भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

रहे निनारे, पी माता संसार। ब्रह्मा पियत पिया सब काहू, करता अपन न चीन्ह। कहैं कवीर अब कहत न आवे, विरंच इसारा कीन्ह ॥

रमैनी ५१—सबे आस वहांकी ठानी। वहांकी गति काहु न जानी ॥ निराकार सब करे करावे। ज्यों बाजीगर कपिहि नचावे ॥ वाहिके हाथ जीवन औ मरना। ताते वाही पुरुषते डरना ॥ वह सब ठाँव सबसे न्यारा। उनहिं कीन्ह यह सब बिस्तारा ॥

समै—कब जेहो वहि देशवा, जहां पुरुष निरंकार। कहैं कवीर हमहूं ते कहियो, जब होय चलन तुम्हार ॥ आगे गये तिन किनहु न कहिया, अब तुम लीजो साथ ॥ जो है तुम्हे भरोसवा, गहो हमारा हांथ ॥ त्रिय देवा जान्यो नहीं, कौन रूप केहि देश। अबहूं चेत समझ नर बौरे, झूठा दिया उपदेश ॥

रमैनी ५२—महामति माया आदि भवानी। पांडव घर द्रोणदीरानी ॥ रुधिर पियासी भइ मह माया। अष्टादस छोनी दल खाया ॥ इतने खायसि तउ न अघानी। पांडव गरे हेवारे आनी ॥ छप्पनकोट जुदुबंस सिधारी। तऊ न त्रिपित भई हत्यारी ॥ सुभ निसुभ महिषासुर मारा। हरनाकुश रावन संहारा ॥ सुरनर मुनि सब खोये झारी। कोइ न बाँचा यह संसारी ॥

समै—करताते अनखानी माया, आगम कीन्ह उपाय। कहैं कवीर त्रिया चंचल, राखा पुरुष दुराय ॥ केता हम समझाइया, पै ना समझे कोय। उनका कहा जगत मिल माना, हमरे कहे क्या होय ॥

रमैनी ५३—ब्रह्माके घर भई भवानी। शिवके बैठी आदू भवानी ॥ विष्णुके भई लछमी नारी। गंधर्वके घर अप्सरा वारी ॥ इंद्रके बैठी होय इंद्रानी। राजाके घर भई पटरानी ॥ जोगीके चेली होय