कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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तुम भये अनुरागा॥ अरथ धर्म काम मोच्छ भाई। जाग्रित स्वप्न श्रुपोपत ताई॥ अच्छे वृच्छ एक पुरुष अपारा। तहां यह फल है चार निनारा॥ मारग कठिन न कोई जावे। गगन चढे सोई फल खावे॥
समै-केहि कारण करनी करे, कहाँ वृच्छ फल चार।
सबे पड़े भ्रम जालमें, कहैं कवीर पुकार॥
रमैनी १३०-दिनके रैन विषै जब सोई। भूले आप भूले सब कोई॥ नाना विधिके उठे तरंगा। अदभुत ख्याल दिखे बहुरंगा॥ इन बातनकी खबर न जानी। पार ब्रह्म कैसे पहिचानी॥ कैसे खबर वहांकी पावे। अपने घटकी लखे न लखावे॥ औघट घाटी अगम अपारा। सो पावे जो उतरे पारा॥
समै-मन जिवका संजोग तन, मनके अद्भुत रूप।
जाग्रित स्वप्न भरमावे, लीला रचो अनूप॥
जाग्रित जाग्रत सांच है, सोवत सपना सांच।
कहैं कवीर मन ना बसे, जहां तत्त्व नहीं पांच॥
मन यह जागत है नहीं, यह मन यही शरीर।
रैयत होय तिनमें रहे, कहैं पुकार कवीर॥
रमैनी १३१-यह है गगन जापर बहु रंगा। नाना विधि को उठे तरंगा॥ चौरासी कहो कौन विधि भाई। कौन अस्थान जीव ठहराई॥ पांच तत्त्व कहो किन भेवा। भेला बांधे निनारे देवा॥ त्रिगुनकी उत्पत्ति कहो सोई। निराकार कस करता होई॥ दोमें को जग सिरजनहारा। नांदे बिदे क्या ब्योपारा॥ सहस्रका कहो का अर्थ बूझ। निराकार निरगुन कैसे सूझ॥ ऐसा ख्याल अनूप हमारा। जो बूझे सो सिरजनहारा॥
समै-सबरा आतम आप हमारा, इनमें नाहिं विसेख।
हम जाने सो यह गुन बूझे, पावे पुरुष अलेख॥