कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
रमैनी ८०-षट् दरशन सुनु बात हमारी । आपन आपन मत कीन निनारी ॥ हरि ब्रह्माते कछु न भेवा । भिन्न भिन्न करु काकी सेवा ॥ सब पंडित मिल रहो बिचारी । हरि ब्रह्मा किनके त्रिपुरारी ॥ पिताका कोई खोज न पावे । बिन करता निरगुन बतलावे ॥ पिता नाल का दुर मन आना । भिन्न भिन्न करि भिन्न समाना ॥
समै-प्राण तत्त्वको दुख नहीं, अस्थानेका दोष । कहैं कवीर समझ जिय अपने, दूसरका नहीं भरोस ॥ सिंह चले हर माही, सीगट बोवे धान । कहैं कवीर यह बड़ा अचंभा, छागल भयल किसान ।
रमैनी ८१-प्राण अपान व्यान उदाना । पांच वायु यह सहत समाना ॥ श्रवणनेत्र औ रुधिर तुचाया । सर्व अंगका होम कराया ॥ विजिया होम अपनका कीन्हा । परव्रित छोड निरव्रित लीन्हा ॥ निरव्रित भया ब्रह्म लोके जाई । बहुर परव्रिति न कबहूँ आई ॥ अपनासे निरगुन ठहरावे । सो ज्ञानी ब्रह्मलो कहि जावे ॥
समै-निरगुन ठहरा सुन्यमें, आपा डारा खोय । कहो ज्ञानी तोसो कहों, सो भिट कैसे होय ॥ ज्ञानी बूझो आपको, अस्थान बूझले थीत । कहैं कवीर नैनन दिये, ताकी करो प्रतीत ॥
रमैनी ८२-सेवत सुन्य दुख सूना होई । ज्ञानस्वरूपी सिद्धिमें जोई ॥ मान अपमान न वाके भाई । पारब्रह्ममें रहा समाई ॥ वाको मुक्तिकी नाही संसा । वह तो सुन्य नगरके हंसा ॥ ज्ञान विज्ञान त्रिपित वह भयऊ । इंद्रिन जीत पार होय गयऊ ॥ सब इंद्रिनको वह बस लाया । आपा खोय निरगुन ठहराया ॥ भौसा-गर सो उतरा पारा । फिर न आया यहि संसारा ॥
समै-जो चेतन तेहि सब कछु व्यापे, जड़को व्याप न होय ॥
कहैं कवीर बातें यह झूठी, माने वचन न कोय ॥