कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 594, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(५८०)
कवीरपंथी-
करो घट जाय न फूटी । सुरतकी डोर जाय न टूटी ॥ गुन टूटे औ घट बह जैहै । औघट गये घाट न पैहै ॥
समै-सहस्र घाट जल भर रखो, फूटे सहस्सर घाट । घट फूटा तो फूट भय, भया न नर तल पाट ॥ घट बाहर घट अंदर, घट है जीवन मूर । घटमें जल पूर रहे, औघटमें जल दूर ॥
रमैनी १२२-जुग २ जोगी जुगत कराई । जुगत लखे विन जम ले जाई ॥ जोगी सोई जुगत सो माने । जुगत जान अलख पहिचाने ॥ उवाव अनंत जाने भाई । तेहि जोगीको काल न खाई ॥ सोहं हंसा हमही भाई । सोहं मिले सोई हम पाई ॥ नगरी अपनी सुवस बसावे । प्रजा लोग दुख नहीं पावे ॥ प्रजाके बस होवे ना राऊ । राजा दुख न देवे काऊ ॥ सो जोगी सो जुगत सयाना । आप जान दूजा नहि जाना ॥
समै-जेहि पारस ते पारस भये, पारस जानो सोय । पारस कनक लोहा भया, सो पारस ना होय ॥ वह पारस तुम खोजो, जेहि पारस सब खान । कहैं कवीर सुन पंडिता, पारस ले पहिचान ॥
रमैनी १२३-काया नगर सो नगर हमारा । घर अपना हम कीन्ह संसारा ॥ घरही में है देव औ देवी । घरहीमें है भेव औ भेवी ॥ पाप पुन्य घरहीमें रहते । घरहीमें रैयत औ महते ॥ घरहीमें वृच्छ बीज अंकुरा । घरहीमें चंदा औ सूरा ॥ तीन लोक घरहीमें छाया । घरते बाहर किनहु न पाया ॥
समै-जो घर जावे आपना, करता पड़े तेहि सूझ । कहैं कवीर सुन पंडिता, घर अपनेको बूझ ॥