भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी-

समै-निहततसे कैसे तत्त्व भया, निरगुनते गुणवंत । निहकर्म ते कैसे कर्म भया, कहो समझ व्रितंत ॥ रूप रेख वाके कछु नहीं, कैसे आवे ध्यान । कहैं कवीर अबहुँ क्यों न चेतो, कहा हमारा मान ॥

रमैनी ९१-नागद सुनि यह कथा सुनाई । एक समय बैकुंठ गया भाई ॥ गदा चक्र पीताम्बर काछे । लच्छमी ठाढी विस्तुके पाछे ॥ तब हम बचन कहे दोय चारी । लौट विस्तु कछु कहा बिचारी ॥ काठ पषाण न तिरथ देवाले । अगिन पवनके नाहिं बिचाले ॥ भगत भागवत साधु अस्थाना । तहाँ बसत मैं सत यह ज्ञाना ॥ त्रिभुवन नाथ है त्रिभुवन स्वामी । घट २ रहे निरंतर यामी ॥

समै-कौनकी भक्ति करो तुम भाई, को बैकुंठ कहाँ बस सोय । कहैं कवीर झूठ क्यों भाषा, झूठा सब ना होय ॥ तहिया हरि नित मिलत थे, अब क्यों रहे छिपाय । अब कोई क्यों बा जावे, ना वह कहे बुझाय ॥

रमैनी ९२-ब्रह्मलोक शिवलोक अपारा । विष्णुलोक बैकुंठ द्वारा ॥ स्वर्गलोक गौलोक है भाई । इंद्रलोक चंद्रलोक कहाई ॥ यक्षलोक देवलोक बताया । महरलोक यमलोक दिखाया ॥ अंतरिच्छे एक लोक ब्रह्मंडा । छ दर्शन छयानवे पखंडा ॥ जेहि २ लोककी आसा लाई । तीन लोक लोग बहे जाई ॥ निरगुण झर कोई लख पावे । सुन्यलोक सोइ जाय समावे ॥

समै-चार जुग जात हम देखा, काहु न कहा संदेश । जैसे देश सुन्य हम जानत, जो वह ऐसा देश ॥ बात न कहत २ जिव दीन्ही, लोका लोक न चीन्ह । कहैं कवीर बिना वह देखे, आपन जीव जग दीन्ह ॥