कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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काष्ट पषाण धात ले आये । तिनकी प्रतिमा आप बनाये ॥ गुरु होय फिर चेला होई । पूजे प्रतिमा पुरुष औ जोई ॥ धातू पूजे धात होय भाई । पषाण पूजे पषाण होय भाई ॥ जलके पूजे जल होय जाई । अगिनो पूजे अगिन समाई ॥
समै-रमता रामे छोड़के, जो पूजे पाषाण ।
तिन करता नहि चीन्हिया, अंत पषाण समान ॥
जैसा गुरु सिखापना, सिक्ख चला सोह चाल ।
कविरा इन सब खोइया, वे सब भये निहाल ॥
रमैनी ११५-कहो पंडित जो आहि अकरता । तो कैसे भयो जगतका करता ॥ कर नाहीं कैसे जग कीन्हा । रसना नहीं कैसे रस लीन्हा ॥ पांव नहीं कैसे कहि जाई । उदर नहीं कैसे कुछ खाई ॥ सरवन नहीं कैसेक सुनाई । हिया नहीं कैसेक गुनाई ॥ नैन नहीं देखत कैसाही । जीव नहीं कस जीवत गोंसाई ॥
समै-जाके पंडित प्रान है, जग कीन्हो बिस्तार ।
जो रूप धरे करता अहै, ताको कीन निनार ॥
जो करता तेहि नहि सेवे, यह लोगोंकी बूझ ।
कह कवीर आरसी अंदर, परा अंधेरे सूझ ॥
रमैनी ११६ हता आप दूजा परमाना । देख आपको आप बुलाना ॥ उझका सिंह कूपमें जाई । कांच मंदिलमें स्वान घहराई ॥ फटिक सिलामें जग अरुझाना । प्रतिबिंब देख आप भरमाना ॥ हता आप दूजा ठहराया । आप तजि दूसर लौ लाया ॥ यह तन जीव अकारथ खोया । यह नर चरित्र देखके रोया ॥
समै-समाधि लाय सब जग बैठा, चला संग ले प्रान ।
कविरा तब भ्रम ऊपजा, देखा और निसान ॥
कवीरपंथी शब्दावली १९