भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५५९)

जाते जियकी पांत, ते जग दुर्लभ पाहुना ॥ जान पूछ कुंवा न परे, तजा न पुरुष विदेह । कहैं कवीर कासों कहूँ जो छोडे झूठ सनेह ॥

रमैनी ६७—चले जात सब रंक औ राया । स्थान रहनको किनहु न पाया ॥ जो समझाऊं समझे न कोई । सुनके वचन वैरी जग होई ॥ सूसाके डर नाच बिलारी । सिंह गऊकी करे रखवारी ॥ भैसा न्याव चुकावे भाई । मछरी चढी खजूरपै जाई ॥ केचुआ सरपते कीन्ह सनेहा । घट २ रहा एक पुरुष विदेहा ॥

समै-रात दिन कछु है नहीं, सुन्य पींजरती है सूवा । कहैं कवीर रूयाल यह अटपट, नहीं जिया न सूवा ॥ जाने नहीं जान जग दीना, जानते भया बिजान । कहैं कवीर बेजानको, अबहुंक परे पहिचान ॥

रमैनी ६८—ग्रह चालको करे बिचारा । पाखंड होय जगत रखवारा ॥ द्वादस रास पृथ्वी परछाई । चौवन अच्छर वसे तेहि आई ॥ रासे रास ग्रह नौ लागे । ग्रह चालमें परे अभागे ॥ गृह-मंदिलकी खबर न पाई । ग्रहन बीच बसे सब भाई ॥ जो देखे सो ग्रहको फंदा । ग्रिहि न देखो को अनंदा ॥ नहिं जानो ग्रह कहांति आया । मोहिं नहिं काहू ग्रह बताया ॥

समै-ग्रहन नाही पर सब जगत, परे गरहन केरा भाग । मैं नहिं जानो पंडित कवे, गरहन ऐहि लाग ॥ चंदा गरहन गरासिया, ऐसे गिरहित लोग । उग्रह होन न पावई, दिन २ बाढे रोग ॥

रमैनी ६—सुख तजके जग दुख बिसाहीं । आपहिं सुख आपहिं दुखलाहीं ॥ जहां जाय तहं औरहि रीती ॥ जगकी परी काल सो प्रीती ॥ पंडित मिले ग्रह दशा बतावैं । नावत भूत प्रेत सुनावैं ॥ ऋषि मुनि कर्म कहैं समगाई । वैद्य पित्त कफ बात