भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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रमैनी ८५-सुन्य नगर चल देखो आई । जेहि कौतुक मन रहा ठहराई ॥ कोट चन्द्रका उदे तहैं होई । कोट भान तहैं तपते सोई ॥ कोट ब्रह्मा तहैं पढते वेदा । कोट विष्णु तहैं कहेते भेदा ॥ कोट संकर तहैं करते सेवा । कर जोरे तैंतीसो देवा ॥ कोट भवानी ठाढी द्वारा । कोट धरमराय करत विचारा ॥ कोट राम तहैं ठाढे रहहीं ॥ कोट कृष्ण कथा तहैं कहहीं ॥ कोटिन अनहद बाजे बाजा । पार ब्रह्म तह करे सु राजा ॥

समै-चल ज्ञाती मैं चलिहो, यह कोतक जेहि देस । मेरे जिय एक अचंभा, पार ब्रह्म केहि भेस ॥

रमैनी ८६-मारकंडे मेरे न भाई । धरती अकास दुनी सब जाई ॥ होय अलोप जावे रवि चंदा । अच्छै वृच्छ पर बाल- मुकन्दा ॥ दस आंगुल पुरुष होय जोई । तीन लोक जेहि जाय समोई ॥ विस्नु सोवैं जगें भवानी । नाभि तैं ब्रह्मा सुनो ब्रह्म- ज्ञानी ॥ मुखने ब्राह्मण भुजा ते छत्री । उदरते वैश्य पगते सुद्री ॥ चार ऊपर चौंसठ फिर जाती । सगरी सृष्टि भई यह भांती ॥

समै-मैं तोहि पूछों पंडित, तुमहू थे वहि पास । जो यह विधि समझावत, कह कछु वेद औ व्यास ॥ अस पंडित कथ भाषत हम, नाही जानत भेद । ब्रह्मा कही ताते हम जानी, सबहि बतावत वेद ॥ वेद ब्रह्मा कहा भवानी, ब्रह्मा कीन्हा ग्रंथ । कहैं कवीर करता नहीं, भाषो मायाका यह पंथ ॥

रमैनी ८७-दो पच्छ सृष्टि २ की खानी । दोनों पच्छ बूझो ब्रह्मज्ञानी ॥ एक मास दो पच्छ है भाई ॥ पाप पुन्य दो रहे ठहराई ॥ पिता पुत्र गुरु औ चेला । स्त्री पुरुष वृच्छ औ बेला ॥ दिन औ रात सूर चंदा । गगन औ धरनि स्वामी औबंदा ॥

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