कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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पांच तत्त्वका जात है सोईं । नौ तत्त्वका जो राखे कोई ॥ तन छूटे तेहि माहिं समाईं । दोहरा नौतम कैसे पाईं ॥
समै-कुम्भ भरा जो फूटे, दूसरे में क्यों जाय ।
कहे कवीर सुनो ब्रह्मज्ञानी, कैसे अंत जीव समाय ॥
जीव न अंते जात है, जैसे घटको नीर ।
यह शरीर घट जीवको, समझाय कहें कवीर ॥
सो गुन कबहुं न बीसरे, जो गुन होत शरीर ।
मन भरमत चौरासी, कहहिं पुकार कवीर ॥
स्नेत कृष्ण जिय पीयरा, हर! लाल जिय जान ।
पांच तत्त्वके रंग रंगो, पांचोंको पहिचान ॥
रमैनी ७८-नेम घरम पूजा लपटाना । ज्ञान कथा अस्थान न जाना ॥ अस्थान भङ्ग देखे सब कोई । अस्थान लखे विन थित न होईं ॥ रिषि औ मुनि अस्थान न भाषे । प्रेम धाम अस्थान सो राखे ॥ कथा कवित्त बहुत कुछ गाया । करताका अस्थान न पाया ॥
समै-पांच तत्त्व अस्थान निज, इन्हि विहूना नाहिं ।
कहें कवीर बूझो ब्रह्मज्ञानी, जनि पर संशय माहिं ॥
रमैनी ७९-तीरथ व्रत रहा लौ लाई । देव दिवाले देव मनाई ॥ पितरके नाम सराध करावे । आपहिं नरक सरग ले जावे ॥ बिनती करके देये मयारू । अबकी बार प्रभु मोहि त्यारू ॥ कहे गुरु मोहिं पार लगाई । ताते गुरुवा मंत्र लियो भाई ॥ गुरु मंत्र लीना जिव जानी । गुरु शिष्यकी न त्रिषा बुझानी ॥ घर २ होय निरगुनकी सेवा । निरगुन मंत्र दियो गुरुदेवा ॥
समै-सिक्ख समाना गुरुहमें, निजके लागा नेह । बिलगाये बिलगे नहीं, एक परान दो देह ॥