कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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बूझ आपको थिर रहे, योगी अमर सो होय । आप बूझे भरम तजे, आपइ और न कोय ॥
रमैनी १२०—पैतापुरकी लुंवठ रानी। तिन ब्रह्माते कही कहानी ॥ अनहद अपजा जोग अभ्यासी। सुन्न नगर आसन चौरासी ॥ पंच वायुमें जग अरुझाना। षट चक साधि कीन पयाना ॥ तीनसौ साठ स्वास ठहराई। कुंडलनी सकती साध ले जाई ॥ प्राणायाम धारना साथी। जोग जुगति तेहि करे समाधी ॥ दस अंगा दस करे जो भंगा। पंच चार नौ सोरह संगा ॥ छ पर संग दोय पर भाई। आठ बहतर बावन आई। दो हजार सत्रहसौ साता। चार चार चारकी बाता ॥ एक्रीस हजार छै सौ तेहि डोरी। चले दिसंतर होर बहोरी ॥ बारहे नासुक सोरहे सेसा। चार ब्रह्म नाभ नौ परदेसा ॥ आठ अकाश परम तहँ पाई। ग्यारह भक्ति तेरहे ठहराई ॥ एक सौ बीस साठको योगा। तैतिस कोटि डेढसौ भोगा ॥ समाध लायके चला हरि तीरा। जुगत नेत्र त्रिवेनी तीरा ॥
समै-जोग करे ते मर गये, दसो दिसा भइ सुन्न। कहें कवीर जुगति चीन्हले, जो छूटे वह धुन्न ॥ घट फूटा निकसा कुंभते, ढरक गया सब नीर। घट राखे जल घट रहे, कहहिं पुकार कवीर ॥
रमैनी १२१—यह घट रत रतनकी खानी। घटमें आप आप घट ठानी ॥ घट बिन जल कहो कहाँ रहाई। बिन घट जल नहीं है भाई ॥ घटमें जल जल घटते न्यारा। घट बूझे घट बूझनहारा ॥ घट फूटे जल जाय हेराई। जब लग घट तब लग जल भाई ॥ घटको खोजो पंडित ज्ञानी। बिन घट जाने रहे न निसानी ॥ घट खोजे घट माहिं समाई। बिन घट खोजे जल बह जाई ॥ चेतन