कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
अगिन बुझानी बुझ गई, दूध बिनासा घीव ।
कहैं कवीर इन आस ने, ऐसा बिनासा जीव ॥
रमैनी १०६-पुरुष आदिकी नारी माया । तिन नारी पुरुष दोय जाया ॥ एक बसा जहां बसे न कोई । एक दुनियामें सब कहुं होई ॥ और तीन गुण जन्मे भाई । उन फिर चार बरन उपजाई ॥ उन फिर जंत्र मंत्र किया पूजा । जोत निरंजन और न दूजा ॥ उन फिर नाटक चेटक कीन्हा । निरगुन मंत्र पाठ लिख दीन्हा ॥ उन फिर जप औ तप अनुसारा । नेम धर्म तीरथ व्रत न्यारा ॥ सब संसार परा इन माहीं । करता पुरुष लखो है नाहीं ॥
समै-कहा हमार न माने कोई, उनको कहो परवान ।
ये जिव चल धोखे मिला, मिट गया जीव निदान ॥
रमैनी १०७-हम करता हम सबके सही । चार युग हम सत्ते कही ॥ कोई न माने कहा हमारा । मैं जगते कहि कहि हारा ॥ जो कछु माया दिया उपदेसा । सोई उपनिषद दिया संदेसा ॥ जो कछु वेद पाठ लिखवाया । सब जीवन तासो लौ लाया ॥ एक होय तो कहि समझाऊं । सकल रिषि ते कहा कराऊं ॥ जो नाहीं तासो लौ लाया । जौ है ताको सबै मिटाया ॥
समै-जहां पवन नहि संचरे, रवि ससि उदय न होय ।
कहैं कवीर जहां हरि नहीं, तहां जात सब कोय ॥
रमैनी १०८-नगर एक बसैं दोय नारी । सब जीवन डहका-वनहारी ॥ इनते हारे तपी मुनि देवा । इनका कोई लखा न भेवा ॥ इन लीना जीवनको खाई । इनको जीते बिरला भाई ॥ गण गंधर्व मुनि बचा न कोई । इनको जाने ज्ञानी सोई ॥
समै-बीच ते आई दोय नारी, बीचे कीन अकाज ।
कहैं कवीर दोनों जग लूटा, यह करताको साज ॥