कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
शब्दावली ।
(५६१)
रमैनी ७२--नैना है पर आंधर भाई । सरवण है पै सुना न जाई ॥ जोगी है पै जुगत विहूना । बस्ती है पै मंदिल सूना ॥ त्रिया है पै पुरुष न कोई । पुरुष है पै बांह न जोई ॥ पेट तो है पै अन्न न खाई । जीव तो नहीं पै जीवत भाई ॥
समै--पंडित भेद सुनावहु, नहिं तो छांडो गांव ।
मैं पूछो तोहि पंडिता, निराकार केहि ठांव ॥
रमैनी ७३--कहो पंडित हो मोहि ससुझाई । जात बरन कुल कहाँते आई ॥ कौन मते भाइ वहिन कहावे । कौन मते व्याहले आवे ॥ कौन मते सुद्रा ब्रह्मानी । कौन मते वैश्या क्षत्रानी ॥ पाँच तत्त्वका एके भेला । ता संग भयो जीवको भेला ॥ रक्त माँस हाडू इक गूदा । तिनमें कौन ब्राह्मण सुद्रा । वही नार वही पुरुष बियाई । बिंद चौराय सुपचकी लाई ॥ तब वह केहिकी भई नारी । को भय पूत कहु पंडित विचारो ॥
समै--पंच तत्त्व हम जानत, और न जानत कोइ ।
हमरा भेद जो पावे, तब वह अस्थिर होय ॥
समै--दो संयोग जग भीतरे, कंथ भाषिनि नेह । अष्ट धातका युगल तन, एक प्राण दो देह ॥ पठ पोथी भटका मारत, घटकी जानत नाहिं । कह कवीर जो घट लखे, तो फिर घटही माहिं ॥
रमैनी ७४--जोइ नरक सोइ सरग विचारा । जो पृथ्वी सोई पतारा ॥ जो है घट सोई ब्रह्मण्डा । सोई छिद्रम छांनबे पाखंडा ॥ जोइ पुरुष सोई भइ नारी । जोइ पिता सोइ महतारी ॥ जोई गुन अवगुन है सोई । जोई पाप पुन्य है सोई ॥ जोइ निराकार सोई अकारा । जो मारे सोइ पालनहारा ॥ जो खाये सोई ना खाई । राय जोई सोइ रंक कहाई ॥
(५६२)
कवीरपंथी—
समै--नरक सरग कोइ और है, करताके नहिं काम ।
सुन कहानी तोसों कहों, ऐसे कैसे राम ॥
रमैनी ७५--पहले माया फिर आमाया । तमते फिर सुभाव ठहराया ॥ सुभावते फिर भया अकासा । अकासते वायु कीन्ह प्रकासा ॥ वायु ते अगिन अगिन ते तूवा । तुवा ते पृथ्वी औषध हुआ ॥ औषद ते अन्न अन्न ते पुरखा । पंडित जानत और सब सुरखा ॥
समै--कहो पंडित कछु न हता, केहिंते भया अकार । कहें कवीर कैसे रचा, कहो प्रगट विचार ॥ पांच तत्त्व गुन तीन जो, जियरा तिहि संयोग । संजोगे सब कुछ भया, झूटे बोलत लोग ॥ पांचोका भेला पडा, प्रान वसे ता माहिं । कहें कवीर भेला छुटे, फिर यह जियरा नाहिं ॥
रमैनी ७६--अवस्था चार सुकति भई भाई । जाग्रित स्वप्न सुषोपति आई ॥ तुरिया भई तब ब्रह्म समाना । मेटा फिर उन आवन जाना ॥ सालोक साहूप औ भया साजुजा । सामीप भया तब जोत प्रदिजा ॥ ज्ञान प्रदीप जबे कछु होई । जोतमें जोत मिले तब कोई ॥ चार अवस्था पर जब आई । चार सुकति ले सुन्य समाई ॥
समै-सुन्यको होती सब कहो, जहां सुन्य तहां नाहिं ।
सुकत अवस्था कुछ नहीं, जिव पर संशय माहिं ॥
चार चौकडी संशय गई, संशय तऊ न छूट ।
कहें कवीर सोई ब्रह्मज्ञानी, क्या कहूं वैकुण्ठ ॥
रमैनी ७७--जीव सुकत निराधार कहाया । पसन मध्यमा बैखरी माया ॥ दोनों कीन है दोय शरीरा । ना माया पांच धरे कवीरा ॥ ऊपर सोवे वासना बासे । दोऊ शरीरका सोई बिनासे ॥
शब्दावली
(५६३)
पांच तत्त्वका जात है सोईं । नौ तत्त्वका जो राखे कोई ॥ तन छूटे तेहि माहिं समाईं । दोहरा नौतम कैसे पाईं ॥
समै-कुम्भ भरा जो फूटे, दूसरे में क्यों जाय ।
कहे कवीर सुनो ब्रह्मज्ञानी, कैसे अंत जीव समाय ॥
जीव न अंते जात है, जैसे घटको नीर ।
यह शरीर घट जीवको, समझाय कहें कवीर ॥
सो गुन कबहुं न बीसरे, जो गुन होत शरीर ।
मन भरमत चौरासी, कहहिं पुकार कवीर ॥
स्नेत कृष्ण जिय पीयरा, हर! लाल जिय जान ।
पांच तत्त्वके रंग रंगो, पांचोंको पहिचान ॥
रमैनी ७८-नेम घरम पूजा लपटाना । ज्ञान कथा अस्थान न जाना ॥ अस्थान भङ्ग देखे सब कोई । अस्थान लखे विन थित न होईं ॥ रिषि औ मुनि अस्थान न भाषे । प्रेम धाम अस्थान सो राखे ॥ कथा कवित्त बहुत कुछ गाया । करताका अस्थान न पाया ॥
समै-पांच तत्त्व अस्थान निज, इन्हि विहूना नाहिं ।
कहें कवीर बूझो ब्रह्मज्ञानी, जनि पर संशय माहिं ॥
रमैनी ७९-तीरथ व्रत रहा लौ लाई । देव दिवाले देव मनाई ॥ पितरके नाम सराध करावे । आपहिं नरक सरग ले जावे ॥ बिनती करके देये मयारू । अबकी बार प्रभु मोहि त्यारू ॥ कहे गुरु मोहिं पार लगाई । ताते गुरुवा मंत्र लियो भाई ॥ गुरु मंत्र लीना जिव जानी । गुरु शिष्यकी न त्रिषा बुझानी ॥ घर २ होय निरगुनकी सेवा । निरगुन मंत्र दियो गुरुदेवा ॥
समै-सिक्ख समाना गुरुहमें, निजके लागा नेह । बिलगाये बिलगे नहीं, एक परान दो देह ॥
(५६४)
कवीरपंथी-
रमैनी ८०-षट् दरशन सुनु बात हमारी । आपन आपन मत कीन निनारी ॥ हरि ब्रह्माते कछु न भेवा । भिन्न भिन्न करु काकी सेवा ॥ सब पंडित मिल रहो बिचारी । हरि ब्रह्मा किनके त्रिपुरारी ॥ पिताका कोई खोज न पावे । बिन करता निरगुन बतलावे ॥ पिता नाल का दुर मन आना । भिन्न भिन्न करि भिन्न समाना ॥
समै-प्राण तत्त्वको दुख नहीं, अस्थानेका दोष । कहैं कवीर समझ जिय अपने, दूसरका नहीं भरोस ॥ सिंह चले हर माही, सीगट बोवे धान । कहैं कवीर यह बड़ा अचंभा, छागल भयल किसान ।
रमैनी ८१-प्राण अपान व्यान उदाना । पांच वायु यह सहत समाना ॥ श्रवणनेत्र औ रुधिर तुचाया । सर्व अंगका होम कराया ॥ विजिया होम अपनका कीन्हा । परव्रित छोड निरव्रित लीन्हा ॥ निरव्रित भया ब्रह्म लोके जाई । बहुर परव्रिति न कबहूँ आई ॥ अपनासे निरगुन ठहरावे । सो ज्ञानी ब्रह्मलो कहि जावे ॥
समै-निरगुन ठहरा सुन्यमें, आपा डारा खोय । कहो ज्ञानी तोसो कहों, सो भिट कैसे होय ॥ ज्ञानी बूझो आपको, अस्थान बूझले थीत । कहैं कवीर नैनन दिये, ताकी करो प्रतीत ॥
रमैनी ८२-सेवत सुन्य दुख सूना होई । ज्ञानस्वरूपी सिद्धिमें जोई ॥ मान अपमान न वाके भाई । पारब्रह्ममें रहा समाई ॥ वाको मुक्तिकी नाही संसा । वह तो सुन्य नगरके हंसा ॥ ज्ञान विज्ञान त्रिपित वह भयऊ । इंद्रिन जीत पार होय गयऊ ॥ सब इंद्रिनको वह बस लाया । आपा खोय निरगुन ठहराया ॥ भौसा-गर सो उतरा पारा । फिर न आया यहि संसारा ॥
समै-जो चेतन तेहि सब कछु व्यापे, जड़को व्याप न होय ॥
कहैं कवीर बातें यह झूठी, माने वचन न कोय ॥
शब्दावली
(५६५)
रमैनी ८३-चलो जांय बसें वही गाऊं । सुन्य शिखर है वाको नाऊं॥ पाप न पुन्य दिवस न राती । सुख न दुख न जात न पाती ॥ सुनी ऋषीसुर नहिं देवा । स्वामी सेवक नाहीं सेवा ॥ गुन नहिं कर्म वृच्छ नहिं बेल। तुरुक न हिन्दू गुरु न चेला ॥ भूख न प्यास पीवे न पानी । राव न रंक नहीं रजधानी ॥ बेद न भेद भवन न कोई । अनेक न भेष पुरुष न जोई ॥ माया मोह न छे मद कोई । निराकार निरगुन है सोई ॥ तहां जाय कीने बिसरामा । चलो विगत जे भर्म मुकामा ॥
समै-निराकार निरगुन है करता, बाके रूप न रेख । तुम कैसे वही मिलिहौ, समझावो करी विवेक ॥ रूप न रेखा निरगुन है साहेब, जब नाहीं वहि देश । वहिके वरण तुमहू होइ जेहौ, बहुरि न मिले संदेश ॥ वहां न जावो रहो यहि देसवा, मानो कहा हमार । कहैं कवीर वह झूट संदेसवा, यह सुखका दरबार ॥
रमैनी ८४-ब्रह्मपुरी एक ब्रह्म बनाई । प्रेम वियोग तहां नहिं भाई ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । वेद विरंचि करें तेहि सेवा ॥ सनकादिक औ जनक विदेही । और लच्छमी और ब्रह्मा सनेही ॥ द्वादस भक्ता सिद्ध चौरासी । नौ नाथ ऋषि सहस अठासी ॥ गण गंधर्व औ किन्नर भाई । जच्छ देव मिल केल कराई ॥ चलो जांय बसें वहि देसा ॥ भौसागरका न मिले संदेसा ॥
समै-पंडित मोही ले चलो, जौन देश वह लोग । दूँदत मोहि भये जुग चारी, मिटा न परम वियोग ॥ सबहीं गये ये हमरे, अविनासीके गाम । कह कवीर करता तुम बूझो, लेव न वाको नाम ॥ एक समय हम गये वहि देसवा, वहां मिला ना कोय । बूझ अस्थान गहो जो ज्ञानी, उपज बिनस नहिं होय ॥
रमैनी ८५-सुन्य नगर चल देखो आई । जेहि कौतुक मन रहा ठहराई ॥ कोट चन्द्रका उदे तहैं होई । कोट भान तहैं तपते सोई ॥ कोट ब्रह्मा तहैं पढते वेदा । कोट विष्णु तहैं कहेते भेदा ॥ कोट संकर तहैं करते सेवा । कर जोरे तैंतीसो देवा ॥ कोट भवानी ठाढी द्वारा । कोट धरमराय करत विचारा ॥ कोट राम तहैं ठाढे रहहीं ॥ कोट कृष्ण कथा तहैं कहहीं ॥ कोटिन अनहद बाजे बाजा । पार ब्रह्म तह करे सु राजा ॥
समै-चल ज्ञाती मैं चलिहो, यह कोतक जेहि देस । मेरे जिय एक अचंभा, पार ब्रह्म केहि भेस ॥
रमैनी ८६-मारकंडे मेरे न भाई । धरती अकास दुनी सब जाई ॥ होय अलोप जावे रवि चंदा । अच्छै वृच्छ पर बाल- मुकन्दा ॥ दस आंगुल पुरुष होय जोई । तीन लोक जेहि जाय समोई ॥ विस्नु सोवैं जगें भवानी । नाभि तैं ब्रह्मा सुनो ब्रह्म- ज्ञानी ॥ मुखने ब्राह्मण भुजा ते छत्री । उदरते वैश्य पगते सुद्री ॥ चार ऊपर चौंसठ फिर जाती । सगरी सृष्टि भई यह भांती ॥
समै-मैं तोहि पूछों पंडित, तुमहू थे वहि पास । जो यह विधि समझावत, कह कछु वेद औ व्यास ॥ अस पंडित कथ भाषत हम, नाही जानत भेद । ब्रह्मा कही ताते हम जानी, सबहि बतावत वेद ॥ वेद ब्रह्मा कहा भवानी, ब्रह्मा कीन्हा ग्रंथ । कहैं कवीर करता नहीं, भाषो मायाका यह पंथ ॥
रमैनी ८७-दो पच्छ सृष्टि २ की खानी । दोनों पच्छ बूझो ब्रह्मज्ञानी ॥ एक मास दो पच्छ है भाई ॥ पाप पुन्य दो रहे ठहराई ॥ पिता पुत्र गुरु औ चेला । स्त्री पुरुष वृच्छ औ बेला ॥ दिन औ रात सूर चंदा । गगन औ धरनि स्वामी औबंदा ॥
शब्दावली
(५६७)
समै-एक पच्छ अस्थान भंग है, एक लीन्है अस्थान । कहैं कवीर सुनो ब्रह्मज्ञानी, सो अस्थाने जान ॥
रमैनी ८८-सुन्य नगर जाको वार न पारा । इक्कीस सरग ब्रह्मंड अपारा ॥ बचन मोर तुम सुलु तिर देवा । आद पुरातम- को यह भेवा ॥ रंकार धुन निरगुन होई । जोग रस कर देखे कोई ॥ वाहीकी हम हैं बहुत पियारी । तुम्हरे कारन भई निनारी ॥ तुम ना जानो पिताका भेवा । पिता का समझो तुम त्रिय देवा । यह भौसागर महा विकरारा ॥ समझ पुत्र तुम होहु निनारा ॥ ध्यान धरो तुम तीनों भाई । सुन्य नगर तुम रहो समाई ॥
समै-वहां नहीं पिता तुम्हारो, हम हैं पिता तुम्हार । वेनारी हम उनके पुरुष, बिच राखा निरंकार । माता कहा सोई हम मानत, तुम्हरी झूठी बात । प्रथमे माय हमारी सेवा, जाका यह विस्तार ॥
रमैनी ८९-निरगुन पुरुष पुजावे देवा । आवो माता करें हम सेवा ॥ माता कहो हमे समझाई । कौन पुरुष ते ध्यान लगाई ॥ जो तुम कहो सोई हम जानी । और का कहा न कबहुँ मानी ॥ लौट माता पुत्रन समझावे । निराकार निरगुन बतलावे ॥ हमें मेट ठहरावे देवा । आदि कथाका कहैं न भेवा ॥
समै-हमे दुराय ठहरावे धोखा, ऐसी त्रिया अनखान । कहैं कवीर मानों त्रिदेवा, माताकी पहिचान ॥
रमैनी ९०-हम बूझें ब्रह्मा ते कहानी । कहो का कहा आन भवानी ॥ लौट ब्रह्मा निज कहैं कहानी । माता बचन निरगुन हम जानी ॥ नीरी कोइ न वह सनेहा । पांच तत्त्वकी धरे न देहा ॥ निहतत्त्व निरगुण निराकारा । निहकामी बहे वार न पारा ॥ बरन न मेख न पीवे न खाई । कर्म रहा सब जग ठहराई ॥ वह निहकर्म त्रिगुन ते न्यारा । गगन मंडल हम देखत अपारा ॥
(५६८)
कबीरपंथी-
समै-निहततसे कैसे तत्त्व भया, निरगुनते गुणवंत । निहकर्म ते कैसे कर्म भया, कहो समझ व्रितंत ॥ रूप रेख वाके कछु नहीं, कैसे आवे ध्यान । कहैं कवीर अबहुँ क्यों न चेतो, कहा हमारा मान ॥
रमैनी ९१-नागद सुनि यह कथा सुनाई । एक समय बैकुंठ गया भाई ॥ गदा चक्र पीताम्बर काछे । लच्छमी ठाढी विस्तुके पाछे ॥ तब हम बचन कहे दोय चारी । लौट विस्तु कछु कहा बिचारी ॥ काठ पषाण न तिरथ देवाले । अगिन पवनके नाहिं बिचाले ॥ भगत भागवत साधु अस्थाना । तहाँ बसत मैं सत यह ज्ञाना ॥ त्रिभुवन नाथ है त्रिभुवन स्वामी । घट २ रहे निरंतर यामी ॥
समै-कौनकी भक्ति करो तुम भाई, को बैकुंठ कहाँ बस सोय । कहैं कवीर झूठ क्यों भाषा, झूठा सब ना होय ॥ तहिया हरि नित मिलत थे, अब क्यों रहे छिपाय । अब कोई क्यों बा जावे, ना वह कहे बुझाय ॥
रमैनी ९२-ब्रह्मलोक शिवलोक अपारा । विष्णुलोक बैकुंठ द्वारा ॥ स्वर्गलोक गौलोक है भाई । इंद्रलोक चंद्रलोक कहाई ॥ यक्षलोक देवलोक बताया । महरलोक यमलोक दिखाया ॥ अंतरिच्छे एक लोक ब्रह्मंडा । छ दर्शन छयानवे पखंडा ॥ जेहि २ लोककी आसा लाई । तीन लोक लोग बहे जाई ॥ निरगुण झर कोई लख पावे । सुन्यलोक सोइ जाय समावे ॥
समै-चार जुग जात हम देखा, काहु न कहा संदेश । जैसे देश सुन्य हम जानत, जो वह ऐसा देश ॥ बात न कहत २ जिव दीन्ही, लोका लोक न चीन्ह । कहैं कवीर बिना वह देखे, आपन जीव जग दीन्ह ॥
शब्दावली
(५६९)
लोकालोक अकाश नहिं, झूठे लोका लोक । कहैं कवीर आस जिन बांधो, छांडो जीका सोक ॥
रमैनी ९३-सुन पंडित तैं बचन हमारा । करता सबका सिर- जन हारा ॥ कंथ भामिनी कंथ सनेहा । पिताको रूप पिताको देहा ॥ माताको रुधिर पिताको नीरू । दो संयोग मिल धरो शरीरू ॥ पांच तत्त्व गुन तिनके संग। अष्टधात के जिव रंग रंगा ॥ माटी ते उपज अबहुं किन होई । कारण कौन पुरुष संग जोई ॥ मनसा शब्दका होय अकारा । तजो कंथ भामिनि व्योहारा ॥
समै-ब्रह्म कुलाल हर जग मट्टी, रुधिर करे सिंगार ।
मानसिक रचना जग रचा, पंडित कहो विचार ॥
प्रथम उत्पत्त मानसी, फिर भय पुरुष औ जोय ।
कहे कवीर सृष्टिक सबकी, विरला बूझे कोय ॥
तेहि नारी घर मबके, चार बरण जग कीन ।
तेरह ते तेरह भई खानी, वेद साख अस दीन ॥
रमैनी ९४-कर्म बस ब्रह्मा पिंड संवारा । करम बस विस्तू पाले संसारा ॥ कर्म बस रुद्र करे संहारा । कर्म बस विष्णु लेंय औतारा ॥ कर्म बस चंद्र सूर्य भरमाना । कर्म बस नारद भोग अस्थाना ॥ कर्म बस रावण औ गये कंसा । कर्म बस रुधर भये निरवंसा ॥ कर्म बस मरा सकल संसारा । करता करम करम बिस्तारा ॥
समै-करता ते कर्म निहकर्म ते कर्ता, झूठा कर्म सनेह ।
कहैं कवीर जैसा पड़ा मेला, तैसा जगत करेह ॥
रमैनी ९५-ब्रह्म पाडी सबकी बांटा । सबे लगे अस औघट घाटा ॥ पांच देवका थापना कीन्हा । चारों वेद मंत्र लिख दीन्हा ॥ देव पांचकी कीन्हा सेवा । तैतिस कोट और किय देवा ॥ तिनहुं
(५७०)
कबीरपंथी—
कीन्ह सेवा बहु भाई । अगम अगोचर रहा समाई ॥ कोई ब्रह्म रहा लौ लाई । कोई सुन्यमें रहा समाई ॥ कोई बैठ आसन मारी । कोई ध्यान धर लाया तारी ॥ कोई सक्ति ठहरावत माया । कोई सूरज ते ध्यान लगाया ॥ और जो तैंतीसो कौरी । सब जग सेवा करे कर जोरी ॥
समै-बिब अक्षर माया जन भाषो, ताते रचो सतंत । चार वेद षट् दससन, बुध बल नित निचंत ॥ अंथ रचा गुण कर्म लगाया, नरक सरग विस्तार । कहैं कवीर करता नहिं चीन्हो, ये उरले व्योहार ॥
रमैनी ९६-गनपत विष्णु महेश्वर देवा । सूर्य भवानी तिनकी सेवा ॥ कर स्नान पवित्र होय आया । चौका करि आसन विछाया ॥ चंदन गार तिलक कियो छापा । देव नहवाय करन लग जापा ॥ चंदन घस नैवेद चढ़ाई । पुष्प सुगंध अर्पन कियो भाई ॥ अगम अगोचर ध्यान लगाया । कर आवाहन सर्गते बोलाया ॥ दो कर जोरके विनती कराई । कीन सुमरण जन दीन पठाई ॥
समै-देव न देखा सेवको, सेवक देव न दीख । कहैं कवीर मरे ते देखो, यही गुरु दइ सीख ॥ तेरी गति तैं जाने देवा, हममें सामरथ नाहिं । कहैं कवीर यह भूल सबनकी, सब पर संशय माहिं ॥
रमैनी ९७-ज्ञान गूदरी गुरु विछाई । हरी आसन पर बैठे आई ॥ तिलक छाप कंठी औ माला । बैठे आप धर रूप गोपाला ॥ मूढ़ मुड़ाय मुडियनमें आया । भगत कहाय महंत कहाया ॥ मूढ़ मुड़ाय गुरु होय खेला । नर नारी सब कीन्हे चेला ॥ मूढ़ मुड़ाय महंत कहाया । प्रन उपान उपदेश कराया ॥ चोला पहरा सेल्ही डारी । टोपी देके पाग उतारी ॥
शब्दावली
(५७१)
समै-जेई पान पनवारिया, तेई तम्बोली हाट । तेई पान गुरुवा दीन्हा, लायसि औघट घाट ॥ औघट घाटी नर गया, गुरुवाके उपदेश । कहै कवीर कोउ नाही लावे, उनका बहुर संदेश ॥
रमैनी ९८-षट् दर्शन मिल देखे संदेशा । कोइ न रूप करताके भेसा ॥ हता अकेलकी हता वहि नारी । अकाश हताकी हता संसारी ॥ गृहस्थ हताकी हता वैरागी । गुनवंत हताकी हता गुन त्यागी ॥ सुखी हताकी हता दुखि भाई । देह धरेका विदेह कहाई ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । संयोग वियोग कहो यह भेवा ॥
समै-निरगुन पुरुष निरंतर देवा, निराकार है सेव । यहि बानमें वह नाही, बिरला बूझे भेव ॥ पांच तत्त्व गुन तीन धरि, सब गुन धरे शरीर । प्रत्यक्ष जगतमें देत दिखावा, कहहि पुकार कवीर ॥
रमैनी ९९-जप तप पूजा मंत्र बताया । सुन्य मण्डलमें मन ठहराया ॥ पूजा करत करत गये हारी । जोग जुगति ले आसन मारी ॥ संध्या तर्पण आरति गावें । देव न रीझे देव मनावें ॥ जो धंधा नित मन बस भाई । स्वप्ने सूझे धंधा आई ॥ जेहि धंधामें जीव लगाया । अंतकाल तेहि धंध समाया ॥
समै-जप तप दीखा थोथरा, तीरथ बरत बिस्वास । सुवना सेम्हर सेइके, उड़ फिर चला निरास ॥ सुवना सेम्हर सेइके, बैठा पलासे जाय । चौंच टकोरे सिर धुने, वो उसही का भाय ॥
रमैनी १००-पांच तत्त्व नहीं त्रिगुन देवा । चंद्र न सूर वेद न भेवा ॥ पाप न पुण्य पुरुष न जोई । अस्थान भंग जोहै कर्ता न
(५७२)
कबीरपंथी—
कोई ॥ तेहि घर कर्ताको ठहराया । जो नाहीं कछु तासों लौ लाया ॥ अगम अगोचर सिरजन हारा । रूप न रेखा वार न पारा ॥
समै-सुमरन सुरतिकी गम नहीं, बहुत विकट वह पंथ ।
सुरति निरति तहवाँ नहि पहुँचे, अस कथि भाषत ग्रंथ ॥
रमैनी १०१-षट् दरशन सुनो बात हमारी । छिनमें पुरुष वह छिनमें नारी ॥ छिनमें तरुन छिनमें बाला । छिनहि दयाल छिनहि होय काला ॥ छिन सुच्छम छिन होय अस्थूला । यह गुण देख जगत सब भूला ॥ चंचल चपलकी खबर न पाई । यह वह रूप ठग जग आई । यहीके छंद भूला सब कोई ॥ गति नहि पाई पुरुष औ जोई ।
समै-मनहरवा नगरवा, घट घट रहा समोई ।
यह तो काम नाही करताकै, बिरला बूझे कोई ॥
जो बूझे सो थीर है, बिन बूझे भरमाय ।
कह कवीर एक बूझे बिन, चले रंक औ राय ॥
रमैनी १०२-जगत पुजेरी बिस्तु सो देवा । सब कोइ करे बिस्तुकी सेवा ॥ प्रथम बिरंच सेव चितलाई । फेर रुद्र ध्यान लगाई ॥ सनक सनंदन नारद सेसा । सुखदेव नारद व्यास गनेसा ॥ दन्त्रात्रय जनक विदेही । पारासर आदिक विस्तु सनेही ॥ इनहि देख सब जग भरमाना । करता आपन नाही जाना ॥
समै-षट् दरशन तहवाँ चले, जहाँ न ससि औ भान ।
प्रेमधाम वैकुंठ बिस्तु को, कथत ज्ञान विज्ञान ॥
चलते चलते धाम गा, वहाँ ते फिरा निरास ।
कहे कवीर बिस्तु ना मिला, सेवा करत निरास ॥
रमैनी १०३-सेवा करत गये जुग चारी । सेवा करत गये नरनारी ॥ सेवा करत गये तिर देवा । सेवा कीन्ह लखा नहि
शब्दावली
(५७३)
भेवा ॥ सेवा करत गये औतारा । सेवा करत गये संसारा ॥ षट् दृशन सेवा चितलाई । सेवा का कछु भेद न पाई ॥ सेवा पूजा रहा लौलाई । सेवा लेके सुन्न समाई ॥
समै-स्वामी ते दृशन नाहीं, सेवक सेवा लाग ।
कहे कवीर पृथिवि यह मरगई, हरि ही के बैराग ॥
जीवत मिलना नहिं होय ज्ञानी, मरे न होय सनेह ।
कहे कवीर मिले हरि भाई, जो ना होय बिदेह ॥
रमैनी १०४-छूँछा भरा भरा ढरकाना । आपहि में जग आप हिराना ॥ सात सरग पर सुन्य एक पोरी । तहां बसे छतिसो कोरी ॥ सुन्य नगर जहँ बसे न कोई । बसन चले तहँ पुरुष औ जोई ॥ ऊजर बसि भई वस्ति उजारी । वस्ती छोड चले नरनारी ॥ सुर औ नर मुनि बसे सब कोई । उजर बसेकी खबर न होई ॥ सुन्यकी धुन सुन जगत समाना । क्या पंडित क्या चतुर सयाना ॥
समै-जहां न वस्ती सो बसा, बस्ती भई उजार ।
सुर नर मुनि सब गये विगूचे, कहें कवीर पुकार ॥
सहर बसंता छोडके, उजर बसाया गांव ।
ना वह बस ना ऊजरा, भया बसेका नांव ॥
रमैनी १०५-सुतके घर माता पटरानी । तुम किन बूझो पंडित ज्ञानी ॥ बिन पुरुष उन तिरगुण जाये । होय जोइ तीनों सुत खाये ॥ यह संसार जीते औ हारे । इन पापिन सब जगहिं संहारे ॥ तिरगुन गये जात नहिं जाने । राजा रंक सब गये सयाने ॥ जोगी जपी तपी संन्यासी । सुंडित चुंडित बैराग उदासी ॥ सुन्य नगरकी राखे आसा । रंकार धुन कीन विनासा ॥
समै-अगनी पानी खाइया, अंतर पटको पाय ।
यों जगको माताने खाया, जियरा गया हेराय ॥
(५७४)
कवीरपंथी-
अगिन बुझानी बुझ गई, दूध बिनासा घीव ।
कहैं कवीर इन आस ने, ऐसा बिनासा जीव ॥
रमैनी १०६-पुरुष आदिकी नारी माया । तिन नारी पुरुष दोय जाया ॥ एक बसा जहां बसे न कोई । एक दुनियामें सब कहुं होई ॥ और तीन गुण जन्मे भाई । उन फिर चार बरन उपजाई ॥ उन फिर जंत्र मंत्र किया पूजा । जोत निरंजन और न दूजा ॥ उन फिर नाटक चेटक कीन्हा । निरगुन मंत्र पाठ लिख दीन्हा ॥ उन फिर जप औ तप अनुसारा । नेम धर्म तीरथ व्रत न्यारा ॥ सब संसार परा इन माहीं । करता पुरुष लखो है नाहीं ॥
समै-कहा हमार न माने कोई, उनको कहो परवान ।
ये जिव चल धोखे मिला, मिट गया जीव निदान ॥
रमैनी १०७-हम करता हम सबके सही । चार युग हम सत्ते कही ॥ कोई न माने कहा हमारा । मैं जगते कहि कहि हारा ॥ जो कछु माया दिया उपदेसा । सोई उपनिषद दिया संदेसा ॥ जो कछु वेद पाठ लिखवाया । सब जीवन तासो लौ लाया ॥ एक होय तो कहि समझाऊं । सकल रिषि ते कहा कराऊं ॥ जो नाहीं तासो लौ लाया । जौ है ताको सबै मिटाया ॥
समै-जहां पवन नहि संचरे, रवि ससि उदय न होय ।
कहैं कवीर जहां हरि नहीं, तहां जात सब कोय ॥
रमैनी १०८-नगर एक बसैं दोय नारी । सब जीवन डहका-वनहारी ॥ इनते हारे तपी मुनि देवा । इनका कोई लखा न भेवा ॥ इन लीना जीवनको खाई । इनको जीते बिरला भाई ॥ गण गंधर्व मुनि बचा न कोई । इनको जाने ज्ञानी सोई ॥
समै-बीच ते आई दोय नारी, बीचे कीन अकाज ।
कहैं कवीर दोनों जग लूटा, यह करताको साज ॥
शब्दावली
(५७५)
जहां बसें ये दोनों नारी, तहां नहीं विश्राम । कहें कवीर इनको संग छाड़ो, यही तुम्हारो काम ॥
रमैनी १०९-षट् दर्शन सुनो चितलाई । करताके गुण चेतो भाई ॥ दयावंत शीतल मुख बैना । धर्मसरूप सदा सुख चैना ॥ निहकर्मो निरद्वंद सुधर्मा । सदा संतोषी कर्म सुकर्मो ॥ सब जीवनकी करे नित चिंता । मतबादी धीरज अतिवंता ॥ सदा अनंद धीरज दुख संसा । कोमल बचन सरब गुण हंसा ॥ चेतन सदा सरब कछु सूझे । परगट गुपुत सब ज्ञाने बूझे ॥
समै-अनखाया खानीको पीवे, देखे सुने हजर । नख सिखते पूर्ण बना, तासो कहत जग दूर ॥ सब गुन भरा सृष्टिका करता, निरगुन कहो नकोय । कहें कवीर प्रगट जग भीतर, भर्मत पुरुष औ जोय ॥
रमैनी ११०-षट् दर्शन सुनो बचन हमारा । उनके गुन हैं अगम अपारा ॥ मिथ्या बचन संसा विपरीता । खज अखजसे बहुत प्रतीता ॥ निर्दया अमती अकर्मो । सदा अधीरज सदा अधर्मा ॥ कामवंत तामसकी खानी । नाटक चेटक अगमठानी ॥ सदा निलज्ज दयामें हीना । छल औ छिद्र महा प्रवीना ॥ चञ्चल चपल निरमती माया । अधिक गिरामनी सब जग खाया ॥
समै-सुर नर मुनि पशु पंछी मारत, डार आपने जाल । कहें कवीर यह महा अपर्वल, विरले बांचे विचार ॥
रमैनी १११-करता सबका सिरजनहारा । जान बूझके होते न्यारा ॥ जलगी सदा जलहिमें रहते । उडरान सदा जल मध्य दिखते ॥ जलगीरी पकड़ जाल जब आये । जब जलगीरी यहै सब चितलाये ॥ हम जानीकी साथ हमारे । अब हम जाना हते ।
(५७६)
कवीरपंथी-
निनारे ॥ ज्यों कंवला जल परसत नाहीं । त्यों साधू रहते जग माहीं ॥
समै-जग बांधा जंजीर कर्मके, छूटा नाहीं कोई । कहैं कवीर बंधा नहीं, साध जानिये सोई ॥
रमैनी ११२-गुरुवा सिधु राम कहाई । इन संसार ठगा सब भाई ॥ बैठ एकंत पाखंड बताया । निरगुन सरगुन दोय भेद बताया ॥ निरालम्ब आलम्ब न सांगा । कहैं जलाते हम बितरागा ॥ अंतर भरम मिटे नहीं भाई । निसदिन रहो निरंकार समाई ॥ सब जग मिलके सीस नवावे । तब गुरुवा एक बचन सुनावे ॥ यहि जगते हरि रहा निनारा । विरला कोई बूझन हारा ॥ ब्रह्मा विस्तु महेश्वर देवा । तिनहु लखा नहीं यह भेवा ॥ ऐसा बचन कह जग भरमाया । यहि गुरुवाका भेद न पाया ॥
समै-रामनगर गुरुवा बसा, माया नगर संसार । कहैं कवीर यहि दो नगरते, विरले बचे विचार ॥ पाप पुन्य गुरु कर्म हरि, वैकुंठ लोक निजधाम । ये तो सब ऊपर परे, बूझो आतमराम ॥
रमैनी ११३-जात पांत तज मूँड़ मुँडाया । तिलक छाप दे भगत कहाया ॥ मूँड़ मुँडाय गुरु होय खेला । नर नारी सब कीन्ही चेला ॥ भये महंत सिखापन कीन्हा । निरगुण मंत्र पाठ लिख दीन्हा ॥ सेवा पूजा बहुत बताई । तन मन धन लीन्हो अरपाई ॥ करताको अकरता बतलाया । अकरता सो करता लौ लाया ॥
समै-करता ते यहि भयो अकरता, गुरुवाके उपदेश । कविरा कोइ लावे नहीं, करता केर संदेस ॥
रमैनी ११४-जो ब्रह्माको दियो संदेशा । सो विरंच गुरु दियो उपदेशा ॥ धाती चौका मंत्र असनाना । फूलसुं भूषण देव रचाना ॥
शब्दावली
(५७७)
काष्ट पषाण धात ले आये । तिनकी प्रतिमा आप बनाये ॥ गुरु होय फिर चेला होई । पूजे प्रतिमा पुरुष औ जोई ॥ धातू पूजे धात होय भाई । पषाण पूजे पषाण होय भाई ॥ जलके पूजे जल होय जाई । अगिनो पूजे अगिन समाई ॥
समै-रमता रामे छोड़के, जो पूजे पाषाण ।
तिन करता नहि चीन्हिया, अंत पषाण समान ॥
जैसा गुरु सिखापना, सिक्ख चला सोह चाल ।
कविरा इन सब खोइया, वे सब भये निहाल ॥
रमैनी ११५-कहो पंडित जो आहि अकरता । तो कैसे भयो जगतका करता ॥ कर नाहीं कैसे जग कीन्हा । रसना नहीं कैसे रस लीन्हा ॥ पांव नहीं कैसे कहि जाई । उदर नहीं कैसे कुछ खाई ॥ सरवन नहीं कैसेक सुनाई । हिया नहीं कैसेक गुनाई ॥ नैन नहीं देखत कैसाही । जीव नहीं कस जीवत गोंसाई ॥
समै-जाके पंडित प्रान है, जग कीन्हो बिस्तार ।
जो रूप धरे करता अहै, ताको कीन निनार ॥
जो करता तेहि नहि सेवे, यह लोगोंकी बूझ ।
कह कवीर आरसी अंदर, परा अंधेरे सूझ ॥
रमैनी ११६ हता आप दूजा परमाना । देख आपको आप बुलाना ॥ उझका सिंह कूपमें जाई । कांच मंदिलमें स्वान घहराई ॥ फटिक सिलामें जग अरुझाना । प्रतिबिंब देख आप भरमाना ॥ हता आप दूजा ठहराया । आप तजि दूसर लौ लाया ॥ यह तन जीव अकारथ खोया । यह नर चरित्र देखके रोया ॥
समै-समाधि लाय सब जग बैठा, चला संग ले प्रान ।
कविरा तब भ्रम ऊपजा, देखा और निसान ॥
कवीरपंथी शब्दावली १९
(५७८)
कवीरपंथी-
रमैनी ११७-संग बूझो तुम आपन योगी । संग बूझे बिन भयल बियोगी ॥ संग बूझे बिन चढो ले प्राना । घर आपनमें देखु निदाना ॥ पांचवों ले चढे अकाशा । कहु जोगी क्या होय तमासा ॥ सुखमन घाट उतर जब जाई । ब्रह्मंड प्राण ले रहा ठहराई ॥ कछु एक दिन तुम वहाँ खराने । आपन मठी ले आप उड़ाने ॥ दूठी डोर चले पंच प्राना । दूँदत दूँदत आप हिराना ॥
समै-बूझो जोगी आपको, बूझब सो यह देश ।
कह कवीर न जाय न ऐवै, बहुर न मिल संदेस ॥
बहुत गये सो कोइ न आया, कासो पूछो बात ।
कहे कवीर बिना हरि परचे, सकल सृष्टि बही जात ॥
रमैनी ११८-समझो योगी आपन भेसा । छोड़ नगर यह चले केहि देसा ॥ पूरक कुंभक रेचक पौना । सोहं साथ चले कर गौना ॥ दस नारी तज सुखमन घाटा । सहस्रदल पंकज बैठ निराटा ॥ अनहद सुन प्रतीत जिय आई । रंकार धुन दीन सुनाई ॥ आप देख दूजा कर माना । चक्र बेध त्रिभुवनको जाना ॥
समै-खलबल पड जोगी नगर, छोड़ चला जब गांव ।
तेतिस आप रहे न्यारे, सुन्न पडा सब ठाँव ॥
रमैनी ११९-पंच सुद्राका आसन कीन्हा । जोग जुगत करि निरगुन चीन्हा ॥ त्रिवेनी घाट उतर जब गयऊ । प्रतिबिम्बका दर्शन भयऊ ॥ बाजा बाजे अनहद बानी । कुंडलनी सकती तहां पटरानी ॥ धरनि अकासते लागी डोरी । चला दिसंतर होर बहोरी ॥ पंच चार तज बैठ निराटा । योगी उतरा अजपा घाटा ॥ सोहं तजि मन धर निरबाना । सुन्य नगरजी आय तुलाना ॥
समै-खालि देखके भर्म भय, दूंद फिरा चहुँ देस ।
दूंदत दूंदत मर गया, मिला न निरगुण भेस ॥
शब्दावली
(५७९)
बूझ आपको थिर रहे, योगी अमर सो होय । आप बूझे भरम तजे, आपइ और न कोय ॥
रमैनी १२०—पैतापुरकी लुंवठ रानी। तिन ब्रह्माते कही कहानी ॥ अनहद अपजा जोग अभ्यासी। सुन्न नगर आसन चौरासी ॥ पंच वायुमें जग अरुझाना। षट चक साधि कीन पयाना ॥ तीनसौ साठ स्वास ठहराई। कुंडलनी सकती साध ले जाई ॥ प्राणायाम धारना साथी। जोग जुगति तेहि करे समाधी ॥ दस अंगा दस करे जो भंगा। पंच चार नौ सोरह संगा ॥ छ पर संग दोय पर भाई। आठ बहतर बावन आई। दो हजार सत्रहसौ साता। चार चार चारकी बाता ॥ एक्रीस हजार छै सौ तेहि डोरी। चले दिसंतर होर बहोरी ॥ बारहे नासुक सोरहे सेसा। चार ब्रह्म नाभ नौ परदेसा ॥ आठ अकाश परम तहँ पाई। ग्यारह भक्ति तेरहे ठहराई ॥ एक सौ बीस साठको योगा। तैतिस कोटि डेढसौ भोगा ॥ समाध लायके चला हरि तीरा। जुगत नेत्र त्रिवेनी तीरा ॥
समै-जोग करे ते मर गये, दसो दिसा भइ सुन्न। कहें कवीर जुगति चीन्हले, जो छूटे वह धुन्न ॥ घट फूटा निकसा कुंभते, ढरक गया सब नीर। घट राखे जल घट रहे, कहहिं पुकार कवीर ॥
रमैनी १२१—यह घट रत रतनकी खानी। घटमें आप आप घट ठानी ॥ घट बिन जल कहो कहाँ रहाई। बिन घट जल नहीं है भाई ॥ घटमें जल जल घटते न्यारा। घट बूझे घट बूझनहारा ॥ घट फूटे जल जाय हेराई। जब लग घट तब लग जल भाई ॥ घटको खोजो पंडित ज्ञानी। बिन घट जाने रहे न निसानी ॥ घट खोजे घट माहिं समाई। बिन घट खोजे जल बह जाई ॥ चेतन
(५८०)
कवीरपंथी-
करो घट जाय न फूटी । सुरतकी डोर जाय न टूटी ॥ गुन टूटे औ घट बह जैहै । औघट गये घाट न पैहै ॥
समै-सहस्र घाट जल भर रखो, फूटे सहस्सर घाट । घट फूटा तो फूट भय, भया न नर तल पाट ॥ घट बाहर घट अंदर, घट है जीवन मूर । घटमें जल पूर रहे, औघटमें जल दूर ॥
रमैनी १२२-जुग २ जोगी जुगत कराई । जुगत लखे विन जम ले जाई ॥ जोगी सोई जुगत सो माने । जुगत जान अलख पहिचाने ॥ उवाव अनंत जाने भाई । तेहि जोगीको काल न खाई ॥ सोहं हंसा हमही भाई । सोहं मिले सोई हम पाई ॥ नगरी अपनी सुवस बसावे । प्रजा लोग दुख नहीं पावे ॥ प्रजाके बस होवे ना राऊ । राजा दुख न देवे काऊ ॥ सो जोगी सो जुगत सयाना । आप जान दूजा नहि जाना ॥
समै-जेहि पारस ते पारस भये, पारस जानो सोय । पारस कनक लोहा भया, सो पारस ना होय ॥ वह पारस तुम खोजो, जेहि पारस सब खान । कहैं कवीर सुन पंडिता, पारस ले पहिचान ॥
रमैनी १२३-काया नगर सो नगर हमारा । घर अपना हम कीन्ह संसारा ॥ घरही में है देव औ देवी । घरहीमें है भेव औ भेवी ॥ पाप पुन्य घरहीमें रहते । घरहीमें रैयत औ महते ॥ घरहीमें वृच्छ बीज अंकुरा । घरहीमें चंदा औ सूरा ॥ तीन लोक घरहीमें छाया । घरते बाहर किनहु न पाया ॥
समै-जो घर जावे आपना, करता पड़े तेहि सूझ । कहैं कवीर सुन पंडिता, घर अपनेको बूझ ॥