कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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रमैनी ६०-मैं तोहि पूछो पंडित ज्ञानी । पंद्रह तिथ तैं कहाँसे आनी ॥ सात दिवसको करे है भाई । राम पाषाण कैसे भय आई ॥ चार बरन कहाँते आना । जुगन चारका करो बखाना ॥ कौन मते भाई बहिन नारी । पुत्र पिता ठहरी महतारी ॥ दोय संयोग अनेक होय आया । कहो पंडित कैसे ठहराया ॥
समै-पंडित भूला वेद पढ़ि, लखा मूल ना भेद ।
एक नारि एक पुरुषते, सकल साजना खेद ॥
रमैनी ६१-निरगुन पुरुष निरंजन देवा । सब जग करे ताहिकी सेवा ॥ अपन अपन मत कीन्ह विचारी । बात न बूझै कोई हमारी ॥ बैरागी कहे लेउ बैरागा । ब्रह्मचारी तीरथ व्रत लगा ॥ सन्यासी सर्वनास कराया । जोगी जुगति कर प्रान चढ़ाया ॥ जिंदा परा कुरानके फंदा । भा छानवे झूठ पाखंड़ा । भेष धरी यहि गुरुवा खिलावे । आप गुरु होय जगत बतावे ॥
समै-नहि कंठी नहि माल है, नहीं तिलक नहीं छाप । नहि वाके कछु भेष है, नहि वाके तप जाप ॥ जात बरण कछु भेष नहि, नहि धोखेकी बात । ज्ञान भया, धोखा गया, ज्यों तारा परभात ॥ जो बहा सो बहनदे, ताते चेत शरीर । तैं अपनेको बूझले, कहत पुकार कवीर ॥
रमैनी ६२-मन थिर होय बसे घर मेरा । यह मन घर जारे बहुतेरा ॥ जहं २ जाय तहाँ तहं फंदा । किनहु न देखा परम अनंदा ॥ जोगी जती तपी सन्यासी । ब्रह्म चार बैराग उदासी ॥ तत्त्व जार जीवको नासे । धोखा अपना नाहि बिनासे ॥ धोखा कोइ न बुझावन हारा ॥
समै-आपन घर माहुर भयो, छोड़ छोड़ पछताय ।
कहैं कवीर घर औरके, पूछत पूछत जाय ॥