कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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समै-एक पच्छ अस्थान भंग है, एक लीन्है अस्थान । कहैं कवीर सुनो ब्रह्मज्ञानी, सो अस्थाने जान ॥
रमैनी ८८-सुन्य नगर जाको वार न पारा । इक्कीस सरग ब्रह्मंड अपारा ॥ बचन मोर तुम सुलु तिर देवा । आद पुरातम- को यह भेवा ॥ रंकार धुन निरगुन होई । जोग रस कर देखे कोई ॥ वाहीकी हम हैं बहुत पियारी । तुम्हरे कारन भई निनारी ॥ तुम ना जानो पिताका भेवा । पिता का समझो तुम त्रिय देवा । यह भौसागर महा विकरारा ॥ समझ पुत्र तुम होहु निनारा ॥ ध्यान धरो तुम तीनों भाई । सुन्य नगर तुम रहो समाई ॥
समै-वहां नहीं पिता तुम्हारो, हम हैं पिता तुम्हार । वेनारी हम उनके पुरुष, बिच राखा निरंकार । माता कहा सोई हम मानत, तुम्हरी झूठी बात । प्रथमे माय हमारी सेवा, जाका यह विस्तार ॥
रमैनी ८९-निरगुन पुरुष पुजावे देवा । आवो माता करें हम सेवा ॥ माता कहो हमे समझाई । कौन पुरुष ते ध्यान लगाई ॥ जो तुम कहो सोई हम जानी । और का कहा न कबहुँ मानी ॥ लौट माता पुत्रन समझावे । निराकार निरगुन बतलावे ॥ हमें मेट ठहरावे देवा । आदि कथाका कहैं न भेवा ॥
समै-हमे दुराय ठहरावे धोखा, ऐसी त्रिया अनखान । कहैं कवीर मानों त्रिदेवा, माताकी पहिचान ॥
रमैनी ९०-हम बूझें ब्रह्मा ते कहानी । कहो का कहा आन भवानी ॥ लौट ब्रह्मा निज कहैं कहानी । माता बचन निरगुन हम जानी ॥ नीरी कोइ न वह सनेहा । पांच तत्त्वकी धरे न देहा ॥ निहतत्त्व निरगुण निराकारा । निहकामी बहे वार न पारा ॥ बरन न मेख न पीवे न खाई । कर्म रहा सब जग ठहराई ॥ वह निहकर्म त्रिगुन ते न्यारा । गगन मंडल हम देखत अपारा ॥