कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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समै-जेई पान पनवारिया, तेई तम्बोली हाट । तेई पान गुरुवा दीन्हा, लायसि औघट घाट ॥ औघट घाटी नर गया, गुरुवाके उपदेश । कहै कवीर कोउ नाही लावे, उनका बहुर संदेश ॥
रमैनी ९८-षट् दर्शन मिल देखे संदेशा । कोइ न रूप करताके भेसा ॥ हता अकेलकी हता वहि नारी । अकाश हताकी हता संसारी ॥ गृहस्थ हताकी हता वैरागी । गुनवंत हताकी हता गुन त्यागी ॥ सुखी हताकी हता दुखि भाई । देह धरेका विदेह कहाई ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । संयोग वियोग कहो यह भेवा ॥
समै-निरगुन पुरुष निरंतर देवा, निराकार है सेव । यहि बानमें वह नाही, बिरला बूझे भेव ॥ पांच तत्त्व गुन तीन धरि, सब गुन धरे शरीर । प्रत्यक्ष जगतमें देत दिखावा, कहहि पुकार कवीर ॥
रमैनी ९९-जप तप पूजा मंत्र बताया । सुन्य मण्डलमें मन ठहराया ॥ पूजा करत करत गये हारी । जोग जुगति ले आसन मारी ॥ संध्या तर्पण आरति गावें । देव न रीझे देव मनावें ॥ जो धंधा नित मन बस भाई । स्वप्ने सूझे धंधा आई ॥ जेहि धंधामें जीव लगाया । अंतकाल तेहि धंध समाया ॥
समै-जप तप दीखा थोथरा, तीरथ बरत बिस्वास । सुवना सेम्हर सेइके, उड़ फिर चला निरास ॥ सुवना सेम्हर सेइके, बैठा पलासे जाय । चौंच टकोरे सिर धुने, वो उसही का भाय ॥
रमैनी १००-पांच तत्त्व नहीं त्रिगुन देवा । चंद्र न सूर वेद न भेवा ॥ पाप न पुण्य पुरुष न जोई । अस्थान भंग जोहै कर्ता न