भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली ।

(५६१)

रमैनी ७२--नैना है पर आंधर भाई । सरवण है पै सुना न जाई ॥ जोगी है पै जुगत विहूना । बस्ती है पै मंदिल सूना ॥ त्रिया है पै पुरुष न कोई । पुरुष है पै बांह न जोई ॥ पेट तो है पै अन्न न खाई । जीव तो नहीं पै जीवत भाई ॥

समै--पंडित भेद सुनावहु, नहिं तो छांडो गांव ।

मैं पूछो तोहि पंडिता, निराकार केहि ठांव ॥

रमैनी ७३--कहो पंडित हो मोहि ससुझाई । जात बरन कुल कहाँते आई ॥ कौन मते भाइ वहिन कहावे । कौन मते व्याहले आवे ॥ कौन मते सुद्रा ब्रह्मानी । कौन मते वैश्या क्षत्रानी ॥ पाँच तत्त्वका एके भेला । ता संग भयो जीवको भेला ॥ रक्त माँस हाडू इक गूदा । तिनमें कौन ब्राह्मण सुद्रा । वही नार वही पुरुष बियाई । बिंद चौराय सुपचकी लाई ॥ तब वह केहिकी भई नारी । को भय पूत कहु पंडित विचारो ॥

समै--पंच तत्त्व हम जानत, और न जानत कोइ ।

हमरा भेद जो पावे, तब वह अस्थिर होय ॥

समै--दो संयोग जग भीतरे, कंथ भाषिनि नेह । अष्ट धातका युगल तन, एक प्राण दो देह ॥ पठ पोथी भटका मारत, घटकी जानत नाहिं । कह कवीर जो घट लखे, तो फिर घटही माहिं ॥

रमैनी ७४--जोइ नरक सोइ सरग विचारा । जो पृथ्वी सोई पतारा ॥ जो है घट सोई ब्रह्मण्डा । सोई छिद्रम छांनबे पाखंडा ॥ जोइ पुरुष सोई भइ नारी । जोइ पिता सोइ महतारी ॥ जोई गुन अवगुन है सोई । जोई पाप पुन्य है सोई ॥ जोइ निराकार सोई अकारा । जो मारे सोइ पालनहारा ॥ जो खाये सोई ना खाई । राय जोई सोइ रंक कहाई ॥