कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
रमैनी ११७-संग बूझो तुम आपन योगी । संग बूझे बिन भयल बियोगी ॥ संग बूझे बिन चढो ले प्राना । घर आपनमें देखु निदाना ॥ पांचवों ले चढे अकाशा । कहु जोगी क्या होय तमासा ॥ सुखमन घाट उतर जब जाई । ब्रह्मंड प्राण ले रहा ठहराई ॥ कछु एक दिन तुम वहाँ खराने । आपन मठी ले आप उड़ाने ॥ दूठी डोर चले पंच प्राना । दूँदत दूँदत आप हिराना ॥
समै-बूझो जोगी आपको, बूझब सो यह देश ।
कह कवीर न जाय न ऐवै, बहुर न मिल संदेस ॥
बहुत गये सो कोइ न आया, कासो पूछो बात ।
कहे कवीर बिना हरि परचे, सकल सृष्टि बही जात ॥
रमैनी ११८-समझो योगी आपन भेसा । छोड़ नगर यह चले केहि देसा ॥ पूरक कुंभक रेचक पौना । सोहं साथ चले कर गौना ॥ दस नारी तज सुखमन घाटा । सहस्रदल पंकज बैठ निराटा ॥ अनहद सुन प्रतीत जिय आई । रंकार धुन दीन सुनाई ॥ आप देख दूजा कर माना । चक्र बेध त्रिभुवनको जाना ॥
समै-खलबल पड जोगी नगर, छोड़ चला जब गांव ।
तेतिस आप रहे न्यारे, सुन्न पडा सब ठाँव ॥
रमैनी ११९-पंच सुद्राका आसन कीन्हा । जोग जुगत करि निरगुन चीन्हा ॥ त्रिवेनी घाट उतर जब गयऊ । प्रतिबिम्बका दर्शन भयऊ ॥ बाजा बाजे अनहद बानी । कुंडलनी सकती तहां पटरानी ॥ धरनि अकासते लागी डोरी । चला दिसंतर होर बहोरी ॥ पंच चार तज बैठ निराटा । योगी उतरा अजपा घाटा ॥ सोहं तजि मन धर निरबाना । सुन्य नगरजी आय तुलाना ॥
समै-खालि देखके भर्म भय, दूंद फिरा चहुँ देस ।
दूंदत दूंदत मर गया, मिला न निरगुण भेस ॥