भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 577, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 577

शब्दावली

(५६३)

पांच तत्त्वका जात है सोईं । नौ तत्त्वका जो राखे कोई ॥ तन छूटे तेहि माहिं समाईं । दोहरा नौतम कैसे पाईं ॥

समै-कुम्भ भरा जो फूटे, दूसरे में क्यों जाय ।

कहे कवीर सुनो ब्रह्मज्ञानी, कैसे अंत जीव समाय ॥

जीव न अंते जात है, जैसे घटको नीर ।

यह शरीर घट जीवको, समझाय कहें कवीर ॥

सो गुन कबहुं न बीसरे, जो गुन होत शरीर ।

मन भरमत चौरासी, कहहिं पुकार कवीर ॥

स्नेत कृष्ण जिय पीयरा, हर! लाल जिय जान ।

पांच तत्त्वके रंग रंगो, पांचोंको पहिचान ॥

रमैनी ७८-नेम घरम पूजा लपटाना । ज्ञान कथा अस्थान न जाना ॥ अस्थान भङ्ग देखे सब कोई । अस्थान लखे विन थित न होईं ॥ रिषि औ मुनि अस्थान न भाषे । प्रेम धाम अस्थान सो राखे ॥ कथा कवित्त बहुत कुछ गाया । करताका अस्थान न पाया ॥

समै-पांच तत्त्व अस्थान निज, इन्हि विहूना नाहिं ।

कहें कवीर बूझो ब्रह्मज्ञानी, जनि पर संशय माहिं ॥

रमैनी ७९-तीरथ व्रत रहा लौ लाई । देव दिवाले देव मनाई ॥ पितरके नाम सराध करावे । आपहिं नरक सरग ले जावे ॥ बिनती करके देये मयारू । अबकी बार प्रभु मोहि त्यारू ॥ कहे गुरु मोहिं पार लगाई । ताते गुरुवा मंत्र लियो भाई ॥ गुरु मंत्र लीना जिव जानी । गुरु शिष्यकी न त्रिषा बुझानी ॥ घर २ होय निरगुनकी सेवा । निरगुन मंत्र दियो गुरुदेवा ॥

समै-सिक्ख समाना गुरुहमें, निजके लागा नेह । बिलगाये बिलगे नहीं, एक परान दो देह ॥