपने हाथ ॥ मनके हारे हार है, मनके जीते जीत । कहें कवीर तहँ मन नहीं, जहाँ हमारी रीत ॥
रमैनी ३२—बुंदकी खबर न काहू पाई । एक बुंदमें सरब समाई ॥ बुंद बुन्द सकल घट माना । बुंदके मित्र तिरगुन जाना ॥ बुंदे राखे सोई ज्ञानी । बुंदे करत जो बुंदे जानी ॥ पिरथी बुंदे देवे
शब्दावली
(५४७)
जोई। बुंदहि ते यह सर्वस होई ॥ इच्छा औ मन जहां न होई। तहां बुंद यह स्थिर सोई ॥ याकी खबर न काहू जानी। यही बुंद सब साज समानी ॥
समै-केते बुंद अलपे गये, केते सुलप वोहार। केते बुंद तन धरि गये, तिन्ह रोवे संसार ॥ सकल साज एक बुंदमें, जानत नाहीं कोय। कहें कवीर जिन जिव भूले परम परे भर्म सोय ॥
रमैनी ३३-महा अपरबल है यह माया। जिसका यह सब किया कराया ॥ मच्छ रूप मथा समुद्र अपारा। संखासुर मारा वेद उधारा ॥ कच्छ माया धरती ले आई। वराह धार दशन धरे भाई ॥ खंभ फार नरसिंह बिकरारा। हरनाकुस नख उदर बिदारा ॥ बावन रूप बन बलिको जीता ॥ परसराम पृथ्वी बस कीता ॥ रामचंद्र होय रावण मारा। कृष्ण रूप धरि कंस पछारा ॥ निहकलंक कालिद्रा मारा। और असुर बहुते संचारा ॥
समै-माया ते मन उपजा, मनते दस औतार। ब्रह्मा विस्त्र धोखे गये, भरम परा संसार ॥ करताके नहिं काम यह, यह सब माया कीन्ह। कहें कवीर बूझो माया को, नाव धरो जन कान्ह ॥
रमैनी ३ -सुन पंडित यक बात हमारी। तेरा सुत तुमहीको मारी ॥ काठ मथके अगिन उपाई। लौट अगिन वह काठे खाई ॥ दोउका नास भये एक ठाऊँ। उडगड़ भसम लीनका नाऊँ ॥ जो मिरगा संग मिरगा बंधाई। त्यों अपना सुत आपुहिं खाई ॥ ताते करम काठ उरझेरा। पंडित कहा न मानत मेरा ॥ काठ ते चुन उपजे भाई। लौट काठ वह चुन चुन खाई ॥
समै-बिही खेतहिं खात है, मात सुतन को खात।
कहें कवीर सुत नाती खाये, यह दुख नाहिं विहात ॥
रमैनी ३५-माके ससुरके उपाव बतावे। टोना टांबर बहुत
(५४८)
कवीरपंथी—
खिलावे ॥ सब घर लिया चोर बताई। घृतका दीपक धरा बनाई॥ झाँझ मंजीरा ढोल बजाया। खेला नावत भरम बताया॥ पता मिलाये सब पतियाने। टोना टांबर बहुत सुखमाने ॥
समै-मूठ हिलावे नावत, भरम भीहा बैठाय। कहें कवीर इन नावत, राखा सब जग भरमाय ॥ चुरैल भूत ना कोई, गन गंधर्व कोई नाहिं। मनसा डाइन संका भूत, संसार परा भ्रम माहिं॥
रमैनी ३६-जंत्र मंत्र तंत्र है सारा। त्रिभुवन अटका यही बिचारा ॥ नाटक चेटक ते लौ लाया। टोना टांबर बहुत कुछ भाया ॥ जनम विताना याही धंधा। करता आप न चीन्हे अंधा ॥ जहां बचन झूठ सुन पावे। लाभ जानके मूल गंवावे ॥ जंत्र मंत्र सो जग पतियाना। जंत्र मंत्रका मर्म न जाना ॥
समै-बीज ते आये चार गुण, बीचे गये सिराय।
उपज बिनस जाने नहीं, सब जग रहा भुलाय ॥
रमैनी ३७-कथते कथते जनम सब जाई। बिन बूझे कछु हाथ न आई ॥ रतिके कहे त्रिया सुख पाई। विषनी संग विस्वा जारो भाई ॥ सुखके कहे सुख जो होई। नैन कहे सूझे दृष्टि सोई ॥ भोजन कहे भूख जो जाई। तो धनके कहे धन घर आई ॥ अगिन कहे जरे जो पाऊं। बस्ती कहे उजर बस गाऊं ॥ पाथर पूजे मुक्त जो पावे। बिन नर नारी सो सुत जावे ॥ पाप कटे जो तीर्थ नहाये। लील दाग कटे न साबुन लाये ॥ जलके कहे जो त्रिषा बुझावे। तो जग राम कहे तर जावे ॥ बीज वृक्षका भेद जो पाई। तब यह काया अमर रहाई ॥
समै-राम कहत २ जग बीता, कहूं न मिलिया राम। कहें कवीर जिन रामहि जाना, तिनके भये सब काम ॥ यह दुनिया भई बावरी, अद्विस्ट सो बांधा नेह। कहें कवीर द्विस्टमान छोड़के, सेवे पुरुष विदेह ॥
शब्दावली
(५४९)
रमैनी ३८-पाथरकी क्या कीजे सेवा ! बोले न चाले कहे न भेवा ॥ विन देखेकी झूठी आसा । जल होते क्यों मरे पियासा ॥ जब तक ना देखे अपने नैना । तब तक न पतीजे गुरुके वैना ॥ शिष्य पियासा गुरुपै जाई । चेलाकी नहीं त्रिषा बुझाई ॥ कछु-वन वस्तु अमोल बिकाई । राजा रंक विसाहे जाई ॥ वस्तु लीन कछु हाथ न आया । लाभ जान फिर मूल गंवाया ॥ सब गुण पूजे निरगुण सेवा । पै नहीं पूजे आत्म देवा ॥
समै-जहँ नहीं तहँ सब कछु, वह की बांधी आस । कहें कवीर ये क्यों न त्रिपत, दोऊकी एके ध्यास ॥
रमैनी ३९-आपहि बृच्छ आपही चेला । आपहि गुरु आपही चेला ॥ आपहि जीवे आपही मारे । आपहि बहे आपही सारे ॥ आपहि जती आप संयोगी । आप संन्यासी आप वियोगी ॥ आपहिं गिरही आप बैरागी । आपहिं गुनी आप गुन त्यागी ॥ आप अज्ञान आप है ज्ञानी । आपहिं आप दूसर कर मानी ॥ आप पुजेरी आपहिं देवा । आप अभेद आप होय भेवा ॥
समै-आप सबनमें होय रहा, आपन भया निनार ।
कहें कवीर एक बूझ बिन, भटका सब संसार ॥
रमैनी ४०-मनकी बातें अगम अपारा । मन भटकाया सब संसारा ॥ यह मन चोर चुगुल अपकारी । यह मन जीते यह मन हारी ॥ यह मन नाचे यह मन गावे । यह मन ताल मृदंग, बजावे ॥ यह मन देवी यह मन देवा । यह मन अपनी आप कर सेवा ॥ यह मन पुर्ष यह मन जोई । रूप न रेख न यह मन सोई ॥ यह मन जागे यह मन सोवे । यह मन हसै सो यह मन रोवे ॥ यह मन विरहिन ब्रह्म वियोगी । मनै जती और मनै संजोगी ॥ यह मन देव निरगुन आकारा । यह मन सुगम अगम अपारा ॥
(५५०)
कबीरपंथी—
यहि मनका है नाना रंगा । यह मनके बहु उठे तरंगा ॥ यह मन सब जग चुन चुन खाया । यह मन सब जगतको भरमाया ॥
समै-राजा रैयत होइ रहा, रैयत लीन्हहा पाज । रैयत चाहा सोइ लिया, ताते भया अकाज ॥ मूसा चढा बिलार पर, चढी सिंह पर गाय । कहैं कवीर कहत न आवे, सुतकी नारी माय ॥ जब जाना तव भरम भया, बिन जाने भया नास । कहैं कवीर पुकारके, मनके झूठी आस ॥
रमैनी ४१-हंसी न जावे आवे न रोई । धोखे मरे पुरुष औ जोई ॥ आदि भवानी ह्री हमारी । हमैं छोड़ भई सुतकी नारी ॥ हमरा यह सब कीन कराया । अनख मान उन मनहिं दुराया ॥ निरगुण रचा पुरुष एक माया । हमको तज उनको बतलाया ॥ अब हम कासों करे पुकारा । हारल बिनवे आपन हारा ॥
समै-महा गुननकी आगरी, महा अपरबल नारि । कहैं कवीर यह बड़ा अचंभा, व्याहत भई कुमारी ॥ निरगुन आपन उन रचा, लौट भई वह नार । कहैं कवीर अनखायके, रचा पुरुष निरकार ॥ निरगुण निराकार करता ठहराया, तिनहुं दिया उपदेश । कहैं कवीर त्रिगुन चले, जहाँ न चंद दिनेस ॥
रमैनी ४२-कोई तीरथ वरत ठहरावा । कोई जप तप कर भरमावा ॥ कोई उरझे वेद पुराना । पूजा रची कोउ अरुझाना ॥ कोई नाद बिदमें लागा । सुत्र विसन्न कोइ चला अभागा ॥ कोई बैठा आसन मारी । पंचअगिन कोई तन जारी ॥ कोई मूंड मुढ़ाय भर्माना । कंठी छाप तिलक मन माना ॥ नाना भांति पृथ्वी लागी । बिन कर्ता मन भरम न भागी ॥
समै-गुरवा संग सब कोइ भटके, करता परा न चीन्ह । कहैं कवीर मनके भ्रम भूले, गुरु सिकख जिव दान ॥ आगे आगे गुरु
शब्दावली
(५५१)
चला, जहां न ससि औ भान । कहें कवीर पाछे चला, गुरुमे यहू समान ॥
रमैनी ४३-रंकार माया जब चीन्हा । यही मंत्र ब्रह्माको दीन्हा ॥ ब्रह्माते शिव विष्णु भाई । यही मंत्र सनकादिक गाई ॥ यही मंत्र नारदमुनि पावा । यही मंत्र सुर नर मुनि ध्यावा ॥ यह मंत्र जपा गौतम व्यासा । यही मंत्रका शिव डुरवासा ॥ यही मंत्रका त्रिभुवन चेला । याही मंत्रके बृच्छ नवेला ॥ यही मंत्र कथा वेद पुराना ॥ यही मंत्र सबके मन माना ॥
समै-माता गुरु पुत्र भये चेला, सुतको मंत्र दीन । कहें कवीर माताको वचन, सबहिन चित धर लीन ॥ तिसका मंत्र सब जपे, जिसके हाथ न पांव । कहें कवीर सो सुत माको, दिया निरंजन नांव ॥ जपते २ जी गया, काहू मिलिया नाहिं । कह कवीर तउ नाही समझे, सब लागे वहि माहिं ॥
रमैनी ४४-जमी असमान तहां नहिं सोई । हता न पुरुष हता न कोई ॥ पांचो तत्त्व हते नहिं भाई । यह विश्वरूप कहां ते आई ॥ कहांते आई आदिभवानी । कैसे रची चंडिका रानी ॥ कौनसे जगह राम अस्थाना । श्री सहित कह रहे भगवाना ॥ कौन सरूप कौनसे देशा । पंडित मुझको देहु संदेशा ॥ लौट पंडिता कहें कहानी । भक्त भागवत रहो तहाँ आनी ॥
समै-बिस्व रूप सब साथ था, बिस्वरूप यह सोय । जैसे साज पीड़की, आगे पाछे न होय ॥ बहे बहाये जात थे, लोक वेदके साथ । बीचे सतगुरु मिल गये, दीपक दीन्हा हाथ ॥ तुझ-हीसे सब कुछ भया, सब कुछ तुझही माहिं । कहें कवीर सुन पंडिता, तेहि ते अंते नाहिं ॥
(५५२)
कवीरपंथी-
रमैनी ४५-बूझो पंडित बात हमारी। वेद पुरान शास्त्र विचारी ॥ बिजनासे पौन कहाँते आई। बिजना टूटे कहाँ समाई ॥ काठते अगिन काठको खाई। लौट अगिन वह कहाँ समाई ॥ काशीमें धुन उठहिँ अपारा। काशी टूटे कहाँ विचारा ॥ होते बिरवा लीन उखारी। फल औ फूल गये केहि बारी ॥
समै-करता सब घट पूरना, जगमें रहा समाय। कहे कवीर एक जुगति बिन, सब कुछ गया नसाय ॥
रमैनी ४६-भौ को सागर यह संसारा। सब जिवपर माया की लारा ॥ देव रिषी सुर गये सयाने। त्रिगुन गये जात नहीं जाने ॥ गंधर्व पुरुष औ जोई। असुर मुनी सुर रहा न कोई ॥ पीर पैगम्बर औलिया भाई। गौस कुतुब औ राजा राई ॥ यह भवसागर भव अस्थाना। अंत एक दिन सबको जाना ॥ निर- गुन पुरुष रहेगा सोई। त्रिभुवन मरे रहे न कोई ॥
समै-आद अंत अमर हम देखा, जीव मुवा नहीं कोय। यह विश्व रूप ब्रह्मज्ञानी, उत्पत्त प्रलय न होय ॥ मत भूलो ब्रह्म- ज्ञानी, लोक वेदके साथ। कहे कवीर यह बूझ हमारी, सो दीपक लीजे हाथ ॥
रमैनी ४७-बैठ सिंहासन आद भवानी। तीनों सीस नवायो आनी ॥ भय आयसु सेवा चित लावा। आद पुरातम भेद बतावा ॥ हम महामाया मातु तुम्हारी। तीनों मानो बात हमारी ॥ लौटि पूछे ब्रह्मा यह बता। काकी नार कहो तुम माता ॥ निरं- कार निरगुन जो देवा। सो मम कंथ कहा यह भेवा ॥
समै-त्रिदेवा सुमरन लगे, पूजा रचा अंथ। तिरिया गई पर पुरुषपै, छोड आपना कंथ ॥ त्रिया कंत न माने, कंता ठाढे द्वार। मुतको कंत कीन्ह बरनारी, महा अपरबल नार ॥
शब्दावली
(५५३)
रपैनी ४८-इच्छा विग्रित जबे जिय आई। बीजमें अंकुर तबे दिखाई ॥ उठा बीज तीन भय बारा। तीन भये संयोग व्योहारा ॥ महामाया महा रीत भारी। कंतापै आई वह नारी ॥ रीत माँग रीत दीन नचाई। त्रिया अनखाय पुत्रपै आई ॥ धिरज न कीन्ह नारि अनखानी। तजा कंत पुत नारी मानी ॥
समै-कर्ता हम कर्ताकी नार, धीरज न कीन उन। निरगुन रचा विचार, धीरजमें सब होत था ॥ अधीरज कीन्ह विनास, कवीर अब कछु न कहना। अबकी गूठी आस, काहू विधि बनैना ॥
रपैनी ४९-ब्रह्मा पूछे सुनो भवानी। अपने आप तुम कहो कहानी ॥ लौट भवानी सुत समुझावे। अपने पार न और बतावे ॥ खंड ब्रह्मण्ड मैं रची अनंता। सूर्य चंद्र उड़गन अनंता ॥ चौरासी सब हमहीं निरमाई। ओंकार जब ताहि सुनाई ॥ आदि अंत मोहि पूजे देवा। करो हमारी तीनों सेवा ॥
समै-निर्गुन निर्गुन दोऊ उड़ाइस, आप रही ठहराय। आपहिं पुरुष नारि ठहरानी, ब्रह्मा कहे समझाय ॥ ब्रह्माके प्रतीत भई, बांधा वेद ग्रन्थ। प्रगट नैनन देखत नहीं, परा वेदके पंथ ॥ मायाते यह वेद भै, वेद मध्य दोय तत्। निर्गुन सर्गुन दो बतलावे, कहे नाहिं जो सत् ॥
रपैनी ५०-परम मद माते नर औ नारी। जुग गये चार न मिटी खुमारी ॥ माते ब्रह्मा विष्णु महेशा। माते नारद शारद शेषा ॥ माते सनकादिक सब देवा। माते रिषि मुनि करते सेवा ॥ माते नाथ सिद्ध गोपाला। माते शिव नारी वृजबाला ॥ माती लच्छमी आदि भवानी। माती सती ब्रह्मा ब्रह्मज्ञानी ॥ तीन लोक परम मद माता। सिध साधक है येही बाता ॥
समै-महामाया भाठी रची, तीन लोक बिस्तार। कहैं कवीर हम
(५५४)
कवीरपंथी-
रहे निनारे, पी माता संसार। ब्रह्मा पियत पिया सब काहू, करता अपन न चीन्ह। कहैं कवीर अब कहत न आवे, विरंच इसारा कीन्ह ॥
रमैनी ५१—सबे आस वहांकी ठानी। वहांकी गति काहु न जानी ॥ निराकार सब करे करावे। ज्यों बाजीगर कपिहि नचावे ॥ वाहिके हाथ जीवन औ मरना। ताते वाही पुरुषते डरना ॥ वह सब ठाँव सबसे न्यारा। उनहिं कीन्ह यह सब बिस्तारा ॥
समै—कब जेहो वहि देशवा, जहां पुरुष निरंकार। कहैं कवीर हमहूं ते कहियो, जब होय चलन तुम्हार ॥ आगे गये तिन किनहु न कहिया, अब तुम लीजो साथ ॥ जो है तुम्हे भरोसवा, गहो हमारा हांथ ॥ त्रिय देवा जान्यो नहीं, कौन रूप केहि देश। अबहूं चेत समझ नर बौरे, झूठा दिया उपदेश ॥
रमैनी ५२—महामति माया आदि भवानी। पांडव घर द्रोणदीरानी ॥ रुधिर पियासी भइ मह माया। अष्टादस छोनी दल खाया ॥ इतने खायसि तउ न अघानी। पांडव गरे हेवारे आनी ॥ छप्पनकोट जुदुबंस सिधारी। तऊ न त्रिपित भई हत्यारी ॥ सुभ निसुभ महिषासुर मारा। हरनाकुश रावन संहारा ॥ सुरनर मुनि सब खोये झारी। कोइ न बाँचा यह संसारी ॥
समै—करताते अनखानी माया, आगम कीन्ह उपाय। कहैं कवीर त्रिया चंचल, राखा पुरुष दुराय ॥ केता हम समझाइया, पै ना समझे कोय। उनका कहा जगत मिल माना, हमरे कहे क्या होय ॥
रमैनी ५३—ब्रह्माके घर भई भवानी। शिवके बैठी आदू भवानी ॥ विष्णुके भई लछमी नारी। गंधर्वके घर अप्सरा वारी ॥ इंद्रके बैठी होय इंद्रानी। राजाके घर भई पटरानी ॥ जोगीके चेली होय
संवादक
(५५२)
आई । देवनके देवांगना कहाई ॥ तुरकनके तुरकानी खेली । सब घर छला त्रिया अकेली ॥
समै-पुरुष अपनते विरची नारी, घर २ कीन्हा ठाँव ।
निरगुनको करता ठहराया, मेट हमारा नांव ॥
रमैनी ५४-त्रिय देवा मिल पृष्ठ भेवा । कैसे तुम्हे पढायो देवा ॥ वह निरगुन तुमहो गुनवंती । निरगुनते कैसे भई जनती । प्रथमे माय होय फिर नारी । यह मेटो तुम संक हमारी ॥ निरा-कार निरगुन है करता । चहिये सो करे चित धरता ॥ उनका आदि अंत नहीं पाया । जिन रचि हमको तुम्हे पढाया ॥
समै-त्रियदेवा समझे नहीं, भई मायते नार ।
उन भूलत भूला सब कोई, कहैं कवीर पुकार ॥
रमैनी ५५-वेद शास्त्रको वोहू गुन गावे । नेति २ फिर अथाह सुनावे ॥ जोगी गगन मंडलको धावे । देख आप दूजा ठहरावे ॥ बैरागी चितमे धारे ध्याना । दृशरूप नारायन ठाना ॥ जिंदा कहैं नूर हम देखा । झूठा दृशन नहीं विशेषा ॥ करता अपन न चीन्हे कोई । ईसर सुमरे पुरुष औ जोई ॥
समै-वेद बरन जो पावैं, कहैं एक तो बात ।
जैसी कुछ माता कही, सोइ कहैं दिन रात ॥
रमैनी ५६-इच्छा रूप भई एक गाई । सो वह गाय महा हर-हाई ॥ चार पाँव दोय सींग है भाई । पत्र अठारे परम सुहाई । नौ नारीका पीवे पानी । स्वेत सींग बिगरहकी खानी ॥ सुर नर सुनी करें नित सेवा । ब्रह्मा विष्णु महेसर देवा ॥ गाई बांध बिच दावर लाई । तब वह गाई तोड़ पराई ॥
समै-वृक्ष एक छाके नई, फूटी साखा चार ।
अठारह पत्र चार फल लागे, फुलवा लेहु विचार ॥
(५५६)
कवारपथा-
रमैनी ५७-सांचा देव झूठ पूजे देवा । वृक्ष नहीं फल चाहे करि सेवा । झूठे पीर पैगम्बर भाई । सांचा देव झूठ लौ लाई॥ झूठे योगी जंगम उरझाने । झूठे हिंदू हरी न जाने ॥ झूठे तुर्क अल्लह नहीं पाया । बैरागी झूठे सूड मुडाया ॥ झूठा ध्यान लगावे सेवा । लोटाखियाय पुजावे देवा ॥ तीरथ जाय पै राम न जाना । झूठ परंपंच जगत पतियाना ॥ झूठ सन्यासी जटा रखावे । करता का कछु भेद न पावे ॥
समै-तुम जो भूले वेद विद्या, करता अपन न चीन्ह ।
कह कवीर यहि अमर्म, सकल सृष्टि जिय दीन ॥
रमैनी ५८-जने तीन परंपंची देवा । तिनहुं उनकी कीन्ही सेवा ॥ सेवा कीन्ह भेद नहीं पाया । उन अनखायके हमें छिपाया ॥ जोग जुगत ब्रह्माको दीन्हा । कुंडली साथ गगनको चीन्हा ॥ काया माहिं एक मंजारी । तेहि संग जोगी जोग बिचारी ॥ दिन उपदेश निरगुन ठहरावा । पेंड छोड़ डार अरुझावा ॥
समै-उनके संग गये तिरदेवा, गया जग उनके साथ ।
कहै कवीर अब मरो मसोसन, मल २ दोनों हाँथ ॥
रमैनी ५९-भेद अभेद न उनके होई । निगुन पुरुष करता है सोई ॥ हते न तत् न त्रिगुन देवा । सकल कीन्ह यह सुन्यते भेवा ॥ नाभि कमल होय ब्रह्मा आया । तिन पहिले नारदको जाया ॥ फिर ब्रह्माकी इच्छा आई । मानसी पुत्र भये बहु भाई ॥ ब्रह्मा जान धरले बैरागा । बिना गहे बजावे रागा ॥ साठ कन्या ब्रह्मा ठहराई । कश्यप तिन मिल सृष्टि कराई ॥
समै-निहततसे कैसे तत भया, सुन्न ते भया अकार । कश्यप कन्या कहाँ हती, पंडित कहो विचार ॥ पुरुष कामिनि एक संग, कंथ नर संयोग । कहै कवीर सुन पंडिता, पुत्र न कंथ वियोग ॥
शब्दावली ।
(५५७)
रमैनी ६०-मैं तोहि पूछो पंडित ज्ञानी । पंद्रह तिथ तैं कहाँसे आनी ॥ सात दिवसको करे है भाई । राम पाषाण कैसे भय आई ॥ चार बरन कहाँते आना । जुगन चारका करो बखाना ॥ कौन मते भाई बहिन नारी । पुत्र पिता ठहरी महतारी ॥ दोय संयोग अनेक होय आया । कहो पंडित कैसे ठहराया ॥
समै-पंडित भूला वेद पढ़ि, लखा मूल ना भेद ।
एक नारि एक पुरुषते, सकल साजना खेद ॥
रमैनी ६१-निरगुन पुरुष निरंजन देवा । सब जग करे ताहिकी सेवा ॥ अपन अपन मत कीन्ह विचारी । बात न बूझै कोई हमारी ॥ बैरागी कहे लेउ बैरागा । ब्रह्मचारी तीरथ व्रत लगा ॥ सन्यासी सर्वनास कराया । जोगी जुगति कर प्रान चढ़ाया ॥ जिंदा परा कुरानके फंदा । भा छानवे झूठ पाखंड़ा । भेष धरी यहि गुरुवा खिलावे । आप गुरु होय जगत बतावे ॥
समै-नहि कंठी नहि माल है, नहीं तिलक नहीं छाप । नहि वाके कछु भेष है, नहि वाके तप जाप ॥ जात बरण कछु भेष नहि, नहि धोखेकी बात । ज्ञान भया, धोखा गया, ज्यों तारा परभात ॥ जो बहा सो बहनदे, ताते चेत शरीर । तैं अपनेको बूझले, कहत पुकार कवीर ॥
रमैनी ६२-मन थिर होय बसे घर मेरा । यह मन घर जारे बहुतेरा ॥ जहं २ जाय तहाँ तहं फंदा । किनहु न देखा परम अनंदा ॥ जोगी जती तपी सन्यासी । ब्रह्म चार बैराग उदासी ॥ तत्त्व जार जीवको नासे । धोखा अपना नाहि बिनासे ॥ धोखा कोइ न बुझावन हारा ॥
समै-आपन घर माहुर भयो, छोड़ छोड़ पछताय ।
कहैं कवीर घर औरके, पूछत पूछत जाय ॥
(५५८)
कवारिषा-
रमैनी ६३-अंते दूढे सब संसारा । करता निकट न लखे गंवारा ॥ आद उपदेश समाध लगाई । अंग बिहूने रहा लौ लाई ॥ पांच तत्त्वका नास कराया । निराकार समाध पर आया ॥ पांच तत्त्व जीव है सोई । तत्त्व हीनता पुरुष न कोई ॥ चार ठौर गुरुवा दिखराया । तेहि धोखे मिल सुन्य समाया ॥
समै-पांचतत्त्व निज मूल है, हम करता इन माहिं ।
नख सिखते पूर्ण बना, सो फिर अंते नाहिं ॥
रमैनी ६४-धोखे २ गया समाई । धोखा की कछु खबर न पाई ॥ धोखे धोखे भया अकाजा । धोखे गया जीव विन काजा ॥ धोखे २ वह भइ न्यारी । धीरज न कीन्ह बिलग गइ नारी ॥ धोखे २ सब घर खोया । धोखे बीज धोखे कह बोया ॥ समै-हसों तो दाव परखिये, रोवों काजर ढरि जाय ।
मनही मन के बूझना, ज्यों काटे चुन खाय ॥
रमैनी ६५-हमरा यहै तन जियरा भाई । आस बांध सुन्यमें जाई ॥ आसा काल अहेरी आया । तिन मेरे तीनों पुत खाया ॥ जहं लग मोर बीज बिस्तारा । तहं लग आसा कीन्ह ख्वारा ॥ केतो चेतावों चेते नाहीं । अचेत पिंड सदा भरमाहीं ॥ कहा हमार न मानै कोई । पुरुष अपन आपन मत जोई ॥
समै-संसे खायो खेत, केत्र बर लोही भयो । वाय जगतकी रीत, हीरा जर कोयला भयो ॥ उपज विनसमें सब परे, कोई भया न थीर । करता अपन न चीन्हई, कासों कहें कवीर ॥
रमैनी ६६-हम दूढा यह सब संसारा । कोई न माने कहा हमारा ॥ सुन्य सिखरमें मन अरुझाना । सुन्य सेइके सुन्य समाना ॥ बिरला बूझै बात हमारी । धोखा न तजे बसे संसारी ॥
समै-बहुत मिले बहु भांति, मन अनमिल सब सो रहा ।
शब्दावली
(५५९)
जाते जियकी पांत, ते जग दुर्लभ पाहुना ॥ जान पूछ कुंवा न परे, तजा न पुरुष विदेह । कहैं कवीर कासों कहूँ जो छोडे झूठ सनेह ॥
रमैनी ६७—चले जात सब रंक औ राया । स्थान रहनको किनहु न पाया ॥ जो समझाऊं समझे न कोई । सुनके वचन वैरी जग होई ॥ सूसाके डर नाच बिलारी । सिंह गऊकी करे रखवारी ॥ भैसा न्याव चुकावे भाई । मछरी चढी खजूरपै जाई ॥ केचुआ सरपते कीन्ह सनेहा । घट २ रहा एक पुरुष विदेहा ॥
समै-रात दिन कछु है नहीं, सुन्य पींजरती है सूवा । कहैं कवीर रूयाल यह अटपट, नहीं जिया न सूवा ॥ जाने नहीं जान जग दीना, जानते भया बिजान । कहैं कवीर बेजानको, अबहुंक परे पहिचान ॥
रमैनी ६८—ग्रह चालको करे बिचारा । पाखंड होय जगत रखवारा ॥ द्वादस रास पृथ्वी परछाई । चौवन अच्छर वसे तेहि आई ॥ रासे रास ग्रह नौ लागे । ग्रह चालमें परे अभागे ॥ गृह-मंदिलकी खबर न पाई । ग्रहन बीच बसे सब भाई ॥ जो देखे सो ग्रहको फंदा । ग्रिहि न देखो को अनंदा ॥ नहिं जानो ग्रह कहांति आया । मोहिं नहिं काहू ग्रह बताया ॥
समै-ग्रहन नाही पर सब जगत, परे गरहन केरा भाग । मैं नहिं जानो पंडित कवे, गरहन ऐहि लाग ॥ चंदा गरहन गरासिया, ऐसे गिरहित लोग । उग्रह होन न पावई, दिन २ बाढे रोग ॥
रमैनी ६—सुख तजके जग दुख बिसाहीं । आपहिं सुख आपहिं दुखलाहीं ॥ जहां जाय तहं औरहि रीती ॥ जगकी परी काल सो प्रीती ॥ पंडित मिले ग्रह दशा बतावैं । नावत भूत प्रेत सुनावैं ॥ ऋषि मुनि कर्म कहैं समगाई । वैद्य पित्त कफ बात