भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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संवादक

(५५२)

आई । देवनके देवांगना कहाई ॥ तुरकनके तुरकानी खेली । सब घर छला त्रिया अकेली ॥

समै-पुरुष अपनते विरची नारी, घर २ कीन्हा ठाँव ।

निरगुनको करता ठहराया, मेट हमारा नांव ॥

रमैनी ५४-त्रिय देवा मिल पृष्ठ भेवा । कैसे तुम्हे पढायो देवा ॥ वह निरगुन तुमहो गुनवंती । निरगुनते कैसे भई जनती । प्रथमे माय होय फिर नारी । यह मेटो तुम संक हमारी ॥ निरा-कार निरगुन है करता । चहिये सो करे चित धरता ॥ उनका आदि अंत नहीं पाया । जिन रचि हमको तुम्हे पढाया ॥

समै-त्रियदेवा समझे नहीं, भई मायते नार ।

उन भूलत भूला सब कोई, कहैं कवीर पुकार ॥

रमैनी ५५-वेद शास्त्रको वोहू गुन गावे । नेति २ फिर अथाह सुनावे ॥ जोगी गगन मंडलको धावे । देख आप दूजा ठहरावे ॥ बैरागी चितमे धारे ध्याना । दृशरूप नारायन ठाना ॥ जिंदा कहैं नूर हम देखा । झूठा दृशन नहीं विशेषा ॥ करता अपन न चीन्हे कोई । ईसर सुमरे पुरुष औ जोई ॥

समै-वेद बरन जो पावैं, कहैं एक तो बात ।

जैसी कुछ माता कही, सोइ कहैं दिन रात ॥

रमैनी ५६-इच्छा रूप भई एक गाई । सो वह गाय महा हर-हाई ॥ चार पाँव दोय सींग है भाई । पत्र अठारे परम सुहाई । नौ नारीका पीवे पानी । स्वेत सींग बिगरहकी खानी ॥ सुर नर सुनी करें नित सेवा । ब्रह्मा विष्णु महेसर देवा ॥ गाई बांध बिच दावर लाई । तब वह गाई तोड़ पराई ॥

समै-वृक्ष एक छाके नई, फूटी साखा चार ।

अठारह पत्र चार फल लागे, फुलवा लेहु विचार ॥