भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

समै--नरक सरग कोइ और है, करताके नहिं काम ।

सुन कहानी तोसों कहों, ऐसे कैसे राम ॥

रमैनी ७५--पहले माया फिर आमाया । तमते फिर सुभाव ठहराया ॥ सुभावते फिर भया अकासा । अकासते वायु कीन्ह प्रकासा ॥ वायु ते अगिन अगिन ते तूवा । तुवा ते पृथ्वी औषध हुआ ॥ औषद ते अन्न अन्न ते पुरखा । पंडित जानत और सब सुरखा ॥

समै--कहो पंडित कछु न हता, केहिंते भया अकार । कहें कवीर कैसे रचा, कहो प्रगट विचार ॥ पांच तत्त्व गुन तीन जो, जियरा तिहि संयोग । संजोगे सब कुछ भया, झूटे बोलत लोग ॥ पांचोका भेला पडा, प्रान वसे ता माहिं । कहें कवीर भेला छुटे, फिर यह जियरा नाहिं ॥

रमैनी ७६--अवस्था चार सुकति भई भाई । जाग्रित स्वप्न सुषोपति आई ॥ तुरिया भई तब ब्रह्म समाना । मेटा फिर उन आवन जाना ॥ सालोक साहूप औ भया साजुजा । सामीप भया तब जोत प्रदिजा ॥ ज्ञान प्रदीप जबे कछु होई । जोतमें जोत मिले तब कोई ॥ चार अवस्था पर जब आई । चार सुकति ले सुन्य समाई ॥

समै-सुन्यको होती सब कहो, जहां सुन्य तहां नाहिं ।

सुकत अवस्था कुछ नहीं, जिव पर संशय माहिं ॥

चार चौकडी संशय गई, संशय तऊ न छूट ।

कहें कवीर सोई ब्रह्मज्ञानी, क्या कहूं वैकुण्ठ ॥

रमैनी ७७--जीव सुकत निराधार कहाया । पसन मध्यमा बैखरी माया ॥ दोनों कीन है दोय शरीरा । ना माया पांच धरे कवीरा ॥ ऊपर सोवे वासना बासे । दोऊ शरीरका सोई बिनासे ॥