कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरूपंथो-
नहिं देखन हारा । यह विध रचा सकल संसारा ॥ जो बीजामें लखा सरीरा । वो था साहेब सुनो कवीरा ॥
समै-जो अकार गुण कर्म धरे है, सो निराकार नहिं होय ।
फल फूल पत्र औ साखा, बिरला देखे कोय ॥
यही सरूप करताको, ज्ञानी अंते नाहिं ।
कहैं कवीर परो जन संशय, गगन मंडल कछु नाहिं ॥
रमैनी १२७-पवन सरूपी अगम अपारा । सब घट पूरन सबते न्यारा ॥ पुहुषकी वास दियाकी जोती । पवन सरूप पिरे तन होती ॥ शब्दके रूपमें हरदिकी लाली । विस्तुका रूप ज्ञान गुणचाली ॥ काशीकी धुन करो बिनाना । निराकार निरगुन तिन जाना ॥ सोहं हंसा जाने सोई । सोहं हंसा सोइ जिव होई ॥
समै-बिना पुहुष नहिं वास है, बिना बीज नहिं कोय ।
बिना तन सोहं शब्द नहीं, बिरला बूझे कोय ॥
जीव ब्रह्म परब्रह्म नहीं, सुंदर धरे सरूप ।
कहैं कवीर जाव घट एके, ऐसा ख्याल अनूप ॥
रमैनी १२८-ज्ञानी आपन करो विचारा । जो तुम मानो कहा हमारा ॥ चार शरीरको छोड़ो ज्ञानी । करताका कछु करो बीनानी ॥ सूच्छम अस्थूल न कारन महा कारन । चार अवस्था नाहिं निहारन ॥ गुण औ कर्मकी करो न संसा । तुम करता निह केवल हंसा ॥ देव आद तुम कहो ब्रह्मज्ञानी । करता पुरुषकी साज समानी ॥ बूझ विचार गहो अस्थाना । निरगुन पुरुषका करो न ध्याना ॥
समै-निवृत्त परवृत्ति दोय मारग, तेहि अटका संसार ।
कहैं कवीर दोनों नहीं, समझो बूझ विचार ॥
रमैनी १२९-चार फल कौन कहां तुम देवा । अवस्था चार कहां तुम भेवा ॥ कौन बूच्छ जेहि यह फल लाग। जेहि कारन