कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 570, कुल 968 में से
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कवारपथा-
रमैनी ५७-सांचा देव झूठ पूजे देवा । वृक्ष नहीं फल चाहे करि सेवा । झूठे पीर पैगम्बर भाई । सांचा देव झूठ लौ लाई॥ झूठे योगी जंगम उरझाने । झूठे हिंदू हरी न जाने ॥ झूठे तुर्क अल्लह नहीं पाया । बैरागी झूठे सूड मुडाया ॥ झूठा ध्यान लगावे सेवा । लोटाखियाय पुजावे देवा ॥ तीरथ जाय पै राम न जाना । झूठ परंपंच जगत पतियाना ॥ झूठ सन्यासी जटा रखावे । करता का कछु भेद न पावे ॥
समै-तुम जो भूले वेद विद्या, करता अपन न चीन्ह ।
कह कवीर यहि अमर्म, सकल सृष्टि जिय दीन ॥
रमैनी ५८-जने तीन परंपंची देवा । तिनहुं उनकी कीन्ही सेवा ॥ सेवा कीन्ह भेद नहीं पाया । उन अनखायके हमें छिपाया ॥ जोग जुगत ब्रह्माको दीन्हा । कुंडली साथ गगनको चीन्हा ॥ काया माहिं एक मंजारी । तेहि संग जोगी जोग बिचारी ॥ दिन उपदेश निरगुन ठहरावा । पेंड छोड़ डार अरुझावा ॥
समै-उनके संग गये तिरदेवा, गया जग उनके साथ ।
कहै कवीर अब मरो मसोसन, मल २ दोनों हाँथ ॥
रमैनी ५९-भेद अभेद न उनके होई । निगुन पुरुष करता है सोई ॥ हते न तत् न त्रिगुन देवा । सकल कीन्ह यह सुन्यते भेवा ॥ नाभि कमल होय ब्रह्मा आया । तिन पहिले नारदको जाया ॥ फिर ब्रह्माकी इच्छा आई । मानसी पुत्र भये बहु भाई ॥ ब्रह्मा जान धरले बैरागा । बिना गहे बजावे रागा ॥ साठ कन्या ब्रह्मा ठहराई । कश्यप तिन मिल सृष्टि कराई ॥
समै-निहततसे कैसे तत भया, सुन्न ते भया अकार । कश्यप कन्या कहाँ हती, पंडित कहो विचार ॥ पुरुष कामिनि एक संग, कंथ नर संयोग । कहै कवीर सुन पंडिता, पुत्र न कंथ वियोग ॥