कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 586, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(५७२)
कबीरपंथी—
कोई ॥ तेहि घर कर्ताको ठहराया । जो नाहीं कछु तासों लौ लाया ॥ अगम अगोचर सिरजन हारा । रूप न रेखा वार न पारा ॥
समै-सुमरन सुरतिकी गम नहीं, बहुत विकट वह पंथ ।
सुरति निरति तहवाँ नहि पहुँचे, अस कथि भाषत ग्रंथ ॥
रमैनी १०१-षट् दरशन सुनो बात हमारी । छिनमें पुरुष वह छिनमें नारी ॥ छिनमें तरुन छिनमें बाला । छिनहि दयाल छिनहि होय काला ॥ छिन सुच्छम छिन होय अस्थूला । यह गुण देख जगत सब भूला ॥ चंचल चपलकी खबर न पाई । यह वह रूप ठग जग आई । यहीके छंद भूला सब कोई ॥ गति नहि पाई पुरुष औ जोई ।
समै-मनहरवा नगरवा, घट घट रहा समोई ।
यह तो काम नाही करताकै, बिरला बूझे कोई ॥
जो बूझे सो थीर है, बिन बूझे भरमाय ।
कह कवीर एक बूझे बिन, चले रंक औ राय ॥
रमैनी १०२-जगत पुजेरी बिस्तु सो देवा । सब कोइ करे बिस्तुकी सेवा ॥ प्रथम बिरंच सेव चितलाई । फेर रुद्र ध्यान लगाई ॥ सनक सनंदन नारद सेसा । सुखदेव नारद व्यास गनेसा ॥ दन्त्रात्रय जनक विदेही । पारासर आदिक विस्तु सनेही ॥ इनहि देख सब जग भरमाना । करता आपन नाही जाना ॥
समै-षट् दरशन तहवाँ चले, जहाँ न ससि औ भान ।
प्रेमधाम वैकुंठ बिस्तु को, कथत ज्ञान विज्ञान ॥
चलते चलते धाम गा, वहाँ ते फिरा निरास ।
कहे कवीर बिस्तु ना मिला, सेवा करत निरास ॥
रमैनी १०३-सेवा करत गये जुग चारी । सेवा करत गये नरनारी ॥ सेवा करत गये तिर देवा । सेवा कीन्ह लखा नहि