कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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गुह कहते जस ब्राह्मण चले, ग्रह पड़ा नहिँ चीन्ह ।
यहां वहांकी दोउ गंवाई, जीव अकारथ दीन्ह ॥
रमैनी १२४—सब संसार समाधि लगाई । निराकार लो कोइ न जाई ॥ रहिगो पंथ थकित भौ पौना । दशो दिशा उजार भौ गौना ॥ बस्ती छोड जेहो नर कहवों । जेहो तो नहि छेहो जहवों ॥ खेहोका वहां अन्न न पानी । बोलिहो कासो वहां नहि बानी ॥ सुख नहि भोग दिवस नहि राती । पांच तत्त्व निरगुन बैदाती ॥ जीव न सीव कर्म न काया । पाप न पुन्य वृच्छ न छाया ॥
समै-चेतो किन तुम चेतो अबहुँ, जहाँ नहीं वहाँ गाँव ।
कहे कवीर अबहीं मिल करते, अब न मिटावो नाम ॥
रमैनी १२५—ब्रह्मा कुलाल गढे संसारा । तिनमा जीव दिये करतारा ॥ जीव देके लिखे बनाई । सोई भोगता भुगते भाई ॥ परालबध संचित कर्माना । अक्षर तीन लिखे भगवाना ॥ चाहे सुता चाहे करबारी । श्रीरामकी बातें न्यारी ॥ चहता सोई कीन्हा करता । चहिये सो दूरम सो हरता ॥
समै-मातु न होती पिता न होता, होता रुधिर औ नीर ।
कहैं ते आवत पंडित, ऐसा अनूप शरीर ॥
तत्त्व भये संयोग दोउ, निहतत नाही कोय ।
कह कवीर सो फल उपजे, तत्त्व अधिक जो होय ॥
रमैनी १२६—सुन्य न हता सुन्य सब कीन्हा । जीव न हता जीव सिव दीन्हा ॥ पाँचों तत्त्व हता न कोई । दिवस न रजनी पुरुष न जोई । निरगुन पुरुष हता निरंकारा । तिन सिरजा यह सब संसारा ॥ निराकार निरगुन कस देवा । कैसे सुन्य कहो किन भेवा ॥ लौटके कथा कहें ब्रह्म ज्ञानी । निरालम्ब निरगुनकी बानी ॥ निराकार आकार न कोई । निरगुनते गुनना होई ॥ सुन्य हते