भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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रमैनी ८३-चलो जांय बसें वही गाऊं । सुन्य शिखर है वाको नाऊं॥ पाप न पुन्य दिवस न राती । सुख न दुख न जात न पाती ॥ सुनी ऋषीसुर नहिं देवा । स्वामी सेवक नाहीं सेवा ॥ गुन नहिं कर्म वृच्छ नहिं बेल। तुरुक न हिन्दू गुरु न चेला ॥ भूख न प्यास पीवे न पानी । राव न रंक नहीं रजधानी ॥ बेद न भेद भवन न कोई । अनेक न भेष पुरुष न जोई ॥ माया मोह न छे मद कोई । निराकार निरगुन है सोई ॥ तहां जाय कीने बिसरामा । चलो विगत जे भर्म मुकामा ॥

समै-निराकार निरगुन है करता, बाके रूप न रेख । तुम कैसे वही मिलिहौ, समझावो करी विवेक ॥ रूप न रेखा निरगुन है साहेब, जब नाहीं वहि देश । वहिके वरण तुमहू होइ जेहौ, बहुरि न मिले संदेश ॥ वहां न जावो रहो यहि देसवा, मानो कहा हमार । कहैं कवीर वह झूट संदेसवा, यह सुखका दरबार ॥

रमैनी ८४-ब्रह्मपुरी एक ब्रह्म बनाई । प्रेम वियोग तहां नहिं भाई ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । वेद विरंचि करें तेहि सेवा ॥ सनकादिक औ जनक विदेही । और लच्छमी और ब्रह्मा सनेही ॥ द्वादस भक्ता सिद्ध चौरासी । नौ नाथ ऋषि सहस अठासी ॥ गण गंधर्व औ किन्नर भाई । जच्छ देव मिल केल कराई ॥ चलो जांय बसें वहि देसा ॥ भौसागरका न मिले संदेसा ॥

समै-पंडित मोही ले चलो, जौन देश वह लोग । दूँदत मोहि भये जुग चारी, मिटा न परम वियोग ॥ सबहीं गये ये हमरे, अविनासीके गाम । कह कवीर करता तुम बूझो, लेव न वाको नाम ॥ एक समय हम गये वहि देसवा, वहां मिला ना कोय । बूझ अस्थान गहो जो ज्ञानी, उपज बिनस नहिं होय ॥