कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
संवादक
(५५२)
आई । देवनके देवांगना कहाई ॥ तुरकनके तुरकानी खेली । सब घर छला त्रिया अकेली ॥
समै-पुरुष अपनते विरची नारी, घर २ कीन्हा ठाँव ।
निरगुनको करता ठहराया, मेट हमारा नांव ॥
रमैनी ५४-त्रिय देवा मिल पृष्ठ भेवा । कैसे तुम्हे पढायो देवा ॥ वह निरगुन तुमहो गुनवंती । निरगुनते कैसे भई जनती । प्रथमे माय होय फिर नारी । यह मेटो तुम संक हमारी ॥ निरा-कार निरगुन है करता । चहिये सो करे चित धरता ॥ उनका आदि अंत नहीं पाया । जिन रचि हमको तुम्हे पढाया ॥
समै-त्रियदेवा समझे नहीं, भई मायते नार ।
उन भूलत भूला सब कोई, कहैं कवीर पुकार ॥
रमैनी ५५-वेद शास्त्रको वोहू गुन गावे । नेति २ फिर अथाह सुनावे ॥ जोगी गगन मंडलको धावे । देख आप दूजा ठहरावे ॥ बैरागी चितमे धारे ध्याना । दृशरूप नारायन ठाना ॥ जिंदा कहैं नूर हम देखा । झूठा दृशन नहीं विशेषा ॥ करता अपन न चीन्हे कोई । ईसर सुमरे पुरुष औ जोई ॥
समै-वेद बरन जो पावैं, कहैं एक तो बात ।
जैसी कुछ माता कही, सोइ कहैं दिन रात ॥
रमैनी ५६-इच्छा रूप भई एक गाई । सो वह गाय महा हर-हाई ॥ चार पाँव दोय सींग है भाई । पत्र अठारे परम सुहाई । नौ नारीका पीवे पानी । स्वेत सींग बिगरहकी खानी ॥ सुर नर सुनी करें नित सेवा । ब्रह्मा विष्णु महेसर देवा ॥ गाई बांध बिच दावर लाई । तब वह गाई तोड़ पराई ॥
समै-वृक्ष एक छाके नई, फूटी साखा चार ।
अठारह पत्र चार फल लागे, फुलवा लेहु विचार ॥
(५५६)
कवारपथा-
रमैनी ५७-सांचा देव झूठ पूजे देवा । वृक्ष नहीं फल चाहे करि सेवा । झूठे पीर पैगम्बर भाई । सांचा देव झूठ लौ लाई॥ झूठे योगी जंगम उरझाने । झूठे हिंदू हरी न जाने ॥ झूठे तुर्क अल्लह नहीं पाया । बैरागी झूठे सूड मुडाया ॥ झूठा ध्यान लगावे सेवा । लोटाखियाय पुजावे देवा ॥ तीरथ जाय पै राम न जाना । झूठ परंपंच जगत पतियाना ॥ झूठ सन्यासी जटा रखावे । करता का कछु भेद न पावे ॥
समै-तुम जो भूले वेद विद्या, करता अपन न चीन्ह ।
कह कवीर यहि अमर्म, सकल सृष्टि जिय दीन ॥
रमैनी ५८-जने तीन परंपंची देवा । तिनहुं उनकी कीन्ही सेवा ॥ सेवा कीन्ह भेद नहीं पाया । उन अनखायके हमें छिपाया ॥ जोग जुगत ब्रह्माको दीन्हा । कुंडली साथ गगनको चीन्हा ॥ काया माहिं एक मंजारी । तेहि संग जोगी जोग बिचारी ॥ दिन उपदेश निरगुन ठहरावा । पेंड छोड़ डार अरुझावा ॥
समै-उनके संग गये तिरदेवा, गया जग उनके साथ ।
कहै कवीर अब मरो मसोसन, मल २ दोनों हाँथ ॥
रमैनी ५९-भेद अभेद न उनके होई । निगुन पुरुष करता है सोई ॥ हते न तत् न त्रिगुन देवा । सकल कीन्ह यह सुन्यते भेवा ॥ नाभि कमल होय ब्रह्मा आया । तिन पहिले नारदको जाया ॥ फिर ब्रह्माकी इच्छा आई । मानसी पुत्र भये बहु भाई ॥ ब्रह्मा जान धरले बैरागा । बिना गहे बजावे रागा ॥ साठ कन्या ब्रह्मा ठहराई । कश्यप तिन मिल सृष्टि कराई ॥
समै-निहततसे कैसे तत भया, सुन्न ते भया अकार । कश्यप कन्या कहाँ हती, पंडित कहो विचार ॥ पुरुष कामिनि एक संग, कंथ नर संयोग । कहै कवीर सुन पंडिता, पुत्र न कंथ वियोग ॥
शब्दावली ।
(५५७)
रमैनी ६०-मैं तोहि पूछो पंडित ज्ञानी । पंद्रह तिथ तैं कहाँसे आनी ॥ सात दिवसको करे है भाई । राम पाषाण कैसे भय आई ॥ चार बरन कहाँते आना । जुगन चारका करो बखाना ॥ कौन मते भाई बहिन नारी । पुत्र पिता ठहरी महतारी ॥ दोय संयोग अनेक होय आया । कहो पंडित कैसे ठहराया ॥
समै-पंडित भूला वेद पढ़ि, लखा मूल ना भेद ।
एक नारि एक पुरुषते, सकल साजना खेद ॥
रमैनी ६१-निरगुन पुरुष निरंजन देवा । सब जग करे ताहिकी सेवा ॥ अपन अपन मत कीन्ह विचारी । बात न बूझै कोई हमारी ॥ बैरागी कहे लेउ बैरागा । ब्रह्मचारी तीरथ व्रत लगा ॥ सन्यासी सर्वनास कराया । जोगी जुगति कर प्रान चढ़ाया ॥ जिंदा परा कुरानके फंदा । भा छानवे झूठ पाखंड़ा । भेष धरी यहि गुरुवा खिलावे । आप गुरु होय जगत बतावे ॥
समै-नहि कंठी नहि माल है, नहीं तिलक नहीं छाप । नहि वाके कछु भेष है, नहि वाके तप जाप ॥ जात बरण कछु भेष नहि, नहि धोखेकी बात । ज्ञान भया, धोखा गया, ज्यों तारा परभात ॥ जो बहा सो बहनदे, ताते चेत शरीर । तैं अपनेको बूझले, कहत पुकार कवीर ॥
रमैनी ६२-मन थिर होय बसे घर मेरा । यह मन घर जारे बहुतेरा ॥ जहं २ जाय तहाँ तहं फंदा । किनहु न देखा परम अनंदा ॥ जोगी जती तपी सन्यासी । ब्रह्म चार बैराग उदासी ॥ तत्त्व जार जीवको नासे । धोखा अपना नाहि बिनासे ॥ धोखा कोइ न बुझावन हारा ॥
समै-आपन घर माहुर भयो, छोड़ छोड़ पछताय ।
कहैं कवीर घर औरके, पूछत पूछत जाय ॥
(५५८)
कवारिषा-
रमैनी ६३-अंते दूढे सब संसारा । करता निकट न लखे गंवारा ॥ आद उपदेश समाध लगाई । अंग बिहूने रहा लौ लाई ॥ पांच तत्त्वका नास कराया । निराकार समाध पर आया ॥ पांच तत्त्व जीव है सोई । तत्त्व हीनता पुरुष न कोई ॥ चार ठौर गुरुवा दिखराया । तेहि धोखे मिल सुन्य समाया ॥
समै-पांचतत्त्व निज मूल है, हम करता इन माहिं ।
नख सिखते पूर्ण बना, सो फिर अंते नाहिं ॥
रमैनी ६४-धोखे २ गया समाई । धोखा की कछु खबर न पाई ॥ धोखे धोखे भया अकाजा । धोखे गया जीव विन काजा ॥ धोखे २ वह भइ न्यारी । धीरज न कीन्ह बिलग गइ नारी ॥ धोखे २ सब घर खोया । धोखे बीज धोखे कह बोया ॥ समै-हसों तो दाव परखिये, रोवों काजर ढरि जाय ।
मनही मन के बूझना, ज्यों काटे चुन खाय ॥
रमैनी ६५-हमरा यहै तन जियरा भाई । आस बांध सुन्यमें जाई ॥ आसा काल अहेरी आया । तिन मेरे तीनों पुत खाया ॥ जहं लग मोर बीज बिस्तारा । तहं लग आसा कीन्ह ख्वारा ॥ केतो चेतावों चेते नाहीं । अचेत पिंड सदा भरमाहीं ॥ कहा हमार न मानै कोई । पुरुष अपन आपन मत जोई ॥
समै-संसे खायो खेत, केत्र बर लोही भयो । वाय जगतकी रीत, हीरा जर कोयला भयो ॥ उपज विनसमें सब परे, कोई भया न थीर । करता अपन न चीन्हई, कासों कहें कवीर ॥
रमैनी ६६-हम दूढा यह सब संसारा । कोई न माने कहा हमारा ॥ सुन्य सिखरमें मन अरुझाना । सुन्य सेइके सुन्य समाना ॥ बिरला बूझै बात हमारी । धोखा न तजे बसे संसारी ॥
समै-बहुत मिले बहु भांति, मन अनमिल सब सो रहा ।
शब्दावली
(५५९)
जाते जियकी पांत, ते जग दुर्लभ पाहुना ॥ जान पूछ कुंवा न परे, तजा न पुरुष विदेह । कहैं कवीर कासों कहूँ जो छोडे झूठ सनेह ॥
रमैनी ६७—चले जात सब रंक औ राया । स्थान रहनको किनहु न पाया ॥ जो समझाऊं समझे न कोई । सुनके वचन वैरी जग होई ॥ सूसाके डर नाच बिलारी । सिंह गऊकी करे रखवारी ॥ भैसा न्याव चुकावे भाई । मछरी चढी खजूरपै जाई ॥ केचुआ सरपते कीन्ह सनेहा । घट २ रहा एक पुरुष विदेहा ॥
समै-रात दिन कछु है नहीं, सुन्य पींजरती है सूवा । कहैं कवीर रूयाल यह अटपट, नहीं जिया न सूवा ॥ जाने नहीं जान जग दीना, जानते भया बिजान । कहैं कवीर बेजानको, अबहुंक परे पहिचान ॥
रमैनी ६८—ग्रह चालको करे बिचारा । पाखंड होय जगत रखवारा ॥ द्वादस रास पृथ्वी परछाई । चौवन अच्छर वसे तेहि आई ॥ रासे रास ग्रह नौ लागे । ग्रह चालमें परे अभागे ॥ गृह-मंदिलकी खबर न पाई । ग्रहन बीच बसे सब भाई ॥ जो देखे सो ग्रहको फंदा । ग्रिहि न देखो को अनंदा ॥ नहिं जानो ग्रह कहांति आया । मोहिं नहिं काहू ग्रह बताया ॥
समै-ग्रहन नाही पर सब जगत, परे गरहन केरा भाग । मैं नहिं जानो पंडित कवे, गरहन ऐहि लाग ॥ चंदा गरहन गरासिया, ऐसे गिरहित लोग । उग्रह होन न पावई, दिन २ बाढे रोग ॥
रमैनी ६—सुख तजके जग दुख बिसाहीं । आपहिं सुख आपहिं दुखलाहीं ॥ जहां जाय तहं औरहि रीती ॥ जगकी परी काल सो प्रीती ॥ पंडित मिले ग्रह दशा बतावैं । नावत भूत प्रेत सुनावैं ॥ ऋषि मुनि कर्म कहैं समगाई । वैद्य पित्त कफ बात
(५६०)
कबीरपंथी-
बताई ॥ देखव देवी देवत बानी ॥ वात न कछु उन कहिवत जानी ॥
समै-नारायन वैदा भया, रोगी नवा संसार ।
राम २ करि पचि सुआ, कीन्ह न अपन विचार ॥
रमैनी ७०-घर सब सोवे कोउ न जागा । रैन चोर घर सूसन लागा ॥ पंडित माते पढे पुराना । ज्ञानी माते कथ २ ज्ञाना ॥ जोगी माते कान फराई । संन्यासी माते जटा बंधाई ॥ जंगम माते घंट बजाया । सेवडा माते दया बताया ॥ अघोर माते मल सुत खाई । भगत माते तिलक लगाई ॥ बैरागी माते सब कछु नासी । जिंदा माते भये उदासी ॥ कामिन माती करी सिंगार । पुरुष माते पठ राम ककहार ॥
समै--मठ अकाश बैठत हैं जोगी, चोरवा मूसे भंडार । वह चोरवाको कोई न चीन्हे, चोरवा ठाढ हुवार ॥ चोरवाको हम चीन्हा, चोरवा हमे न चीन्ह । कहें कवीर वह चोर अपरबल, सबकी वसुधा लीन्ह ॥
रमैनी ७१--चेतन रहे न चोरवा पावे । अचेत पिंड को सदा सतावे ॥ चोरवा एक जुगतते मूसे । चेतन रहे अचेतन विनसे ॥ चोरवाकी बात न जाने कोई । चोर बिडारे सब घर खोई ॥ हम चोरवाको जाननहारे । हम चोरवाते रहें निनारे ॥ जो चोरवाका जाने भेवा । आपुहि करता आपुहि देवा ॥
समै--अछै पुरुषका बीज यह, वृच्छ न जाने कोय । ताते चोरवा मूस अब, कछु ओ कहे न होय ॥ आगे हमारे साथ था, अब भा जिवका काल । कह कवीर यह चोरवा चीन्हो, मिटे जीव जंजाल ॥
शब्दावली ।
(५६१)
रमैनी ७२--नैना है पर आंधर भाई । सरवण है पै सुना न जाई ॥ जोगी है पै जुगत विहूना । बस्ती है पै मंदिल सूना ॥ त्रिया है पै पुरुष न कोई । पुरुष है पै बांह न जोई ॥ पेट तो है पै अन्न न खाई । जीव तो नहीं पै जीवत भाई ॥
समै--पंडित भेद सुनावहु, नहिं तो छांडो गांव ।
मैं पूछो तोहि पंडिता, निराकार केहि ठांव ॥
रमैनी ७३--कहो पंडित हो मोहि ससुझाई । जात बरन कुल कहाँते आई ॥ कौन मते भाइ वहिन कहावे । कौन मते व्याहले आवे ॥ कौन मते सुद्रा ब्रह्मानी । कौन मते वैश्या क्षत्रानी ॥ पाँच तत्त्वका एके भेला । ता संग भयो जीवको भेला ॥ रक्त माँस हाडू इक गूदा । तिनमें कौन ब्राह्मण सुद्रा । वही नार वही पुरुष बियाई । बिंद चौराय सुपचकी लाई ॥ तब वह केहिकी भई नारी । को भय पूत कहु पंडित विचारो ॥
समै--पंच तत्त्व हम जानत, और न जानत कोइ ।
हमरा भेद जो पावे, तब वह अस्थिर होय ॥
समै--दो संयोग जग भीतरे, कंथ भाषिनि नेह । अष्ट धातका युगल तन, एक प्राण दो देह ॥ पठ पोथी भटका मारत, घटकी जानत नाहिं । कह कवीर जो घट लखे, तो फिर घटही माहिं ॥
रमैनी ७४--जोइ नरक सोइ सरग विचारा । जो पृथ्वी सोई पतारा ॥ जो है घट सोई ब्रह्मण्डा । सोई छिद्रम छांनबे पाखंडा ॥ जोइ पुरुष सोई भइ नारी । जोइ पिता सोइ महतारी ॥ जोई गुन अवगुन है सोई । जोई पाप पुन्य है सोई ॥ जोइ निराकार सोई अकारा । जो मारे सोइ पालनहारा ॥ जो खाये सोई ना खाई । राय जोई सोइ रंक कहाई ॥
(५६२)
कवीरपंथी—
समै--नरक सरग कोइ और है, करताके नहिं काम ।
सुन कहानी तोसों कहों, ऐसे कैसे राम ॥
रमैनी ७५--पहले माया फिर आमाया । तमते फिर सुभाव ठहराया ॥ सुभावते फिर भया अकासा । अकासते वायु कीन्ह प्रकासा ॥ वायु ते अगिन अगिन ते तूवा । तुवा ते पृथ्वी औषध हुआ ॥ औषद ते अन्न अन्न ते पुरखा । पंडित जानत और सब सुरखा ॥
समै--कहो पंडित कछु न हता, केहिंते भया अकार । कहें कवीर कैसे रचा, कहो प्रगट विचार ॥ पांच तत्त्व गुन तीन जो, जियरा तिहि संयोग । संजोगे सब कुछ भया, झूटे बोलत लोग ॥ पांचोका भेला पडा, प्रान वसे ता माहिं । कहें कवीर भेला छुटे, फिर यह जियरा नाहिं ॥
रमैनी ७६--अवस्था चार सुकति भई भाई । जाग्रित स्वप्न सुषोपति आई ॥ तुरिया भई तब ब्रह्म समाना । मेटा फिर उन आवन जाना ॥ सालोक साहूप औ भया साजुजा । सामीप भया तब जोत प्रदिजा ॥ ज्ञान प्रदीप जबे कछु होई । जोतमें जोत मिले तब कोई ॥ चार अवस्था पर जब आई । चार सुकति ले सुन्य समाई ॥
समै-सुन्यको होती सब कहो, जहां सुन्य तहां नाहिं ।
सुकत अवस्था कुछ नहीं, जिव पर संशय माहिं ॥
चार चौकडी संशय गई, संशय तऊ न छूट ।
कहें कवीर सोई ब्रह्मज्ञानी, क्या कहूं वैकुण्ठ ॥
रमैनी ७७--जीव सुकत निराधार कहाया । पसन मध्यमा बैखरी माया ॥ दोनों कीन है दोय शरीरा । ना माया पांच धरे कवीरा ॥ ऊपर सोवे वासना बासे । दोऊ शरीरका सोई बिनासे ॥
शब्दावली
(५६३)
पांच तत्त्वका जात है सोईं । नौ तत्त्वका जो राखे कोई ॥ तन छूटे तेहि माहिं समाईं । दोहरा नौतम कैसे पाईं ॥
समै-कुम्भ भरा जो फूटे, दूसरे में क्यों जाय ।
कहे कवीर सुनो ब्रह्मज्ञानी, कैसे अंत जीव समाय ॥
जीव न अंते जात है, जैसे घटको नीर ।
यह शरीर घट जीवको, समझाय कहें कवीर ॥
सो गुन कबहुं न बीसरे, जो गुन होत शरीर ।
मन भरमत चौरासी, कहहिं पुकार कवीर ॥
स्नेत कृष्ण जिय पीयरा, हर! लाल जिय जान ।
पांच तत्त्वके रंग रंगो, पांचोंको पहिचान ॥
रमैनी ७८-नेम घरम पूजा लपटाना । ज्ञान कथा अस्थान न जाना ॥ अस्थान भङ्ग देखे सब कोई । अस्थान लखे विन थित न होईं ॥ रिषि औ मुनि अस्थान न भाषे । प्रेम धाम अस्थान सो राखे ॥ कथा कवित्त बहुत कुछ गाया । करताका अस्थान न पाया ॥
समै-पांच तत्त्व अस्थान निज, इन्हि विहूना नाहिं ।
कहें कवीर बूझो ब्रह्मज्ञानी, जनि पर संशय माहिं ॥
रमैनी ७९-तीरथ व्रत रहा लौ लाई । देव दिवाले देव मनाई ॥ पितरके नाम सराध करावे । आपहिं नरक सरग ले जावे ॥ बिनती करके देये मयारू । अबकी बार प्रभु मोहि त्यारू ॥ कहे गुरु मोहिं पार लगाई । ताते गुरुवा मंत्र लियो भाई ॥ गुरु मंत्र लीना जिव जानी । गुरु शिष्यकी न त्रिषा बुझानी ॥ घर २ होय निरगुनकी सेवा । निरगुन मंत्र दियो गुरुदेवा ॥
समै-सिक्ख समाना गुरुहमें, निजके लागा नेह । बिलगाये बिलगे नहीं, एक परान दो देह ॥
(५६४)
कवीरपंथी-
रमैनी ८०-षट् दरशन सुनु बात हमारी । आपन आपन मत कीन निनारी ॥ हरि ब्रह्माते कछु न भेवा । भिन्न भिन्न करु काकी सेवा ॥ सब पंडित मिल रहो बिचारी । हरि ब्रह्मा किनके त्रिपुरारी ॥ पिताका कोई खोज न पावे । बिन करता निरगुन बतलावे ॥ पिता नाल का दुर मन आना । भिन्न भिन्न करि भिन्न समाना ॥
समै-प्राण तत्त्वको दुख नहीं, अस्थानेका दोष । कहैं कवीर समझ जिय अपने, दूसरका नहीं भरोस ॥ सिंह चले हर माही, सीगट बोवे धान । कहैं कवीर यह बड़ा अचंभा, छागल भयल किसान ।
रमैनी ८१-प्राण अपान व्यान उदाना । पांच वायु यह सहत समाना ॥ श्रवणनेत्र औ रुधिर तुचाया । सर्व अंगका होम कराया ॥ विजिया होम अपनका कीन्हा । परव्रित छोड निरव्रित लीन्हा ॥ निरव्रित भया ब्रह्म लोके जाई । बहुर परव्रिति न कबहूँ आई ॥ अपनासे निरगुन ठहरावे । सो ज्ञानी ब्रह्मलो कहि जावे ॥
समै-निरगुन ठहरा सुन्यमें, आपा डारा खोय । कहो ज्ञानी तोसो कहों, सो भिट कैसे होय ॥ ज्ञानी बूझो आपको, अस्थान बूझले थीत । कहैं कवीर नैनन दिये, ताकी करो प्रतीत ॥
रमैनी ८२-सेवत सुन्य दुख सूना होई । ज्ञानस्वरूपी सिद्धिमें जोई ॥ मान अपमान न वाके भाई । पारब्रह्ममें रहा समाई ॥ वाको मुक्तिकी नाही संसा । वह तो सुन्य नगरके हंसा ॥ ज्ञान विज्ञान त्रिपित वह भयऊ । इंद्रिन जीत पार होय गयऊ ॥ सब इंद्रिनको वह बस लाया । आपा खोय निरगुन ठहराया ॥ भौसा-गर सो उतरा पारा । फिर न आया यहि संसारा ॥
समै-जो चेतन तेहि सब कछु व्यापे, जड़को व्याप न होय ॥
कहैं कवीर बातें यह झूठी, माने वचन न कोय ॥
शब्दावली
(५६५)
रमैनी ८३-चलो जांय बसें वही गाऊं । सुन्य शिखर है वाको नाऊं॥ पाप न पुन्य दिवस न राती । सुख न दुख न जात न पाती ॥ सुनी ऋषीसुर नहिं देवा । स्वामी सेवक नाहीं सेवा ॥ गुन नहिं कर्म वृच्छ नहिं बेल। तुरुक न हिन्दू गुरु न चेला ॥ भूख न प्यास पीवे न पानी । राव न रंक नहीं रजधानी ॥ बेद न भेद भवन न कोई । अनेक न भेष पुरुष न जोई ॥ माया मोह न छे मद कोई । निराकार निरगुन है सोई ॥ तहां जाय कीने बिसरामा । चलो विगत जे भर्म मुकामा ॥
समै-निराकार निरगुन है करता, बाके रूप न रेख । तुम कैसे वही मिलिहौ, समझावो करी विवेक ॥ रूप न रेखा निरगुन है साहेब, जब नाहीं वहि देश । वहिके वरण तुमहू होइ जेहौ, बहुरि न मिले संदेश ॥ वहां न जावो रहो यहि देसवा, मानो कहा हमार । कहैं कवीर वह झूट संदेसवा, यह सुखका दरबार ॥
रमैनी ८४-ब्रह्मपुरी एक ब्रह्म बनाई । प्रेम वियोग तहां नहिं भाई ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । वेद विरंचि करें तेहि सेवा ॥ सनकादिक औ जनक विदेही । और लच्छमी और ब्रह्मा सनेही ॥ द्वादस भक्ता सिद्ध चौरासी । नौ नाथ ऋषि सहस अठासी ॥ गण गंधर्व औ किन्नर भाई । जच्छ देव मिल केल कराई ॥ चलो जांय बसें वहि देसा ॥ भौसागरका न मिले संदेसा ॥
समै-पंडित मोही ले चलो, जौन देश वह लोग । दूँदत मोहि भये जुग चारी, मिटा न परम वियोग ॥ सबहीं गये ये हमरे, अविनासीके गाम । कह कवीर करता तुम बूझो, लेव न वाको नाम ॥ एक समय हम गये वहि देसवा, वहां मिला ना कोय । बूझ अस्थान गहो जो ज्ञानी, उपज बिनस नहिं होय ॥
रमैनी ८५-सुन्य नगर चल देखो आई । जेहि कौतुक मन रहा ठहराई ॥ कोट चन्द्रका उदे तहैं होई । कोट भान तहैं तपते सोई ॥ कोट ब्रह्मा तहैं पढते वेदा । कोट विष्णु तहैं कहेते भेदा ॥ कोट संकर तहैं करते सेवा । कर जोरे तैंतीसो देवा ॥ कोट भवानी ठाढी द्वारा । कोट धरमराय करत विचारा ॥ कोट राम तहैं ठाढे रहहीं ॥ कोट कृष्ण कथा तहैं कहहीं ॥ कोटिन अनहद बाजे बाजा । पार ब्रह्म तह करे सु राजा ॥
समै-चल ज्ञाती मैं चलिहो, यह कोतक जेहि देस । मेरे जिय एक अचंभा, पार ब्रह्म केहि भेस ॥
रमैनी ८६-मारकंडे मेरे न भाई । धरती अकास दुनी सब जाई ॥ होय अलोप जावे रवि चंदा । अच्छै वृच्छ पर बाल- मुकन्दा ॥ दस आंगुल पुरुष होय जोई । तीन लोक जेहि जाय समोई ॥ विस्नु सोवैं जगें भवानी । नाभि तैं ब्रह्मा सुनो ब्रह्म- ज्ञानी ॥ मुखने ब्राह्मण भुजा ते छत्री । उदरते वैश्य पगते सुद्री ॥ चार ऊपर चौंसठ फिर जाती । सगरी सृष्टि भई यह भांती ॥
समै-मैं तोहि पूछों पंडित, तुमहू थे वहि पास । जो यह विधि समझावत, कह कछु वेद औ व्यास ॥ अस पंडित कथ भाषत हम, नाही जानत भेद । ब्रह्मा कही ताते हम जानी, सबहि बतावत वेद ॥ वेद ब्रह्मा कहा भवानी, ब्रह्मा कीन्हा ग्रंथ । कहैं कवीर करता नहीं, भाषो मायाका यह पंथ ॥
रमैनी ८७-दो पच्छ सृष्टि २ की खानी । दोनों पच्छ बूझो ब्रह्मज्ञानी ॥ एक मास दो पच्छ है भाई ॥ पाप पुन्य दो रहे ठहराई ॥ पिता पुत्र गुरु औ चेला । स्त्री पुरुष वृच्छ औ बेला ॥ दिन औ रात सूर चंदा । गगन औ धरनि स्वामी औबंदा ॥
शब्दावली
(५६७)
समै-एक पच्छ अस्थान भंग है, एक लीन्है अस्थान । कहैं कवीर सुनो ब्रह्मज्ञानी, सो अस्थाने जान ॥
रमैनी ८८-सुन्य नगर जाको वार न पारा । इक्कीस सरग ब्रह्मंड अपारा ॥ बचन मोर तुम सुलु तिर देवा । आद पुरातम- को यह भेवा ॥ रंकार धुन निरगुन होई । जोग रस कर देखे कोई ॥ वाहीकी हम हैं बहुत पियारी । तुम्हरे कारन भई निनारी ॥ तुम ना जानो पिताका भेवा । पिता का समझो तुम त्रिय देवा । यह भौसागर महा विकरारा ॥ समझ पुत्र तुम होहु निनारा ॥ ध्यान धरो तुम तीनों भाई । सुन्य नगर तुम रहो समाई ॥
समै-वहां नहीं पिता तुम्हारो, हम हैं पिता तुम्हार । वेनारी हम उनके पुरुष, बिच राखा निरंकार । माता कहा सोई हम मानत, तुम्हरी झूठी बात । प्रथमे माय हमारी सेवा, जाका यह विस्तार ॥
रमैनी ८९-निरगुन पुरुष पुजावे देवा । आवो माता करें हम सेवा ॥ माता कहो हमे समझाई । कौन पुरुष ते ध्यान लगाई ॥ जो तुम कहो सोई हम जानी । और का कहा न कबहुँ मानी ॥ लौट माता पुत्रन समझावे । निराकार निरगुन बतलावे ॥ हमें मेट ठहरावे देवा । आदि कथाका कहैं न भेवा ॥
समै-हमे दुराय ठहरावे धोखा, ऐसी त्रिया अनखान । कहैं कवीर मानों त्रिदेवा, माताकी पहिचान ॥
रमैनी ९०-हम बूझें ब्रह्मा ते कहानी । कहो का कहा आन भवानी ॥ लौट ब्रह्मा निज कहैं कहानी । माता बचन निरगुन हम जानी ॥ नीरी कोइ न वह सनेहा । पांच तत्त्वकी धरे न देहा ॥ निहतत्त्व निरगुण निराकारा । निहकामी बहे वार न पारा ॥ बरन न मेख न पीवे न खाई । कर्म रहा सब जग ठहराई ॥ वह निहकर्म त्रिगुन ते न्यारा । गगन मंडल हम देखत अपारा ॥
(५६८)
कबीरपंथी-
समै-निहततसे कैसे तत्त्व भया, निरगुनते गुणवंत । निहकर्म ते कैसे कर्म भया, कहो समझ व्रितंत ॥ रूप रेख वाके कछु नहीं, कैसे आवे ध्यान । कहैं कवीर अबहुँ क्यों न चेतो, कहा हमारा मान ॥
रमैनी ९१-नागद सुनि यह कथा सुनाई । एक समय बैकुंठ गया भाई ॥ गदा चक्र पीताम्बर काछे । लच्छमी ठाढी विस्तुके पाछे ॥ तब हम बचन कहे दोय चारी । लौट विस्तु कछु कहा बिचारी ॥ काठ पषाण न तिरथ देवाले । अगिन पवनके नाहिं बिचाले ॥ भगत भागवत साधु अस्थाना । तहाँ बसत मैं सत यह ज्ञाना ॥ त्रिभुवन नाथ है त्रिभुवन स्वामी । घट २ रहे निरंतर यामी ॥
समै-कौनकी भक्ति करो तुम भाई, को बैकुंठ कहाँ बस सोय । कहैं कवीर झूठ क्यों भाषा, झूठा सब ना होय ॥ तहिया हरि नित मिलत थे, अब क्यों रहे छिपाय । अब कोई क्यों बा जावे, ना वह कहे बुझाय ॥
रमैनी ९२-ब्रह्मलोक शिवलोक अपारा । विष्णुलोक बैकुंठ द्वारा ॥ स्वर्गलोक गौलोक है भाई । इंद्रलोक चंद्रलोक कहाई ॥ यक्षलोक देवलोक बताया । महरलोक यमलोक दिखाया ॥ अंतरिच्छे एक लोक ब्रह्मंडा । छ दर्शन छयानवे पखंडा ॥ जेहि २ लोककी आसा लाई । तीन लोक लोग बहे जाई ॥ निरगुण झर कोई लख पावे । सुन्यलोक सोइ जाय समावे ॥
समै-चार जुग जात हम देखा, काहु न कहा संदेश । जैसे देश सुन्य हम जानत, जो वह ऐसा देश ॥ बात न कहत २ जिव दीन्ही, लोका लोक न चीन्ह । कहैं कवीर बिना वह देखे, आपन जीव जग दीन्ह ॥
शब्दावली
(५६९)
लोकालोक अकाश नहिं, झूठे लोका लोक । कहैं कवीर आस जिन बांधो, छांडो जीका सोक ॥
रमैनी ९३-सुन पंडित तैं बचन हमारा । करता सबका सिर- जन हारा ॥ कंथ भामिनी कंथ सनेहा । पिताको रूप पिताको देहा ॥ माताको रुधिर पिताको नीरू । दो संयोग मिल धरो शरीरू ॥ पांच तत्त्व गुन तिनके संग। अष्टधात के जिव रंग रंगा ॥ माटी ते उपज अबहुं किन होई । कारण कौन पुरुष संग जोई ॥ मनसा शब्दका होय अकारा । तजो कंथ भामिनि व्योहारा ॥
समै-ब्रह्म कुलाल हर जग मट्टी, रुधिर करे सिंगार ।
मानसिक रचना जग रचा, पंडित कहो विचार ॥
प्रथम उत्पत्त मानसी, फिर भय पुरुष औ जोय ।
कहे कवीर सृष्टिक सबकी, विरला बूझे कोय ॥
तेहि नारी घर मबके, चार बरण जग कीन ।
तेरह ते तेरह भई खानी, वेद साख अस दीन ॥
रमैनी ९४-कर्म बस ब्रह्मा पिंड संवारा । करम बस विस्तू पाले संसारा ॥ कर्म बस रुद्र करे संहारा । कर्म बस विष्णु लेंय औतारा ॥ कर्म बस चंद्र सूर्य भरमाना । कर्म बस नारद भोग अस्थाना ॥ कर्म बस रावण औ गये कंसा । कर्म बस रुधर भये निरवंसा ॥ कर्म बस मरा सकल संसारा । करता करम करम बिस्तारा ॥
समै-करता ते कर्म निहकर्म ते कर्ता, झूठा कर्म सनेह ।
कहैं कवीर जैसा पड़ा मेला, तैसा जगत करेह ॥
रमैनी ९५-ब्रह्म पाडी सबकी बांटा । सबे लगे अस औघट घाटा ॥ पांच देवका थापना कीन्हा । चारों वेद मंत्र लिख दीन्हा ॥ देव पांचकी कीन्हा सेवा । तैतिस कोट और किय देवा ॥ तिनहुं
(५७०)
कबीरपंथी—
कीन्ह सेवा बहु भाई । अगम अगोचर रहा समाई ॥ कोई ब्रह्म रहा लौ लाई । कोई सुन्यमें रहा समाई ॥ कोई बैठ आसन मारी । कोई ध्यान धर लाया तारी ॥ कोई सक्ति ठहरावत माया । कोई सूरज ते ध्यान लगाया ॥ और जो तैंतीसो कौरी । सब जग सेवा करे कर जोरी ॥
समै-बिब अक्षर माया जन भाषो, ताते रचो सतंत । चार वेद षट् दससन, बुध बल नित निचंत ॥ अंथ रचा गुण कर्म लगाया, नरक सरग विस्तार । कहैं कवीर करता नहिं चीन्हो, ये उरले व्योहार ॥
रमैनी ९६-गनपत विष्णु महेश्वर देवा । सूर्य भवानी तिनकी सेवा ॥ कर स्नान पवित्र होय आया । चौका करि आसन विछाया ॥ चंदन गार तिलक कियो छापा । देव नहवाय करन लग जापा ॥ चंदन घस नैवेद चढ़ाई । पुष्प सुगंध अर्पन कियो भाई ॥ अगम अगोचर ध्यान लगाया । कर आवाहन सर्गते बोलाया ॥ दो कर जोरके विनती कराई । कीन सुमरण जन दीन पठाई ॥
समै-देव न देखा सेवको, सेवक देव न दीख । कहैं कवीर मरे ते देखो, यही गुरु दइ सीख ॥ तेरी गति तैं जाने देवा, हममें सामरथ नाहिं । कहैं कवीर यह भूल सबनकी, सब पर संशय माहिं ॥
रमैनी ९७-ज्ञान गूदरी गुरु विछाई । हरी आसन पर बैठे आई ॥ तिलक छाप कंठी औ माला । बैठे आप धर रूप गोपाला ॥ मूढ़ मुड़ाय मुडियनमें आया । भगत कहाय महंत कहाया ॥ मूढ़ मुड़ाय गुरु होय खेला । नर नारी सब कीन्हे चेला ॥ मूढ़ मुड़ाय महंत कहाया । प्रन उपान उपदेश कराया ॥ चोला पहरा सेल्ही डारी । टोपी देके पाग उतारी ॥
शब्दावली
(५७१)
समै-जेई पान पनवारिया, तेई तम्बोली हाट । तेई पान गुरुवा दीन्हा, लायसि औघट घाट ॥ औघट घाटी नर गया, गुरुवाके उपदेश । कहै कवीर कोउ नाही लावे, उनका बहुर संदेश ॥
रमैनी ९८-षट् दर्शन मिल देखे संदेशा । कोइ न रूप करताके भेसा ॥ हता अकेलकी हता वहि नारी । अकाश हताकी हता संसारी ॥ गृहस्थ हताकी हता वैरागी । गुनवंत हताकी हता गुन त्यागी ॥ सुखी हताकी हता दुखि भाई । देह धरेका विदेह कहाई ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । संयोग वियोग कहो यह भेवा ॥
समै-निरगुन पुरुष निरंतर देवा, निराकार है सेव । यहि बानमें वह नाही, बिरला बूझे भेव ॥ पांच तत्त्व गुन तीन धरि, सब गुन धरे शरीर । प्रत्यक्ष जगतमें देत दिखावा, कहहि पुकार कवीर ॥
रमैनी ९९-जप तप पूजा मंत्र बताया । सुन्य मण्डलमें मन ठहराया ॥ पूजा करत करत गये हारी । जोग जुगति ले आसन मारी ॥ संध्या तर्पण आरति गावें । देव न रीझे देव मनावें ॥ जो धंधा नित मन बस भाई । स्वप्ने सूझे धंधा आई ॥ जेहि धंधामें जीव लगाया । अंतकाल तेहि धंध समाया ॥
समै-जप तप दीखा थोथरा, तीरथ बरत बिस्वास । सुवना सेम्हर सेइके, उड़ फिर चला निरास ॥ सुवना सेम्हर सेइके, बैठा पलासे जाय । चौंच टकोरे सिर धुने, वो उसही का भाय ॥
रमैनी १००-पांच तत्त्व नहीं त्रिगुन देवा । चंद्र न सूर वेद न भेवा ॥ पाप न पुण्य पुरुष न जोई । अस्थान भंग जोहै कर्ता न
(५७२)
कबीरपंथी—
कोई ॥ तेहि घर कर्ताको ठहराया । जो नाहीं कछु तासों लौ लाया ॥ अगम अगोचर सिरजन हारा । रूप न रेखा वार न पारा ॥
समै-सुमरन सुरतिकी गम नहीं, बहुत विकट वह पंथ ।
सुरति निरति तहवाँ नहि पहुँचे, अस कथि भाषत ग्रंथ ॥
रमैनी १०१-षट् दरशन सुनो बात हमारी । छिनमें पुरुष वह छिनमें नारी ॥ छिनमें तरुन छिनमें बाला । छिनहि दयाल छिनहि होय काला ॥ छिन सुच्छम छिन होय अस्थूला । यह गुण देख जगत सब भूला ॥ चंचल चपलकी खबर न पाई । यह वह रूप ठग जग आई । यहीके छंद भूला सब कोई ॥ गति नहि पाई पुरुष औ जोई ।
समै-मनहरवा नगरवा, घट घट रहा समोई ।
यह तो काम नाही करताकै, बिरला बूझे कोई ॥
जो बूझे सो थीर है, बिन बूझे भरमाय ।
कह कवीर एक बूझे बिन, चले रंक औ राय ॥
रमैनी १०२-जगत पुजेरी बिस्तु सो देवा । सब कोइ करे बिस्तुकी सेवा ॥ प्रथम बिरंच सेव चितलाई । फेर रुद्र ध्यान लगाई ॥ सनक सनंदन नारद सेसा । सुखदेव नारद व्यास गनेसा ॥ दन्त्रात्रय जनक विदेही । पारासर आदिक विस्तु सनेही ॥ इनहि देख सब जग भरमाना । करता आपन नाही जाना ॥
समै-षट् दरशन तहवाँ चले, जहाँ न ससि औ भान ।
प्रेमधाम वैकुंठ बिस्तु को, कथत ज्ञान विज्ञान ॥
चलते चलते धाम गा, वहाँ ते फिरा निरास ।
कहे कवीर बिस्तु ना मिला, सेवा करत निरास ॥
रमैनी १०३-सेवा करत गये जुग चारी । सेवा करत गये नरनारी ॥ सेवा करत गये तिर देवा । सेवा कीन्ह लखा नहि
शब्दावली
(५७३)
भेवा ॥ सेवा करत गये औतारा । सेवा करत गये संसारा ॥ षट् दृशन सेवा चितलाई । सेवा का कछु भेद न पाई ॥ सेवा पूजा रहा लौलाई । सेवा लेके सुन्न समाई ॥
समै-स्वामी ते दृशन नाहीं, सेवक सेवा लाग ।
कहे कवीर पृथिवि यह मरगई, हरि ही के बैराग ॥
जीवत मिलना नहिं होय ज्ञानी, मरे न होय सनेह ।
कहे कवीर मिले हरि भाई, जो ना होय बिदेह ॥
रमैनी १०४-छूँछा भरा भरा ढरकाना । आपहि में जग आप हिराना ॥ सात सरग पर सुन्य एक पोरी । तहां बसे छतिसो कोरी ॥ सुन्य नगर जहँ बसे न कोई । बसन चले तहँ पुरुष औ जोई ॥ ऊजर बसि भई वस्ति उजारी । वस्ती छोड चले नरनारी ॥ सुर औ नर मुनि बसे सब कोई । उजर बसेकी खबर न होई ॥ सुन्यकी धुन सुन जगत समाना । क्या पंडित क्या चतुर सयाना ॥
समै-जहां न वस्ती सो बसा, बस्ती भई उजार ।
सुर नर मुनि सब गये विगूचे, कहें कवीर पुकार ॥
सहर बसंता छोडके, उजर बसाया गांव ।
ना वह बस ना ऊजरा, भया बसेका नांव ॥
रमैनी १०५-सुतके घर माता पटरानी । तुम किन बूझो पंडित ज्ञानी ॥ बिन पुरुष उन तिरगुण जाये । होय जोइ तीनों सुत खाये ॥ यह संसार जीते औ हारे । इन पापिन सब जगहिं संहारे ॥ तिरगुन गये जात नहिं जाने । राजा रंक सब गये सयाने ॥ जोगी जपी तपी संन्यासी । सुंडित चुंडित बैराग उदासी ॥ सुन्य नगरकी राखे आसा । रंकार धुन कीन विनासा ॥
समै-अगनी पानी खाइया, अंतर पटको पाय ।
यों जगको माताने खाया, जियरा गया हेराय ॥
(५७४)
कवीरपंथी-
अगिन बुझानी बुझ गई, दूध बिनासा घीव ।
कहैं कवीर इन आस ने, ऐसा बिनासा जीव ॥
रमैनी १०६-पुरुष आदिकी नारी माया । तिन नारी पुरुष दोय जाया ॥ एक बसा जहां बसे न कोई । एक दुनियामें सब कहुं होई ॥ और तीन गुण जन्मे भाई । उन फिर चार बरन उपजाई ॥ उन फिर जंत्र मंत्र किया पूजा । जोत निरंजन और न दूजा ॥ उन फिर नाटक चेटक कीन्हा । निरगुन मंत्र पाठ लिख दीन्हा ॥ उन फिर जप औ तप अनुसारा । नेम धर्म तीरथ व्रत न्यारा ॥ सब संसार परा इन माहीं । करता पुरुष लखो है नाहीं ॥
समै-कहा हमार न माने कोई, उनको कहो परवान ।
ये जिव चल धोखे मिला, मिट गया जीव निदान ॥
रमैनी १०७-हम करता हम सबके सही । चार युग हम सत्ते कही ॥ कोई न माने कहा हमारा । मैं जगते कहि कहि हारा ॥ जो कछु माया दिया उपदेसा । सोई उपनिषद दिया संदेसा ॥ जो कछु वेद पाठ लिखवाया । सब जीवन तासो लौ लाया ॥ एक होय तो कहि समझाऊं । सकल रिषि ते कहा कराऊं ॥ जो नाहीं तासो लौ लाया । जौ है ताको सबै मिटाया ॥
समै-जहां पवन नहि संचरे, रवि ससि उदय न होय ।
कहैं कवीर जहां हरि नहीं, तहां जात सब कोय ॥
रमैनी १०८-नगर एक बसैं दोय नारी । सब जीवन डहका-वनहारी ॥ इनते हारे तपी मुनि देवा । इनका कोई लखा न भेवा ॥ इन लीना जीवनको खाई । इनको जीते बिरला भाई ॥ गण गंधर्व मुनि बचा न कोई । इनको जाने ज्ञानी सोई ॥
समै-बीच ते आई दोय नारी, बीचे कीन अकाज ।
कहैं कवीर दोनों जग लूटा, यह करताको साज ॥