कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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लोकालोक अकाश नहिं, झूठे लोका लोक । कहैं कवीर आस जिन बांधो, छांडो जीका सोक ॥
रमैनी ९३-सुन पंडित तैं बचन हमारा । करता सबका सिर- जन हारा ॥ कंथ भामिनी कंथ सनेहा । पिताको रूप पिताको देहा ॥ माताको रुधिर पिताको नीरू । दो संयोग मिल धरो शरीरू ॥ पांच तत्त्व गुन तिनके संग। अष्टधात के जिव रंग रंगा ॥ माटी ते उपज अबहुं किन होई । कारण कौन पुरुष संग जोई ॥ मनसा शब्दका होय अकारा । तजो कंथ भामिनि व्योहारा ॥
समै-ब्रह्म कुलाल हर जग मट्टी, रुधिर करे सिंगार ।
मानसिक रचना जग रचा, पंडित कहो विचार ॥
प्रथम उत्पत्त मानसी, फिर भय पुरुष औ जोय ।
कहे कवीर सृष्टिक सबकी, विरला बूझे कोय ॥
तेहि नारी घर मबके, चार बरण जग कीन ।
तेरह ते तेरह भई खानी, वेद साख अस दीन ॥
रमैनी ९४-कर्म बस ब्रह्मा पिंड संवारा । करम बस विस्तू पाले संसारा ॥ कर्म बस रुद्र करे संहारा । कर्म बस विष्णु लेंय औतारा ॥ कर्म बस चंद्र सूर्य भरमाना । कर्म बस नारद भोग अस्थाना ॥ कर्म बस रावण औ गये कंसा । कर्म बस रुधर भये निरवंसा ॥ कर्म बस मरा सकल संसारा । करता करम करम बिस्तारा ॥
समै-करता ते कर्म निहकर्म ते कर्ता, झूठा कर्म सनेह ।
कहैं कवीर जैसा पड़ा मेला, तैसा जगत करेह ॥
रमैनी ९५-ब्रह्म पाडी सबकी बांटा । सबे लगे अस औघट घाटा ॥ पांच देवका थापना कीन्हा । चारों वेद मंत्र लिख दीन्हा ॥ देव पांचकी कीन्हा सेवा । तैतिस कोट और किय देवा ॥ तिनहुं