भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी—

कीन्ह सेवा बहु भाई । अगम अगोचर रहा समाई ॥ कोई ब्रह्म रहा लौ लाई । कोई सुन्यमें रहा समाई ॥ कोई बैठ आसन मारी । कोई ध्यान धर लाया तारी ॥ कोई सक्ति ठहरावत माया । कोई सूरज ते ध्यान लगाया ॥ और जो तैंतीसो कौरी । सब जग सेवा करे कर जोरी ॥

समै-बिब अक्षर माया जन भाषो, ताते रचो सतंत । चार वेद षट् दससन, बुध बल नित निचंत ॥ अंथ रचा गुण कर्म लगाया, नरक सरग विस्तार । कहैं कवीर करता नहिं चीन्हो, ये उरले व्योहार ॥

रमैनी ९६-गनपत विष्णु महेश्वर देवा । सूर्य भवानी तिनकी सेवा ॥ कर स्नान पवित्र होय आया । चौका करि आसन विछाया ॥ चंदन गार तिलक कियो छापा । देव नहवाय करन लग जापा ॥ चंदन घस नैवेद चढ़ाई । पुष्प सुगंध अर्पन कियो भाई ॥ अगम अगोचर ध्यान लगाया । कर आवाहन सर्गते बोलाया ॥ दो कर जोरके विनती कराई । कीन सुमरण जन दीन पठाई ॥

समै-देव न देखा सेवको, सेवक देव न दीख । कहैं कवीर मरे ते देखो, यही गुरु दइ सीख ॥ तेरी गति तैं जाने देवा, हममें सामरथ नाहिं । कहैं कवीर यह भूल सबनकी, सब पर संशय माहिं ॥

रमैनी ९७-ज्ञान गूदरी गुरु विछाई । हरी आसन पर बैठे आई ॥ तिलक छाप कंठी औ माला । बैठे आप धर रूप गोपाला ॥ मूढ़ मुड़ाय मुडियनमें आया । भगत कहाय महंत कहाया ॥ मूढ़ मुड़ाय गुरु होय खेला । नर नारी सब कीन्हे चेला ॥ मूढ़ मुड़ाय महंत कहाया । प्रन उपान उपदेश कराया ॥ चोला पहरा सेल्ही डारी । टोपी देके पाग उतारी ॥