कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 572, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(५५८)
कवारिषा-
रमैनी ६३-अंते दूढे सब संसारा । करता निकट न लखे गंवारा ॥ आद उपदेश समाध लगाई । अंग बिहूने रहा लौ लाई ॥ पांच तत्त्वका नास कराया । निराकार समाध पर आया ॥ पांच तत्त्व जीव है सोई । तत्त्व हीनता पुरुष न कोई ॥ चार ठौर गुरुवा दिखराया । तेहि धोखे मिल सुन्य समाया ॥
समै-पांचतत्त्व निज मूल है, हम करता इन माहिं ।
नख सिखते पूर्ण बना, सो फिर अंते नाहिं ॥
रमैनी ६४-धोखे २ गया समाई । धोखा की कछु खबर न पाई ॥ धोखे धोखे भया अकाजा । धोखे गया जीव विन काजा ॥ धोखे २ वह भइ न्यारी । धीरज न कीन्ह बिलग गइ नारी ॥ धोखे २ सब घर खोया । धोखे बीज धोखे कह बोया ॥ समै-हसों तो दाव परखिये, रोवों काजर ढरि जाय ।
मनही मन के बूझना, ज्यों काटे चुन खाय ॥
रमैनी ६५-हमरा यहै तन जियरा भाई । आस बांध सुन्यमें जाई ॥ आसा काल अहेरी आया । तिन मेरे तीनों पुत खाया ॥ जहं लग मोर बीज बिस्तारा । तहं लग आसा कीन्ह ख्वारा ॥ केतो चेतावों चेते नाहीं । अचेत पिंड सदा भरमाहीं ॥ कहा हमार न मानै कोई । पुरुष अपन आपन मत जोई ॥
समै-संसे खायो खेत, केत्र बर लोही भयो । वाय जगतकी रीत, हीरा जर कोयला भयो ॥ उपज विनसमें सब परे, कोई भया न थीर । करता अपन न चीन्हई, कासों कहें कवीर ॥
रमैनी ६६-हम दूढा यह सब संसारा । कोई न माने कहा हमारा ॥ सुन्य सिखरमें मन अरुझाना । सुन्य सेइके सुन्य समाना ॥ बिरला बूझै बात हमारी । धोखा न तजे बसे संसारी ॥
समै-बहुत मिले बहु भांति, मन अनमिल सब सो रहा ।