कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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भेवा ॥ सेवा करत गये औतारा । सेवा करत गये संसारा ॥ षट् दृशन सेवा चितलाई । सेवा का कछु भेद न पाई ॥ सेवा पूजा रहा लौलाई । सेवा लेके सुन्न समाई ॥
समै-स्वामी ते दृशन नाहीं, सेवक सेवा लाग ।
कहे कवीर पृथिवि यह मरगई, हरि ही के बैराग ॥
जीवत मिलना नहिं होय ज्ञानी, मरे न होय सनेह ।
कहे कवीर मिले हरि भाई, जो ना होय बिदेह ॥
रमैनी १०४-छूँछा भरा भरा ढरकाना । आपहि में जग आप हिराना ॥ सात सरग पर सुन्य एक पोरी । तहां बसे छतिसो कोरी ॥ सुन्य नगर जहँ बसे न कोई । बसन चले तहँ पुरुष औ जोई ॥ ऊजर बसि भई वस्ति उजारी । वस्ती छोड चले नरनारी ॥ सुर औ नर मुनि बसे सब कोई । उजर बसेकी खबर न होई ॥ सुन्यकी धुन सुन जगत समाना । क्या पंडित क्या चतुर सयाना ॥
समै-जहां न वस्ती सो बसा, बस्ती भई उजार ।
सुर नर मुनि सब गये विगूचे, कहें कवीर पुकार ॥
सहर बसंता छोडके, उजर बसाया गांव ।
ना वह बस ना ऊजरा, भया बसेका नांव ॥
रमैनी १०५-सुतके घर माता पटरानी । तुम किन बूझो पंडित ज्ञानी ॥ बिन पुरुष उन तिरगुण जाये । होय जोइ तीनों सुत खाये ॥ यह संसार जीते औ हारे । इन पापिन सब जगहिं संहारे ॥ तिरगुन गये जात नहिं जाने । राजा रंक सब गये सयाने ॥ जोगी जपी तपी संन्यासी । सुंडित चुंडित बैराग उदासी ॥ सुन्य नगरकी राखे आसा । रंकार धुन कीन विनासा ॥
समै-अगनी पानी खाइया, अंतर पटको पाय ।
यों जगको माताने खाया, जियरा गया हेराय ॥