भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५७३)

भेवा ॥ सेवा करत गये औतारा । सेवा करत गये संसारा ॥ षट् दृशन सेवा चितलाई । सेवा का कछु भेद न पाई ॥ सेवा पूजा रहा लौलाई । सेवा लेके सुन्न समाई ॥

समै-स्वामी ते दृशन नाहीं, सेवक सेवा लाग ।

कहे कवीर पृथिवि यह मरगई, हरि ही के बैराग ॥

जीवत मिलना नहिं होय ज्ञानी, मरे न होय सनेह ।

कहे कवीर मिले हरि भाई, जो ना होय बिदेह ॥

रमैनी १०४-छूँछा भरा भरा ढरकाना । आपहि में जग आप हिराना ॥ सात सरग पर सुन्य एक पोरी । तहां बसे छतिसो कोरी ॥ सुन्य नगर जहँ बसे न कोई । बसन चले तहँ पुरुष औ जोई ॥ ऊजर बसि भई वस्ति उजारी । वस्ती छोड चले नरनारी ॥ सुर औ नर मुनि बसे सब कोई । उजर बसेकी खबर न होई ॥ सुन्यकी धुन सुन जगत समाना । क्या पंडित क्या चतुर सयाना ॥

समै-जहां न वस्ती सो बसा, बस्ती भई उजार ।

सुर नर मुनि सब गये विगूचे, कहें कवीर पुकार ॥

सहर बसंता छोडके, उजर बसाया गांव ।

ना वह बस ना ऊजरा, भया बसेका नांव ॥

रमैनी १०५-सुतके घर माता पटरानी । तुम किन बूझो पंडित ज्ञानी ॥ बिन पुरुष उन तिरगुण जाये । होय जोइ तीनों सुत खाये ॥ यह संसार जीते औ हारे । इन पापिन सब जगहिं संहारे ॥ तिरगुन गये जात नहिं जाने । राजा रंक सब गये सयाने ॥ जोगी जपी तपी संन्यासी । सुंडित चुंडित बैराग उदासी ॥ सुन्य नगरकी राखे आसा । रंकार धुन कीन विनासा ॥

समै-अगनी पानी खाइया, अंतर पटको पाय ।

यों जगको माताने खाया, जियरा गया हेराय ॥